ये दिल वालों की बस्ती है,अजब है दास्तां उसकी, किसी से दिल नहीं मिलता, कोई दिल से नहीं मिलता
कमल जयंत
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठï नेता एवं यूपी के पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि वे संसद भवन को आरएसएस का अड्डा नहीं बनने देंगे। उनका कहना है कि भाजपा और आरएसएस मिलकर देश का संविधान खत्म करना चाहती है। लोकसभा में चार सौ पार सीटें लाने का नारा देने वाली भाजपा का यही मकसद था कि दो तिहाई बहुमत की सरकार बनते ही भारतीय संविधान को खत्म करके यहां एक बार फिर गैर बराबरी के आधार पर स्थापित मनुवादी व्यवस्था को लागू करना था, लेकिन सपा-कांग्रेस गठबंधन ने यूपी में इन्हें भारी शिकस्त दी जिसकी वजह से केन्द्र में इन्हें दो बैशाखियों का सहारा लेना पड़ा। हमारा भाजपा से नहीं बल्कि उनकी दलित, पिछड़ा और मुस्लिम विरोधी नीतियों से ऐतराज है। ये पार्टी सरकार में रहते हुए और सत्ता से बाहर रहने पर भी हमेशा मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति करती रही है।

भाजपा सरकार में रहकर सबसे ज्यादा नुकसान दलितों का कर रही है। भाजपा संविधान नहीं बदल पायी तो बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर द्वारा संविधान के अनुच्छेद 339 व 340 में दलितों व पिछड़ा वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन भाजपा ने सरकार में रहकर इन वर्गों का सरकारी नौकरियों में आरक्षण खत्म करने के लिए आउटसोर्सिंग कंपनी के जरिए नौकरियों की व्यवस्था शुरू कर दी, इससे सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था अपने आप खत्म हो गयी। भाजपा सरकार में एक तरफ भ्रष्टाचार, दूसरी तरफ दलितों व पिछड़ा वर्ग का आरक्षण खत्म। जबकि इन्हीं वर्गों की बदौलत भाजपा का प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बने हैं, इनकी केन्द्र व यूपी समेत कई राज्यों में सरकार चल रही है। उनका कहना है कि ये वही भाजपा है जिसकी 1989 तक देश में दो लोकसभा की सीटें थीं। अगले साल यानि 2027 में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा का हश्र 1989 जैसा होने वाला है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई। उन्होंने सभी सवालों का बहुत ही बेबाकी के साथ जवाब दिया।
सवाल- कभी सशक्त होकर उभरा बहुजन आंदोलन इतनी जल्दी बिखर गया, इसकी क्या वजह है।
जवाब- कांशीराम जी ने अपने जीवनकाल में बहुजनों यानि दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समाज को एकजुट करके बहुजन समाज बनाया और इन्हें सामाजिक और राजनीतिक लाभ दिलाने के लिए बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। उन्होंने बहुजन एकता की बदौलत देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में अपने जीवनकाल में चार बार बसपा की सरकार बनायी। उन्होंने बहुत कम समय में बसपा को देश की मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का दर्जा दिलाया। लेकिन दुर्भाग्यवश बसपा का मौजूदा नेतृत्व बहुजन एकता को सहेजने में सफल नहीं रहा, मूवमेंट से जुड़े लोग या तो निकाल दिये गये या उन्होंने बसपा से नाता तोड़ लिया। जिस मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लडऩे के लिए बसपा का गठन किया गया था, उसी व्यवस्था के समर्थन में पार्टी खड़ी हो गयी। नतीजा यह रहा कि लोग निकलते गये और बहुजन आंदोलन बिखरता चला गया।

सवाल- आप तो बसपा के गठन के पहले से कांशीराम जी के साथ जुड़े थे, उन्होंने किस सोच के तहत बसपा का गठन किया था।
