कमीशन की सिफारिश ने उत्तर भारत की आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति को बदल कर रख दिया

लखनऊ। सामाजिक चेतना फाउंडेशन न्यास के महासचिव महेंद्र मंडल ने बीपी मंडल की जयंती के मौके पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर उन्होंने कहा कि हम सभी बहुजनों ने सुना ही होगा, यह वही संवैधानिक कमीशन है, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग का 27 प्रतिशत आरक्षण (प्रतिनिधित्व) सुनिश्चित हो सका।
बीपी मंडल की सिफारिशों ने समाज के पिछङे-बहुजनों को मुख्यधारा में लाने का बड़ा काम किया। वर्ष 1990 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने, दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे आमतौर पर “मंडल आयोग” के रूप में जाना जाता है, की एक सिफ़ारिश को लागू किया गया था।
यह सिफारिश पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी। इसी एकमात्र लागू की गयी सिफारिश ने भारत, खासकर उत्तर भारत की आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति को बदल कर रख दिया। इसी मंडल आयोग के अध्यक्ष थे-बिंदेश्वरी प्रसाद ‘मंडल’ यानी बी. पी. मंडल जी।
महेंद्र मंडल ने कहा कि जनता पार्टी के कार्यकाल में बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल जी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया और इस आयोग को भारत के सामाजिक शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों के विषय में रिपोर्ट तैयार करने का कार्य सौंपा गया। काका कालेलकर आयोग के इतर इस आयोग का गठन वर्ष 1978 में किया गया था और इस आयोग ने वर्ष 1931 की जातिगत जनगणना के अनुसार अपनी रिपोर्ट वर्ष 1980 में तैयार की थी। इस आयोग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी को उन्होंने शानदार तरीके से निभाते हुए उन्होंने रिपोर्ट तैयार करने के लिए पूरे देश का भ्रमण व अध्ययन किया और 3743 पिछड़ी जातियों की पहचान करते हुए उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की सिफारिश की।

इसी रिपोर्ट को “मंडल कमीशन रिपोर्ट” कहते हैं। यह भी माना जाता है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद ही बिहार और उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों से पिछड़ी जातियों ने नेता आगे आने लगे।
सामाजिक चेतना फाउंडेशन न्यास के महासचिव ने कहा कि मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने से दलित और खासतौर पर पिछड़ा वर्ग राजनीति में सक्रिय हुआ, इसे भारतीय राजनीति में साइलेंट रिवॉल्यूशन(चुपचाप क्रांति होना) का दौर भी कहा गया।
इस कमीशन द्वारा बनाई गई रिपोर्ट में बहुत सारी सिफारिशें की गई थीं, जिसमें से नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की सिफारिश की गयी थी। कई पिछङे नेताओं व महत्वपूर्ण रूप में तत्कालीन बामसेफ व DS-4 के संस्थापक व बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी के अथक प्रयास एवं उनके इस नारे- “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” और “मंडल कमीशन लागू करो, वरना कुर्सी खाली करो” ने समाज के पिछङे वर्ग को उनकी आबादी 52 प्रतिशत होने का पहली बार एहसास कराया।
कांशीराम जी के आंदोलन ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कराने का ऐतिहासिक दबाव बनाया, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1990 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की अधिसूचना जारी की, जिसको लेकर देश के कई सारे हिस्सों में विरोध भी हुआ था।