अभी से रुलाने लगीं गर्मियां

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गर्मी का कहर , तपते गांव -शहर

        शिवचरण चौहान

इस बार गर्मियां कहर बरपा रही हैं। गर्मी का प्रकोप पिछले कई सालों से इस साल 2026 में सबसे अधिक दिखाई पड़ रहा है। अभी मार्च महीना बीता है और अप्रैल चल रहा है सूरज से आग बरस रही है। दिन में लू चल रही है और रात में मच्छर और गर्मी मनुष्य को बेहाल कर रहे हैं। पारा 45 46 डिग्री तक जा पहुंचा है अभी यह हाल है तो मई जून में पारा 50 से 55 पार कर जाएगा, ऐसी आशंका वैज्ञानिक व्यक्त कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन और अमेरिका ईरान युद्घ, रूस यूक्रेन इजरायल लेबनान गाजा युद्ध में बरसाई जा रही बारूद के कारण अंटार्कटिका और आर्टिका में समय से पहले गर्मी का मौसम आ गया है। समय से पूर्व फूल खिले और समय से पहले पेंग्विन पंछियों ने अंडे दिए । बर्फ पिघलने के कारण समुद्र का जल स्तर बढ़ने लगा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2026 की गर्मियां खतरनाक होंगी। अमेरिका इराब, रूस और यूक्रेन और इसराइल लेबनान के युद्ध में इतनी ज्यादा बारूद का प्रयोग किया गया है कि आसमान थर्रा उठा है।

भारत से ईरान में आने वाली गर्म हवाएं समय से पहले मार्च में ही आ गईं। कई जिलों में लू चल रही है। भारत में राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश तक मध्य मार्च में ही पारा 40 से 46 डिग्री तक पहुंच गया। रात का पारा भी 28 और 30 डिग्री के बीच चल रहा है। कोयले की कमी के कारण बिजली का उत्पादन भी कम होगा और बिजली कटौती का दंश राजस्थान और उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा लगेगा। अत्यधिक कार्बन का उत्सर्जन वन विनाश के कारण यह गर्मियां और विकराल होंगी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह सबसे खराब समय है मनुष्य के जीवन के लिए। हमारे वैज्ञानिक भी यही चेतावनी दे रहे हैं कि दुनिया की जलवायु खराब हो गई है। भूमिगत जल सूख रहा है गंदा हो गया है पीने लायक नहीं है और गांव शहरों की हवा भी विषैली हो गई है। गंगा यमुना सहित सभी नदियां खतरनाक स्तर पर गंदी हो गई हैं। कभी इन नदियों का पानी पीने के काम आता था आज इन नदियों का जल आचमन लायक भी नहीं बचा।

इस वर्ष मार्च के आखिर और अप्रैल के शुरू होते ही नवरात्र और रमजान आ गए थे । लोगों को भयंकर गर्मी के चलते बहुत परेशानी का सामना करना पड रहा है। चैत वैशाख में इतनी गर्मी तो सवा सौ साल में नहीं पड़ी। जो 20 26 में पड़ रही है। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई की अर्धाली याद आती है__बारिधि तपत तेल जनु बरिसा। आसमान से कढ़ाई में गर्म किया हुआ तेल जैसे बरसाया जा रहा हो ऐसे ही गर्मी पड़ रही है। जीव जंतु मनुष्य पेड़ पौधे और सारी प्रकृति बेहाल है। कृषि विभाग ने कहां है कि उत्तर प्रदेश के 67 जिले गर्मी की चपेट में आ गए हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार , हरियाणा ,मध्य प्रदेश और पंजाब और दिल्ली इस समय भयंकर गर्मी की मार झेल रहे हैं। इतनी भयंकर गर्मी पिछले 112 साल में नहीं पड़ी। मौसम विभाग की सारी घोषणाएं झूठी साबित हो रही है। घाघ भड्डरी की कहावतें गलत निकल गई। वैज्ञानिकों का कहना है ऐसा जलवायु परिवर्तन / ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहा है। चंद्रमा खिसक रहा है और सूरज में सौर तूफान आ रहा है जो धरती के लिए शुभ संकेत नहीं है। कनाडा जैसे ठंडे देश में पारा भी ऊपर जा रहा है। तालाबों , झीलों और यहां तक कि समुद्र तक का पानी सूरज की आग में खौल रहा है। ऐसे में बिजली की कटौती कोढ़ में खाज साबित हो रही है।

यमुना सूख रही है और भूगर्भ जलस्तर इतने नीचे चला गया है कि पानी प्राप्त करना बहुत मुश्किल है। ऐसा हाल कमोबेश पूरे भारत का हो रहा है। पहले तालाब और झील गांव गांव में होते थे जिससे भूगर्भ जल संतुलन बना रहता था। बरसात का पानी गांव के तालाबों में भर जाता था और जमीन के नीचे पानी की कमी नहीं होती थी। सरकार की गलत नीतियों के कारण रिंगबोर और घर घर सबमर्सिबल पंप लग जाने के कारण भूगर्भ जल समाप्त होने की स्थिति में आ गया है। वैज्ञानिकों ने आधे से ज्यादा भारत को भूगर्भ जल रहित क्षेत्र घोषित किया हुआ है किंतु फिर भी कोई नहीं मानता।