जवाब- कांशीराम जी की हमेशा से यही चाहती थी कि वह देश में वंचित-शोषित समाज को हुक्मरान बनायें और अपनी इसी सोच को साकार करने के लिए उन्होंने 14 अप्रैल 1984 को बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की जयंती के मौके पर बसपा का गठन किया। कांशीराम जी ने देश के सबसे कमजोर और उत्पीडऩ का शिकार वंचित वर्ग को हुक्मरान बनाने का सपना देखा था और वे इसे पूरा करने के लिए रात को भी जागते थे। कांशीराम जी 1991 में इटावा से लोकसभा का उपचुनाव जीते और दिसंबर की ठंड में सहारनपुर से साइकिल यात्रा शुरू की, उस समय मैं बांदा से बसपा का विधायक था और कांशीराम जी की साइकिल यात्रा में शामिल हुआ। जब साइकिल यात्रा फतेहपुर पहुंची तो रात में पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस में कांशीराम जी रुके और उनके बगल के कमरे में मैं रुका था। उनका कमरा मेरे कमरे से लगा था, रात में ढाई बजे कांशीराम जी के खांसने की आवाज आई, मैं उठ गया और हिम्मत करके उनके कमरे में दस्तक दी, उन्होंने मुझे कमरे में बुला लिया। वह कमरे में टहल रहे थे। मुझसे जब नहीं रहा गया तो मैंने पूछा साहब आपकी तबियत खराब है क्या। उन्होंने कहा हां मेरी तबियत खराब है। तब मैंने उनसे कहा कि मैं दवा ले आता हूं। इस पर कांशीराम जी ने कहा कि आपने मुझसे मेरी बीमारी के बारे में तो पूछा ही नहीं तो किस मर्ज की दवा ले आओगे। उन्होंने कहा कि मेरा मर्ज समझ लो। फिर बताया कि वह रात में दस बजे सो जाते हैं और रात में डेढ़ बजे उनकी नींद खुल जाती है। फिर मैं नहीं सोता हूं क्योंकि मुझे सदियों से सताये गये दलित-शोषित और वंचित समाज को इस देश का हुक्मरान बनाना है। बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान में एक वोट का अधिकार दिलाकर इस समाज को हुक्मरान बनाने की नीव रख दी, लेकिन वह अपने जीते-जी वंचित समाज को हुक्मरान नहीं बना पाये। अब पता नहीं मैं भी इस वर्ग को अपने जीते जी देश का हुक्मरान बना पाऊंगा या ये सपना लिये ही मर जाऊंगा। कांशीराम जी ने रात में जागकर जो सपना देखा उसे अपने जीते जी पूरा कर दिया।
सवाल- बसपा के बहुजन समाज और सपा के पीडीए समाज में कोई अंतर है क्या।
जवाब- नहीं दोनों एक ही हैं। बस अंतर सिर्फ इतना है कि बसपा ने बहुजन समाज को उनके अधिकार दिलाने की लड़ाई लडऩा बंद कर दिया है और समाजवादी पार्टी ने पीडीए समाज स्थापित करके यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की लड़ाई को जारी रखा है। सपा प्रमुख अखिलेश जी ने सिर्फ पीडीए समाज गठित ही नहीं किया है, बल्कि पीडीए के तहत आने वाले समाज को उनकी आबादी के मुताबिक संगठन में पदाधिकारी और चुनाव में उम्मीदवार बना रहे हैं। जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी हिस्सेदारी के नारे के तहत सपा ने लोकसभा चुनाव में सामान्य सीटों पर भी दो दलित वर्ग के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। आगे भी पार्टी अपने इसी एजेंडे को आगे बढ़ाती रहेगी। 15 फरवरी 2026 को मैंने सपा की सदस्यता ग्रहण की, उसके बाद बीच के तीन दिन छोड़ दीजिए तो लगातार पीडीए समाज को मजबूत करने के लिए जिलों का दौरा कर रहे हैं और पीडीए समाज के बीच भाईचारा स्थापित करने के लिए अभियान चला रहे हैं।
सवाल- भाजपा में आपसी फूट की भी चर्चा चल रही है।
जवाब– ये बिल्कुल सही है। भाजपा में इस समय दो फाड़ है। यूपी के शीर्ष नेतृत्व की केन्द्र के नेताओं से नहीं बनती है। केन्द्र के नेताओं की यूपी वालों से नहीं बनती है। दोनों ऊपर से तो एक दिखते हैं, लेकिन अंदर से एक-दूसरे का गला काटो अभियान में जुटे रहते हैं। अंत में एक शेर कहते हुए ये दिल वालों की बस्ती है,अजब है दास्तां उसकी, किसी से दिल नहीं मिलता, कोई दिल से नहीं मिलता। अपनी बात को विराम दे दिया।