प्रकाशकों ने पुस्तक व्यवसाय से अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए

शिवचरण चौहान
पाठकों का ध्यान किताबों की तरफ से हटने के कारण प्रकाशकों ने पुस्तक व्यवसाय से अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए। अब बहुत से प्रकाशक लेखक से पैसा लेकर ही किताब छापते हैं। पहले केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपने कर्मचारियों के लिए पुस्तकालय संचालित करती थीं। इन पुस्तकालयों के लिए सरकारें लेखकों और प्रकाशकों से सीधे किताबें खरीदती थी किंतु पिछले कुछ सालों से सरकार ने किताबों की खरीद बंद कर दी है। किताब की सरकारी खरीद ना होने से प्रकाशक भी इस धंधे से किनारा करने लगे हैं।
केंद्र सरकार ने प्रकाशन विभाग स्थापित किया हुआ है/ संचालित किया हुआ है। प्रकाशन विभाग सुंदर ढंग से किताब छपता और बेचता है। पूरे भारत भर की राजधानियों में उसके विक्रय केंद्र हैं यहां पर पुस्तकें बिकती हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट भी जैसे अब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास बना दिया गया है किताबें छपता है। यह दोनों संस्थान सरकारी हैं और लेखकों को पारिश्रमिक देकर किताबें छपवाते हैं और जनता के बीच में बेंचते हैं। पर इधर कुछ सालों से सरकार ने प्रकाशन विभाग और नेशनल बुक ट्रस्ट का बजट नहीं बढ़ाया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन की हालत में खस्ता है। इनके पास भी बजट सरकार द्वारा दिया जाता है किंतु प्रसार भारती बन जाने के कारण दूरदर्शन और आकाशवाणी के सामने अच्छे कार्यक्रम प्रस्तुत कर पाने के लिए बजट ही नहीं है। सरकार सिर्फ अपने कार्यों के प्रचार प्रसार के लिए समाचार प्रभाग को ही बजट देती है।
पिछले कुछ सालों से ई बुक, ई न्यूज़ पेपर, ईमैग्जीन का प्रचलन बढ़ा है किंतु यह मुद्रित किताबों की जगह नहीं ले सकता। जिस तरह से आकाशवाणी दूरदर्शन और चैनलों के कार्यक्रम हवा में विलीन हो जाते हैं उसी प्रकार गूगल की किताबें हवा में विलीन हो जाती हैं। जब तक इन्हें सेव करके ना रखा जाए।
किताबें किसी देश के इतिहास संस्कृति भूगोल विज्ञान विज्ञान और प्रगति को समझने का सबसे बड़ा साधन होती हैं किंतु जब किताबें ही नहीं रहेंगी तो हमारा इतिहास संस्कृति ज्ञान विज्ञान कैसे सुरक्षित रहेगा। हमें बढ़ती हुई गूगल संस्कृति को रोकना होगा नियंत्रित करना होगा। गूगल संस्कृति हमारे देश में तो सबसे बाद में आई है पहले अमेरिका और चीन में इसके परिणाम और दुष्परिणाम देखे जा चुके हैं। इसलिए सरकार स्वयंसेवी संस्थान स्कूल कॉलेज के प्रबंधकों अध्यापकों को एक अभियान चलाना पड़ेगा जिससे पुस्तक संस्कृति बचाई जा सके लोगों में पुस्तक पढऩे की आदत विकसित की जा सके।
शेक्सपियर अपने समय के सबसे ज्यादा लोकप्रिय लेखक थे
23 अप्रैल 1564 को सुप्रसिद्ध अंग्रेजी कवि साहित्यकार शेक्सपियर का देहांत हुआ था। शेक्सपियर अपने समय के सबसे ज्यादा लोकप्रिय लेखक थे और 23 अप्रैल को ही विश्व पुस्तक दिवस सारी दुनिया में मनाया जाता है। भारत में पुस्तकों का एक विशाल भंडार रहा है। वेद, पुराण, उपनिषद और अनेक भाषाओं के अनेक ग्रंथ विदेशों तक में लोकप्रिय हुए हैं। बाल्मीकि ,कालिदास ,भवभूति महाकवि माघ, कल्हन से लेकर सूरदास, तुलसीदास, रहीम, कबीर रसखान ,रैदास, मलिक मोहम्मद जायसी मिर्जा गालिब अमीर खुसरो ना जाने कितने लेखक विद्वान दुनिया में जाने पहचाने और माने जाते हैं।
