हम आज भी मैकाले की शिक्षा प्रणाली के गुलाम हैं

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लार्ड मैकाले स्वयं बैरिस्टर था और चाहता था कि अदालतों की भाषा अंग्रेजी हो

शिवचरण चौहान (वरिष्ठ पत्रकार )

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में इतिहास को मोड़ देने वाली एक घटना घटी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के डायरेक्टरों ने इस बात पर विचार किया कि भारत में शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाये या अंग्रेजी में? उनकी शासन-सत्ता में भागीदार भारतीयों का यह मत था कि शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाये। परन्तु टामस बबिंगटन मेक का (जो बाद में लार्ड मैकाले के नाम से जाना गया) मत इसके विरुद्ध था। वह स्वयं बैरिस्टर था और चाहता था कि अदालतों की भाषा अंग्रेजी हो। जिसके द्वारा इंग्लैंड का ‘कॉमन ला’ यहाँ भी लागू किया जा सके। इसीलिए मैकाले की योजनानुसार शिक्षा को अंग्रेजी के माध्यम से दिये जाने की व्यवस्था की गयी। शिक्षा को नौकरियों से जोड़ दिया गया और परिणामतः सरकारी कामकाज में भी अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ने लगा। अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षित व्यक्तियों को सरकारी सेवाओं में लिए जाने से सरकारी काम अंग्रेजी में चलने लगा। एक बार मैकाले ने कलकत्ता से अपने फादर/ पिता को पत्र लिखा। पत्र को पढ़ने से पता चलता है कि उनका लक्ष्य क्या थाः।

पत्र का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है
‘प्रिय पिता जी,
हमारे अंग्रेजी स्कूलों की बड़ी आश्चर्यजनक प्रगति हो रही
है। जरूरत भर के लोगों को अंग्रेजी शिक्षा देने की हम बहुत कोशिश कर रहे हैं-कहीं-कहीं यह कार्य मध्यम ही बताया जा सकता है। केवल हुगली नामक एक नगर में डेढ़ हजार लड़कों को अंग्रेजी शिक्षा दी जाती है। हिन्दुओं पर इस शिक्षा का गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कोई भी हिन्दू अपने धर्म में विश्वास नहीं रखता। केवल इने-गिने लोग दिखावटी तौर पर विश्वास रखते हैं। यद्यपि बहुत से लोग अपने को आस्तिक कहते हैं। लेकिन कुछ ईसाई धर्म में दीक्षित भी हैं। यदि हमारी शिक्षा योजना मजबूती के साथ प्रचलित रहेगी तो तीस साल के अंदर बंगाल के प्रतिष्ठित परिवारों में कोई मूर्ति पूजक नहीं रह जायेगा, इसका मुझे अटल विश्वास है। हम धर्म परिवर्तन की योजना के बिना ही यह सब सिद्ध कर सकते हैं।| ज्ञान एवं मनन् से भी यह अनायास सिद्ध हो सकता है। धार्मिक स्वतंत्रता से इसका किसी तरह विरोध नहीं होगा। सुदूर भविष्य की इस सम्भावना से मैं हार्दिक आनन्द का अनुभव कर रहा हूं।
आपका प्रिय पुत्र
मैकाले

मैकाले की संभावना सच साबित हुई। आज हम उसी की शिक्षा प्रणाली पर चल कर काले अंग्रेज बन गए हैं। हम अपनी भाषा, धर्म, संस्कृति भूल गए हैं। गले में टाई बांधते हैं और फर्राटे से अंग्रेजी बोलते हैं। हमारे रिश्ते अब मम्मी डैडी, अंकल, आंटी और न जाने क्या क्या हो गए है! अंग्रेज भले ही भारत से चले गए हों हम आजाद कहलाने लगे हैं पर हम अभी अंग्रेजी के गुलाम हैं। अंग्रेजों के मानसिक गुलाम हैं। हिंदी हमारी अभी भी राष्ट्रभाषा नहीं बनी है। मैकाले मरा नहीं है अभी जिंदा है और भारत में अपने अभियान में लगा है और हम टीचर डे मना रहे हैं!

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