जातियों के नाम से शासकीय पदों पर भर्ती ब्रिटिश काल में हुई

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जाति-आधारित, फ्यूडल और औपनिवेशिक नाम संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है

     डॉ. लालजी प्रसाद  निर्मल

ब्रिटिश सरकार ने 19वीं सदी के अंत (लगभग 1880 के दशक से) में नगरपालिकाओं, न्यायालयों और अन्य प्रशासनिक विभागों में आधुनिक सेवाएं स्थापित कीं। उस समय भारतीय समाज में जाति-आधारित पारंपरिक व्यवसाय प्रचलित थे, इसलिए उन्होंने इन पदों के नाम भी उसी आधार पर रखे—जैसे धोबी कपड़े धोने वाले स्टाफ के लिए। भंगी/हलालखोर/मेहतर/स्कैवेंजर/स्वीपर-सफाई, मैनुअल स्कैवेंजिंग या लैट्रिन क्लीनिंग के लिए। इसी तरह माली, भिस्ती, मसालची आदि के लिए भी पदों का सृजन हुआ और इन पदों पर इन वर्गों के लोगों को भर्ती किया गया। ये नाम फ्यूडल (जमींदारी), औपनिवेशिक और जाति-आधारित व्यवसाय से सीधे जुड़े थे। न्यायालयों (सुप्रीम कोर्ट और हाई कोट्र्स) के सेवा नियमों में ये औपचारिक रूप से दर्ज हो गए। बढ़ई या मोची जैसे पद भी कुछ विभागों में जैसे पीडब्ल्यूडी या अन्य प्रशासनिक कार्यों में इसी तर्ज पर इस्तेमाल होते थे, हालांकि सफाई और धोबी वाले पद सबसे प्रमुख उदाहरण हैं। स्वतंत्रता के बाद भी यह प्रथा जारी रही, ये नाम सेवा पुस्तिकाओं के साथ ही भर्ती नियमों और प्रशासनिक रिकॉर्ड में इस्तेमाल होते रहे।

वर्तमान में (2026 तक) क्या चल रहा है?

