अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं कई वैश्विक गठबंधन

अली हसन
(वरिष्ठ पत्रकार )
भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के संबंध आज केवल औपचारिक कूटनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं रह गए हैं। बीते कुछ वर्षों में ये रिश्ते एक ऐसी रणनीतिक साझेदारी के रूप में विकसित हुए हैं, जो आपसी विश्वास, साझा दृष्टिकोण और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर गढ़ी गई है। हाल ही में नई दिल्ली में हुआ उच्चस्तरीय संवाद इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि भारत–यूएई संबंध अब व्यापार और निवेश से आगे बढ़कर ऊर्जा, रक्षा, स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था और नीति-निर्माण जैसे व्यापक क्षेत्रों में गहराई से जुड़ चुके हैं।
वरिष्ठ यूएई नेतृत्व की हालिया भारत यात्रा इस विकासक्रम का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा सकती है। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान ने किया, जिन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से विस्तृत और सार्थक चर्चा की। यह मुलाकात केवल शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि इसने यह रेखांकित किया कि भारत और यूएई के रिश्ते पारंपरिक कूटनीति से आगे निकलकर अब एक भविष्य-उन्मुख रणनीतिक साझेदारी का स्वरूप ले चुके हैं।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा संकट, आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ देशों को नए सिरे से अपने साझेदारों पर भरोसा करने के लिए मजबूर कर रही हैं। ऐसे समय में भारत और यूएई ने यह स्पष्ट किया है कि वे अब केवल आर्थिक सहयोगी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोगी हैं। नई दिल्ली में हुई बातचीत के दौरान इस साझा समझ का स्पष्ट प्रतिबिंब देखने को मिला।
बैठक के एजेंडे में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने वाले व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) की प्रगति की समीक्षा प्रमुख रही। इस समझौते ने भारत–यूएई आर्थिक रिश्तों को नई गति दी है। इसके तहत भारतीय निर्यातकों को यूएई के बाजारों तक बेहतर पहुँच मिली है, वहीं यूएई के निवेशकों के लिए भारत के विनिर्माण, बुनियादी ढाँचे और सेवा क्षेत्रों में नए अवसर खुले हैं। CEPA ने दोनों देशों के बीच व्यापार को अधिक सुगम, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाया है।
ऊर्जा सहयोग भारत–यूएई संबंधों का पारंपरिक आधार रहा है, लेकिन अब इसका स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहाँ यह संबंध मुख्य रूप से तेल और गैस तक सीमित था, वहीं अब इसमें नवीकरणीय ऊर्जा, सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएँ, ग्रीन हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण जैसी आधुनिक अवधारणाएँ शामिल हो चुकी हैं। भारत के ऊर्जा संक्रमण और कार्बन न्यूट्रैलिटी लक्ष्यों के लिए यूएई एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभर रहा है, जबकि यूएई को भारत जैसे विशाल और उभरते बाजार के साथ दीर्घकालिक ऊर्जा सहयोग का अवसर मिल रहा है।
रक्षा और सुरक्षा सहयोग भी इस रणनीतिक साझेदारी का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रौद्योगिकी में सहयोग और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की बढ़ती सहभागिता आपसी विश्वास को और मजबूत करती है। यह सहयोग न केवल द्विपक्षीय सुरक्षा हितों को साधता है, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने में भी सहायक है।
डिजिटल परिवर्तन और स्टार्टअप सहयोग भारत–यूएई संबंधों का अपेक्षाकृत नया, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम है। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र आज वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। दूसरी ओर, यूएई, विशेषकर दुबई और अबू धाबी, खुद को वैश्विक नवाचार और निवेश केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है। इस साझेदारी के माध्यम से भारतीय स्टार्टअप्स को यूएई के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच मिल रही है, वहीं यूएई के निवेशकों को भारत के फिनटेक, हेल्थटेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लीनटेक जैसे क्षेत्रों में निवेश के आकर्षक अवसर मिल रहे हैं।
भारत के लिए यूएई के साथ गहरा जुड़ाव कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यह साझेदारी भारत को वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुँच, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि, ऊर्जा संक्रमण में सहयोग और पश्चिम एशिया में रणनीतिक संतुलन प्रदान करती है। यूएई भारत के लिए केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद रणनीतिक मित्र के रूप में उभरा है।
वहीं यूएई के लिए भारत का महत्व भी उतना ही व्यापक है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसके पास विशाल उपभोक्ता बाजार, कुशल मानव संसाधन और नवाचार की अपार संभावनाएँ हैं। भारत के साथ मजबूत संबंध यूएई को दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा तथा वैश्विक मंच पर एक विश्वसनीय साझेदार प्रदान करते हैं।
आज जब कई वैश्विक गठबंधन अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं, भारत–यूएई साझेदारी अपनी स्पष्ट दिशा और रणनीतिक परिपक्वता के कारण अलग पहचान बनाती है। यह रिश्ता केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापार, प्रौद्योगिकी, सतत विकास और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे वैश्विक मुद्दों पर संयुक्त समाधान प्रस्तुत करता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत–यूएई संबंध अब केवल लेन-देन आधारित नहीं रहे हैं। हालिया उच्चस्तरीय संवाद इस बात का प्रमाण है कि दोनों देश मिलकर भविष्य के लिए तैयार समाधान गढ़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह रिश्ता अब परिवर्तनकारी बन चुका है—एक ऐसी साझेदारी, जो आने वाले वर्षों में न केवल भारत और यूएई की समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगी, बल्कि वैश्विक सहयोग का एक नया मानक भी स्थापित करेगी।