इनकी किताबें लोगों को रास्ता दिखलाती रही है किंतु आज गूगल युग में लोग किताबों को भूलते जा रहे हैं जबकि असली ज्ञान का भंडार किताबों में ही छिपा हुआ है। बहुत लोगों का कहना है की गूगल युग में इंटरनेट युग में धीरे-धीरे किताबें समाप्त हो जाएंगे और लोग कंप्यूटर लैपटॉप और अपने मोबाइल फोन पर ही किताबें पढ़ा करेंगे। किंतु यह कहना गलत है। गूगल के माध्यम से कंप्यूटर लैपटॉप फोन पर किताबें पढऩा बिना इंटरनेट कनेक्शन के संभव नहीं हो पाएगा और इंटरनेट कनेक्शन बहुत महंगा होता जा रहा है एक दिन ऐसा आएगा कि किताबें सस्ती पड़ेगी और इंटरनेट कनेक्शन बहुत महंगा हो जाएगा।
पिछले दिनों भारत में व्यापक पैमाने पर एक सर्वे कराया गया था जिससे पता चला है कि 96 प्रतिशत लोगों के पास मोबाइल फोन है। 75 प्रतिशत लोगों के घरों में टेलीविजन सेट हैं। 55 फीसदी लोगों के पास कंप्यूटर लैपटॉप अथवा टेबलेट है। सरकारों ने भी विद्यार्थियों के लिए जी खोलकर फोन लैपटॉप कंप्यूटर बांटे हैं। गांव गांव तक वाई फाई की सुविधा दी गई है किंतु यह सब बहुत महंगे साधन है इनके लिए इंटरनेट कनेक्शन बहुत जरूरी है जो अगर किसी दिन ध्वस्त हो गया तो कुछ भी नहीं देख पढ़ पाएंगे। इंटरनेट कनेक्शन के भी दोष होते हैं हम फिर आदिम युग में लौट जाएंगे। जबकि पुस्तकें सदैव हमारे पास बनी रहेंगी और हमें ज्ञान देती रहेंगी राह दिखाती रहेंगी।
सर्वे में भारत में सिर्फ 10त्न लोगों के घरों में किताबों और पत्र-पत्रिकाओं के प्रति लगाव देखा गया। पिछले सालों में कोरोना के समय में ब्रिटेन जैसे देशों में सर्वे कराया गया था जिस में पता चलता है कि ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र फिसड्डी होते जा रहे हैं। उन्हें पढऩे की रुचि नहीं होती वे गेम और अन्य किसी खेल में कंप्यूटर लैपटॉप या फोन पर समय गुजारते हैं। किताबें पढऩे से इतना अकेलापन महसूस नहीं होता था जितना अकेलापन फोन के कारण लोगों में आया है। आप एक ही घर में रहने वाले मां बेटे पिता सास और ससुर में बहुत कम संवाद होता है होता है तो लड़ाई झगड़े। ऐसे में हमें किताबों की और फिर लौटना पड़ेगा वरना यह विशाल दुनिया अकेलेपन से घिर जाएगी। लोगों में अवसाद के मरीज बढऩे लगेंगे। और तब डॉक्टर सलाह देंगे की आपस में मिलजुल कर बात करिए किताबें पढ़िए हंसी मजाक करिए।
पुस्तक प्रकाशन के व्यवसाय से लाखों लोग जुड़े होते हैं लाखों लोगों को उससे लाभ होता है और लाखों लोग तरक्की करते हैं। पुस्तकों की संस्कृति बचा कर रखिए लुप्त मत होने दीजिए। पुस्तके हमारी संस्कृति हैं इतिहास हैं भूगोल हैं ज्ञान हैं विज्ञान है। पुस्तक है तो जहान है जान है। अभी भी समय है पुस्तकों की ओर लौट आइए। अभी तो आप कुछ घंटे के लिए इंटरनेट कनेक्शन चले जाने पर बेचैन हो जाते हैं फिर अगर परमानेंट ही कनेक्शन चला गया तो क्या होगा जरा सोचिए।