कांशीराम और बहुजन आंदोलन

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कांशीराम ने नौकरी छोड़ दी और सामाजिक आंदोलन शुरू किया

               डॉ. उदितराज (पूर्व सांसद)

कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को रोपड़ जिले के खवासपुर गांव में एक साधारण दलित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम हरि सिंह और माता का नाम बिशन कौर था। ये एक दलित रामदासिया सिख परिवार से थे। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त करने के बाद उन्होंने विज्ञान विषय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन में वैज्ञानिक सहायक के रूप में नौकरी की। कांशीराम उस समय पुणे में स्थितडी आरडीओ की प्रयोगशाला में कार्यरत थे। वहां एक दिन कार्यालय में छुट्टियों की सूची से अंबेडकर जयंती की छुट्टी हटा दी गई थी और उसकी जगह किसी अन्य धार्मिक पर्व की छुट्टी रख दी गई थी। जब एक दलित कर्मचारी, दीना भाना, ने इसका विरोध किया और कहा कि डॉ. अम्बेडकर दलितों के आदर्श और संविधान के निर्माता हैं, इसलिए उनकी जयंती की छुट्टी रहनी चाहिए, तो प्रबंधन ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे अनुशासनहीनता के आरोप में दंडित कर दिया। यह घटना कांशीराम को बहुत गहराई से झकझोर गई। उन्हें महसूस हुआ कि जिस व्यक्ति ने भारत का संविधान बनाया, उसी के अनुयायियों और समाज के साथ आज भी भेदभाव किया जा रहा है नौकरी के दौरान उन्हें समाज में मौजूद जातिगत भेदभाव और असमानता को करीब से देखने का अवसर मिला। यही अनुभव आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदलने का कारण बना।

कांशीराम का प्रसिद्ध नारा था ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी

1960 के दशक में उन्होंने यह निश्चय किया कि वे अपना पूरा जीवन समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित करेंगे। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और सामाजिक आंदोलन शुरू किया। उनका मानना था कि जब तक दलित और पिछड़े वर्ग राजनीतिक रूप से संगठित नहीं होंगे, तब तक उन्हें अधिकार और सम्मान नहीं मिलेगा। कांशीराम ने सबसे पहले सरकारी कर्मचारियों को संगठित करने का प्रयास किया। 1978 में उन्होंने बामसेफ की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक कर्मचारियों को सामाजिक जागरूकता के लिए तैयार करना था। इसके बाद उन्होंने 1981 में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) की स्थापना की। इसका नारा था ‘ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस-4।’ इस संगठन का उद्देश्य दलितों और पिछड़ों को सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के लिए तैयार करना था। कांशीराम का सबसे बड़ा योगदान 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना करना था। इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों को राजनीतिक शक्ति दिलाना था। कांशीराम का प्रसिद्ध नारा था ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। ‘

कांशीराम का मानना था कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम राजनीतिक शक्ति है

उन्होंने बहुजन समाज की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने के लिए पूरे देश में यात्रा की और लोगों को संगठित किया। उनकी मेहनत का परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे बसपा एक मजबूत राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी। उन्होंने मायावती को राजनीति में आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया और उन्हें नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी। मायावती आगे चलकर उ.प्र. की चार बार मुख्यमंत्री बनीं। कांशीराम का मानना था कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम राजनीतिक शक्ति है। वे कहते थे कि जब तक बहुजन समाज के लोग सत्ता में भागीदारी नहीं करेंगे, तब तक उनके जीवन में वास्तविक परिवर्तन नहीं आएगा। उन्होंने देशभर में हजारों सभाएं कीं, यात्राएं निकालीं और लोगों को संगठित किया। उनके प्रयासों से लाखों लोगों में राजनीतिक चेतना आई। उनके आंदोलन ने भारतीय राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण स्थापित किया, जिसे ‘बहुजन राजनीति’ के रूप में जाना जाता है।

