बहनजी के सीएम बनने के लालच ने भाजपा को दी संजीवनी : सलाहउद्दीन सिद्दीकी

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बाबा साहब और कांशीराम जी के मूवमेंट को अखिलेश जी ही आगे बढ़ा रहे

कमल जयंत

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं यूपी के पूर्व राज्यमंत्री (दर्जा प्राप्त) सलाहउद्दीन सिद्दीकी का कहना है कि बसपा प्रमुख मायावती जी के लालच के कारण ही आज यूपी ही नहीं बल्कि पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी ने खुद को स्थापित कर लिया। वर्ना 1993 में हुए सपा-बसपा गठबंधन के सामने भाजपा को अपना सियासी वजूद बचाना मुश्किल हो जाता। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश में राम मंदिर के प्रचंड आंदोलन के बीच बहुजन नायक कांशीराम जी को इस बात का अंदाजा हो गया था कि भाजपा जैसी फिरकापरस्त ताकत को कमजोर करने और इसे सत्ता में आने से रोकने के लिए बहुजन समाज को एकजुट करना बहुत जरूरी है।

उनका कहना है कि कांशीराम जी को यह बात अच्छी तरह से मालूम थी कि मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग मुलायम सिंह यादव के साथ मजबूती से जुड़ा है और दलितों के साथ ही पिछड़ा वर्ग के एक बड़ा हिस्सा उनके साथ है। इन्हें एकजुट करने के लिए उन्होंने मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया और यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को न सिर्फ यूपी की सत्ता में आने से रोका बल्कि उसके विजय रथ को रोककर भाजपा की देश में बनने वाली सरकार पर भी विराम लगा दिया।

सिद्दीकी का कहना है कि 2019 में सपा प्रमुख अखिलेश यादव जी ने एक बार फिर इतिहास को दोहराते हुए बसपा के साथ लोकसभा चुनाव में गठबंधन किया और बसपा प्रमुख मायावती जी की शर्तों के मुताबिक उन्होंने सीटों का बंटवारा किया और इस बात की उम्मीद जताई कि अब ये गठबंधन आगे भी चलता रहे, लेकिन चुनाव में मिली शिकस्त के साथ ही बसपा प्रमुख ने सपा से गठबंधन तोड़ लिया।

हालांकि इस चुनाव में बसपा को तो सियासी फायदा ही हुआ पार्टी लोकसभा में शून्य से दस पर पहुंच गयी। जबकि इस गठबंधन का लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ फिर भी अखिलेश जी ये गठबंधन बनाये रखना चाहते थे।गठबंधन से बहुजन समाज के लोगों में खासतौर पर दलितों को बहुत ज्यादा उम्मीद थी, इस गठबंधन के टूटने से उनके सपने भी टूटे। जहां तक लंबे समय तक बसपा में रहने का मेरा निजी अनुभव है उसके हिसाब से दुर्भाग्यवश बहनजी ने खुद को बहुजन मूवमेंट से अलग कर लिया। वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बहुजन मूवमेंट को अपनाकर बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर और बहुजन नायक कांशीराम जी की विचारधारा को पूरा करने का संकल्प लेकर काम करना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से वह सपा और सपा प्रमुख अखिलेश जी की तरफ आकर्षित हुए और बसपा छोडक़र समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली।

मुझे इस बात की खुशी है कि जिस मकसद से उन्होंने सपा में शामिल होने का फैसला लिया था, वह सही रहा। आज अखिलेश जी बहुजनों की लड़ाई लड़ रहे हैं। बाबा साहब और कांशीराम जी के मूवमेंट को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान सामान्य सीटों पर दलित समाज का प्रत्याशी उतारकर यह साबित भी कर दिया है कि वह दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की लड़ाई लड़ रहे हैं और वे इन वर्गों के साथ आगे भी चाहे विधानसभा चुनाव में टिकट देने का मामला हो या संगठन में हिस्सेदारी की बात हो, उसे पूरा करते रहेंगे।

कांशीराम और मुलायम का गठबंधन न टूटता तो भाजपा का सियासत में उदय भी न हो पाता

सिद्दीकी का कहना है कि अगर कांशीराम जी और मुलायम सिंह यादव जी का गठबंधन न टूटता तो दोनों नेता देश के प्रधानमंत्री बन चुके होते और भाजपा का सियासत में उदय भी न हो पाता। लेकिन मायावती की मुख्यमंत्री बनने की लालच ने कांशीराम जी के मूवमेंट को हजारों साल पीछे छोड़ दिया। नतीजा यह रहा कि मायावती जी तो मुख्यमंत्री बन गईं और सपा-बसपा का स्वाभाविक गठबंधन टूट गया। दो महाशक्तियां अलग हो गईं। इन्हें अलग करने के लिए आरएसएस और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लंबे समय से योजना तैयार कर रहा था, जिसे मायावती जी के लालच और महत्वाकांक्षा ने पूरा कर दिया। लेकिन इसका खामियाजा आज पूरा बहुजन समाज भुगत रहा है और खासतौर पर दलितों और मुस्लिमों के साथ हो रही ज्यादिती पर उन्हें न्याय भी नहीं मिल पा रहा है।

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