पहले लोग गांव गांव में तालाब और झील खुदवाते थे। कूप , बाबड़ी बनवाते थे प्याऊ बैठाते थे।आज के लोगों ने तालाबों और झीलों को पाटकर अपने घर बना लिया है ।नदियों को संकरा कर दिया है। आसमान सेआग बरस रही है। अगर 20 26 में ऐसी गर्मी पड़ती रही तो जीवन जीना बहुत मुश्किल हो जाएगा। हालात अनियंत्रित हो जाएंगे। यह संकट यकायक नहीं आ गया है। मानव जाति का लाया हुआ है। हम इतने विकासशील हो गए हैं कि अपना भला बुरा भूल गये और पर्यावरण को अकल्पनीय क्षति पहुंचाई। कार्बन गैसों का इतना उत्सर्जन किया की हमारी जलवायु खराब हो गई। पर्यावरण बिगड़ गया और आज हम रोने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

भीषण गर्मी और आसन्न अकाल का संकट देख कर भी हमारी सरकार कुछ नहीं कर रही है। हाथ पर हाथ धरे बैठी है। भयंकर गर्मीको देखकर कभी प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रताप नारायण मिश्र ने लिखा था ज्वार की पत्तियां सूरज की गर्मी में सूखकर बत्तियां बन गई है। आज यही हाल है। बिहार उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश राजस्थान हरियाणा पंजाब दिल्ली जहां-जहां भी धान गेहूं की खेती होती है वहां के किसान परेशान दिखाई दे रहे हैं। गेहूं की कटाई के बाद लोग ज्वार बाजरा मक्का बो देते हैं। सब्जियों की खेती भी करते हैं किंतु भयंकर गर्मी के कारण पानी सूख जा रहा है।
खाड़ी युद्ध के कारण डीजल और पेट्रोल के दाम ₹100 के ऊपर हो गए हैं। रसोई गैस से लेकर सीएनजी सीएनजी महंगी हो गई और बिजली की दरें भी महंगी है। बिजली का बिल माफ करने के वादे झूठे निकल गए। जब बिजली ही नहीं आएगी पंखे कूलर और एसी कैसे चलेंगे। गरीब लोग तो पंखे कूलर और एसी की कल्पना भी नहीं कर सकते। देश के 80 करोड़ लोग 5 किलो गेहूं चावल से ही जीवन यापन कर रहे हैं उन्हें तो पेड़ की छांव भी नसीब नहीं होगी।बिजली आती नहीं है तो खेत में पानी किसान कहां से लगाएं। इस साल खेती की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाने वाली है क्योंकि डीजल पहले से बहुत महंगा हो चुका है रासायनिक खाद के दाम आसमान में पहुंच गए हैं और हर क्षेत्र में महंगाई है। अगर सूखा पड़ गया तो अकाल सारे भारत को प्रभावित करेगा अभी तो सरकार 5 किलो गेहूं चावल देकर गरीब जनता को जिलाए हुए हैं जब धान ही नहीं होगा तो चावल कहां से आएगा। ज्वार बाजरा मक्का पहले ही सूखे जा रहे हैं। पूरी खरीफ की फसल संकट में पड़ी है पर किसान के अलावा किसी को चिंता नहीं है।

बंगाल की खाड़ी से आने वाला मानसून का कोई ठिकाना नहीं होता। इस बार ,मई जून गर्मी कितनी भयंकर पड़ेगी इसको सोच कर ही दिल सिहर उठता है। इस बार गर्मी मेएक शताब्दी के रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया है। समय रहते सरकार को आने वाले सूखे और अकाल को लेकर योजनाएं बनानी चाहिए। भारतीय कृषि तो सदियों से मानसून का जुआ रही है। इंद्रदेव मेहरबान हुए तो ठीक वरना किसान के माथे पर बर्बादी लिखी होती है। ग्लासगो में हुए जलवायु परिवर्तन का इस बार भी कोई हल नहीं निकल सका। भारत में 2027 से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने का वचन दिया है किंतु 2027 तक तो हालत बहुत खराब हो जाएंगे। सड़क पर चलने वाले पेट्रोल और डीजल के वाहन बहुत अधिक प्रदूषण फैलाते हैं ध्वनि प्रदूषण भी बहुत होता है। इस कारण भारत के अधिकांश शहरों की वायु प्रदूषित हो गई है। इस करना टीबी cancer asthma कैंसर अस्थमा जैसी अनेक बीमारियां होने लगी है। जलवायु परिवर्तन के कारण मधुमक्खियां भंवरे चिड़ियां बहुत कम हो गई हैं। 4जी और 5G मोबाइल टेलीफोन नेटवर्क के कारण जलवायु पर बुरा प्रभाव पड़ा है। अब यह सिर्फ सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वह खतरनाक स्तर तक बिगड़ी हुई जलवायु के सुधार के लिए खुद प्रयास करे। पेट्रोल डीजल वाले वाहनों का कम उपयोग करे। जल का अंधाधुंध दोहन ना करे। खाली पड़ी जमीन पर पौधे लगाए घर पर भी पौधे लगाए और चिड़ियों के लिए दाना पानी रखे। बिगड़ी हुई जलवायु अपने आप तो सुधार नहीं जाएगी इसके लिए सभी को मिलजुल कर प्रयास करने होंगे वरना गर्मियां खतरनाक संकेत दे रही हैं। अभी नहीं चेते तो फिर बहुत देर हो जाएगी।

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