मलेशिया की राजधानी कौलालम्पुर में विश्व दलित सम्मेलन का आयोजन 1998 में हुआ, जिसमें कांशीराम जी, रामविलास पासवान जी, फूलन देवी जी सहित अन्य लोग भारत से आमंत्रित किये गए थे और मैं भी पहुंचा। दक्षिण भारत से गए दलितों की अच्छी संख्या वहां पर अतीत में जाकर बस गई थी और पंजामूर्ति वहां के सांसद थे और उन्हीं की अगुवाई में सम्मेलन आयोजित किया गया था । कांशीराम जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत में सभी बहुजन जातियों का इतना संगठन खड़ा करेंगे कि सवर्ण चिल्लाने लगेंगे। मैं चौका कि ये तो जातियों का संगठन खड़ा करने की बात कर रहें हैं जबकि डॉ. अंबेडकर जाति विहीन समाज बनाना चाहते थे। 2001 में अनुसूचित जाति / जनजाति संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ द्वारा दस लाख दलितों को बौद्ध बनाने की घोषणा किया तो दलितों में एक बड़ा विमर्श पैदा हो गया। भोपाल में कांशीराम जी से कुछ लोगों ने पूछा तो उन्होंने कहा कि वे करोड़ों लोगों के साथ दीक्षा लेंगे।

एक दिन कांशीराम जी  के सचिव गौतम ने कहा कि बहन जी को ख़बर लग गई है कि मैं साहब के बहुत करीब हो गया हूं : डॉ. उदितराज

इसका असर पड़ा कि कुछ लोग इस बड़ी घोषणा के कारण नहीं शामिल हुए। 1996 में कुछ महीनों के लिए मैं उनके बड़े करीब था और यह कैसे हुआ, पता न चला। उस समय मायावती जी उ.प्र. की सीएम थीं और दिल्ली के हुमायूं रोड स्थित आवास पर कांशीराम जी रहते थे और मैं अक्सर चला जाता था और कभी नहीं जा पाते थे तो वे बुला लेते थे। एक दिन उनके सचिव गौतम ने कहा कि बहन जी को ख़बर लग गई है कि मैं साहब के बहुत करीब हो गया हूं। वो बताते थे कि मायावती जी नियमित रूप से ख़बर लेती थीं कि कौन आता – जाता था। उनकी बहन मुन्नी भी ताक-झांक करती रहती थीं। गौतम ने मुझे बताया कि आप की ख़बर बहन जी तक पहुंच गई है, अत: बच के रहें। इस तरह से अचानक मैंने आना-जाना बंद कर दिया और जब कभी उसके बाद मिले भी तो पूछा क्यों नहीं मिलते, जवाब क्या देना था। उस समय तक यह बात सबकी समझ में आ गई थी कि कोई कितना करीब कांशीराम जी के हो, अगर मायावती की नज़र में चढ़ गया तो कोई बचा नहीं सकता।

बिना संदेह कांशीराम जी का समाज की राजनीतिक जागृति करने में योगदान रहा है लेकिन कुछ सवालों के जवाब मिलते नहीं। फ्री शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के कारण दलितों में मध्यम वर्ग पैदा हुआ और वही कांशीराम जी के साथ सबसे पहले तन-मन-धन से खड़ा हुआ। कुछ सवालों के जवाब मिलते नहीं जैसे उनकी आक्रामकता कांग्रेस के खिला$फ रही लेकिन आरएसएस पर कभी कुछ नहीं बोला। चमचा युग में कांग्रेस के सबसे बड़े दलित नेता जगजीवन राम जी को इतना बदनाम किया कि लोग उनसे घृणा करने लगे और मजे की बात रही कि कांग्रेस ने अनसुना किया जिसका परिणाम भुगतना पड़ा। कांग्रेस बनाम अम्बेडकर नैरेटिव के कारण दलित कांग्रेस से दूर जाता रहा और कांग्रेस चुप रही और परिणामस्वरूप उत्तर भारत में जनाधार खो बैठी। नि:संदेह कांशीराम का जीवन संघर्षों में गुजरा और व्यस्तता के कारण हो या कुछ और अपनी गिरती हुई सेहत का ध्यान नहीं दिया जिसकी वजह से जल्दी चले गए। धन और परिवार उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता था और हमेशा समाज उत्थान जीवन का मकसद था।

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