आधिकारिक रूप से कई जगहों पर बदलाव हो चुका है या हो रहा है : सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में ही कुछ पदों के नाम बदले (जैसे ‘जमादार (सफाईवाला)’ को सफाई के काम में लगे कर्मचारी का पद सुपरवाइजर कर दिया। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सेंटर फॉर रिसर्च एंड प्लानिंग ने रिपोर्ट जारी की जिसमें स्पष्ट कहा गया कि ये जाति-आधारित, फ्यूडल और औपनिवेशिक नाम संवैधानिक मूल्यों (अनुच्छेद 14, 15, 17, 21 — समानता, गरिमा, छुआछूत उन्मूलन) का उल्लंघन करते हैं। इन्हें ग्रामर ऑफ इनइक्विलिटी कहा गया। पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई ने भी इसका समर्थन किया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जो नाम सुझाए गये उनमें धोबी को लांडरी आपरेटर, हलालखोर/स्वीपर/स्कैवेंजर को सैनिटेशन असिस्टेंट, माली को हार्टीकल्चर अटेंडेंट है। यह रिपोर्ट सभी हाई कोट्र्स को भेजी गई है और बदलाव की सिफारिश की गई है। नगर निगमों में भी ‘भंगी’ या ‘धोबी’ जैसे नाम आधिकारिक तौर पर हटाकर ‘सफाई कर्मचारी’ कर दिए गए हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कुछ पुराने रिकॉर्ड और सेवा नियमों में अभी भी ये नाम बाकी हैं। साथ ही, व्यवहार में जाति का प्रभाव अभी भी कायम है। सफाई/मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसे काम 77′ से ज्यादा दलित (खासकर वाल्मीकि/भंगी समुदाय) ही करते हैं। जाति-आधारित भर्ती और सामाजिक दबाव अभी भी जारी है।
निष्कर्ष : यह प्रथा ब्रिटिश काल (लगभग 1880 से) में शुरू हुई और आजादी के बाद भी दशकों तक चली। अब सुप्रीम कोर्ट और संवैधानिक मूल्यों के कारण इसे बदलने की प्रक्रिया तेज हो रही है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यह बदलाव गरिमा और समानता की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। साथ ही हमें केवल सुप्रीम कोर्ट या हाई कोट्र्स पर ही नहीं निर्भर रहना चाहिए। बल्कि जाति के नाम पर जो अपमान इंसानों को सहन करना पड़ रहा है। सभ्य समाज को इसे बदलना होगा ताकि जातीय दंश का शिकार इन जातियों के लोग भी स्वाभिमान के साथ रहकर अपना जीवन-यापन कर सकें। कम से कम जाति के नाम पर तो किसी का उत्पीडऩ न हो, यह हमें अभी से ही सुनिश्चित करना होगा, तभी हम एकता और बंधुत्व की बात को साकार कर सकेंगे।
ब्रिटिशकाल में जातियों के नाम से शासकीय पदों पर भर्ती का मामला लंबे समय तक चला, अब सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में पहल करना शुरू की है। वैसे सदियों से उत्तर प्रदेश (और भारत) में अनुसूचित जातियों की उपजातियों के नाम पर बने गांवों के नाम भी यथावत हैं। इनके नाम भी बदलने की जरूरत है। हम इक्कसवीं सदी में आ गये हैं, लेकिन हमारी सोच अठारहवीं सदी की है। इसे बदलने की जरूरत है। इस मुद्दे पर सरकार संवेदनशील है। हमें भी संवेदनशील होना पड़ेगा।
पृष्ठभूमि : भारत में, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, कई गांवों और बस्तियों के नाम ऐतिहासिक रूप से जाति, गोत्र या उपजातियों पर आधारित हैं। 2011 की जनगणना के गांव निर्देशिका विश्लेषण के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 2,865 गांव विभिन्न जातियों (ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, दलित आदि) के नाम पर हैं। अनुसूचित जातियों (दलितों) की उपजातियों (जैसे चमार, भंगी/वाल्मीकि, नट आदि) पर आधारित नामों वाले गांवों में चमारी, चमरौआ, चमरसेना, भंगियाना आदि शामिल हैं। ये नाम प्री-इंडिपेंडेंस काल में प्रचलित थे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भी बिना सुधार के बने रहे। ऐसे नाम अब जाति-सूचक माने जाते हैं और दलित समुदाय के लिए अपमानजनक साबित होते हैं।
समस्या और कारण : ये नाम दलितों को निरंतर अपमान और हीनभावना का बोध कराते हैं। गांववासियों को रोजमर्रा की जिंदगी में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
कानूनी पहलू : अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत ऐसे शब्दों (चमार, भंगी आदि) का जानबूझकर इस्तेमाल दंडनीय अपराध है। लेकिन गांवों के आधिकारिक नाम में ये शब्द राज्य स्तर पर इस्तेमाल हो रहे हैं, जो विरोधाभास है।
सामाजिक प्रभाव : ऐसे नाम सामाजिक सद्भाव में बाधक हैं और दलितों की प्रगति को प्रभावित करते हैं। अन्य राज्यों में भी इसी तरह की शिकायतें हैं।

उत्तर प्रदेश में हालिया मांग और विकास (मार्च 2026)

यह मुद्दा मार्च 2026 में फिर ताजा हुआ है क्योंकि इस मुद्दे पर मैंने 11 मार्च 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और लिखित पत्र सौंपा। उन्होंने प्रदेश के विभिन्न जिलों में दलितों की उपजातियों के नाम वाले गांवों की सूची दी और तत्काल नाम परिवर्तन की मांग की।
उदाहरण गांव (सूची से): जालौन: चमारी, चमरौआ, चमेद, चमरसेना (कल्पी तहसील में चमारी),
इटावा: चमरौली, उन्नाव: भंगियाना, झांसी: चमरौआ, लखनऊ: चमरान खेड़ा (या चमरन खेड़ा),
हरदोई: नटपुरवा, अन्य: रामपुर में चमरूआ, आदि लगभग सभी जिलों में मौजूद हैं। इस संबंध में
बहुजन शशक्तिकरण संघ ने भी अलग पत्र में जालौन के चमारी गांव का नाम प्रेरणादायक नेताओं (जैसे डॉ. आंबेडकर) के नाम पर बदलने की मांग की। इस मामले में मुख्यमंत्री ने पूरी बात सुनी और जिलों से सूची मंगाकर शीघ्र कार्यवाही करने का भरोसा दिया। जिलाधिकारियों से प्रस्ताव मांगे जाएंगे।
वर्तमान स्थिति (21 मार्च 2026 तक): अभी कोई आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन नहीं जारी हुआ है, लेकिन प्रक्रिया शुरू होने की तैयारी है। योगी सरकार ने पहले भी अन्य गांवों (जैसे उरमुरा किरार, हरिनगर) के नाम बदले हैं, इसलिए यह मांग तेजी से आगे बढ़ सकती है।

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