‘मैं लम्हों का मुसाफिर ‘

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मैं साँसों की स्याही से कुछ ख्वाब लिखे जाता हूँ

इरशाद राही

मैं लम्हों का मुसाफिर हूँ,
ठहरना मेरी फितरत नहीं,
जो आज दिलों में उतर गया
कल याद भी रहूँ—ज़रूरी नहीं।
मैं साँसों की स्याही से
कुछ ख्वाब लिखे जाता हूँ,
भीड़ में गुम हो जाने से पहले
ख़ुद को पढ़े जाता हूँ।
मैं मिट्टी का दिया हूँ,
हवा से रोज़ इम्तिहान है,
आज अगर लौ हूँ तो क्या
कल राख होना भी पहचान है।
मेरी हँसी में मौसम हैं,
मेरी ख़ामोशी में रात,
मैं जितना समझा जाता हूँ
उतना ही रह जाता हूँ अनकहा-सा बात।
मैं ताली का भूखा नहीं,
ना तख्त की मुझे चाह,
बस कोई एक दिल कह दे
‘तू था… और तूने छुआ। ‘
मैं वक्त की हथेली पर
लिखी एक अधूरी लकीर,
पल भर चमक के बुझ जाना
शायद यही मेरी तासीर।
अगर कल मेरा नाम
किसी को याद न भी आए,
मेरे लफ़्ज़ अगर जि़ंदा रहें
तो समझो मैं फिर लौट आए।
मैं रहने आया नहीं हूँ
मैं कहने आया हूँ कुछ,
जो दिल तक पहुँच जाए
बस वही मेरा सब कुछ।

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