फासीवादी मनुवादी प्रशासन द्वारा विद्यार्थियों पर भविष्य में किसी भी पाठ्यक्रम में प्रवेश पर रोक, ₹10,000 से ₹12,000 तक का जुर्माना, रस्टिकेशन (Expulsion), सस्पेंशन, आउट ऑफ बाउंड जैसी कार्रवाइयाँ की गईं
लखनऊ। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (BBAU) के छात्रों ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा न्याय और अधिकारों की मांग करने वाले छात्रों के विरुद्ध दमनात्मक एवं अन्यायपूर्ण कार्रवाई की जा रही है। लखनऊ प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में छात्रों ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने आंदोलन एवं लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाले छात्रों के विरुद्ध अत्यंत कठोर एवं असंगत अनुशासनात्मक कार्रवाइयों की हैं।

फासीवादी मनुवादी प्रशासन द्वारा विद्यार्थियों पर भविष्य में किसी भी पाठ्यक्रम में प्रवेश पर रोक, ₹10,000 से ₹12,000 तक का जुर्माना, रस्टिकेशन (Expulsion), सस्पेंशन, आउट ऑफ बाउंड जैसी कार्रवाइयाँ की गई हैं तथा कुछ मामलों में चरित्र प्रमाण-पत्र (Character Certificate) जारी करने पर भी रोक लगाने जैसे निर्णय लिए गए हैं।
छात्रों ने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाइयाँ केवल संबंधित विद्यार्थियों को दंडित करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विश्वविद्यालय परिसर में लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और छात्र हितों की आवाज़ को दबाने का प्रयास हैं। उन्होंने प्रशासन से इन सभी दंडात्मक आदेशों को तत्काल वापस लेने तथा छात्रों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करने की मांग की। विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय परिसर को आर एस एस का अड्डा बना कर रख दिया है।
अंजली ने BAPSA से अपने संबोधन में यह बात रखी कि बीबीएयू में पिछले कुछ वर्षों से फासीवादी मनुवादी प्रशासन द्वारा यहां के न्यायप्रिय छात्रों पर लगातार दमन किया जा रहा है। जो छात्र अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हैं, उन्हें लगातार बाहर किया जाता है, डिबार, सस्पेंशन और एफआईआर कराई जाती है तथा उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
मनोज पासवान ने समाजवादी पार्टी की तरफ से अपनी बात रखते हुए कहा कि मैं भी लगातार देख रहा हूं कि बीबीएयू प्रशासन से सवाल पूछने पर छात्रों को बाहर कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में कुलपति को भी ई-मेल किया गया है और इस मुद्दे को संसद तक उठाया जाएगा।

भीम आर्मी के लखनऊ जिलाध्यक्ष अभिषेक ने बताया कि जब से भाजपा की सरकार आई है, तब से JNU, DU, BBAU जैसे तमाम संस्थाओं का बजट कम किया जा रहा है, जिसके कारण गरीब, दलित और आदिवासी समाज से आने वाले छात्रों को पढ़ने से रोका जा रहा है।
आकांक्षा आज़ाद ने BSM की तरफ से अपनी बात रखते हुए कहा कि ये फासीवादी सरकारें लगातार शैक्षणिक संस्थानों में निजीकरण करती जा रही हैं और नई शिक्षा नीति तथा HEFA जैसी चीजों को लागू करके शिक्षा को महंगा बनाया जा रहा है तथा गरीब, दलित और आदिवासी समाज के छात्रों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है।
शांतम ने All India Students Association (AISA) की तरफ से अपनी बात रखते हुए कहा कि इस देश में विश्वविद्यालयों, अस्पतालों आदि संस्थाओं का निजीकरण किया जा रहा है, जिससे गरीब, दलित और आदिवासी समाज के छात्र इन संस्थाओं तक पहुंच न पाएं। सरकार अदाणी, अंबानी जैसे पूंजीपतियों को बढ़ावा दे रही है और अपनी तमाम नीतियों के तहत उन्हें फायदा पहुंचाया जा रहा है। शैक्षणिक संस्थाओं का भगवाकरण किया जा रहा है।
नम्रता ने People for Caste Annihilation की तरफ से अपनी बात रखते हुए कहा कि इस देश में फासीवादी मनुवादी सरकार और प्रशासन द्वारा न्यायप्रिय छात्रों और संगठनों को खत्म किया जा रहा है। इस देश में तमाम आंदोलन चल रहे हैं, जैसे केन-बेतवा और नीट आंदोलन, उन आंदोलनों को बर्बरतापूर्वक अपने नाकामियों को छिपाने के लिए खत्म कराया जा रहा है। सरकार निजीकरण को बढ़ावा दे रही है और इस देश को बेचा जा रहा है।
ग्रुप कैप्टन दिनेश चंद्र ने कहा कि आज जरूरत आंदोलन की है, जो सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करे। सरकार पूरी तरह मनमानी कर रही है। आज जरूरत है कि जंतर-मंतर और देश भर में चल रहे आंदोलनों में शामिल हुआ जाए।
अब्दुल वहाब, SFI, ने कहा कि जैसे कि कैंपस और सरकार द्वारा गठित की गई कमिटी द्वारा महिला और अल्पसंख्यक के अपमानजनक सवाल पूछे गए और पूरी तरह मानसिक प्रताड़ना की गई। मनुवाद पूरी तरह खुले रूप में दिखाई दे रहा है।
डॉ. आरती, AIFB के तरफ से अपना बात रखते हुए कहती है कि इस देश के संविधान में समाजवाद लिखा फिर भी ये सरकार समाजवाद को खत्म किया जा रहा है तथा इस देश की सरकार इतनी जाहिलितीयत के साथ अपने accountablity लेने से बच रही है और जंतर मंतर आंदोलन में महिलाओं के साथ कितनी बर्बरता के साथ उनका शोषण की है और हमें एकजुटता दिखाते हुए तमाम आंदोलन और संगठनों एक जुड़ते हुए इस फासीवादी सरकार के खिलाफ आवाज उठाते रहना चाहिए
प्रेस वार्ता के दौरान छात्रों ने मीडिया के समक्ष संबंधित दस्तावेज़, आदेश एवं अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए निष्पक्ष जांच और व्यापक जनचर्चा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय जैसे लोकतांत्रिक संस्थानों में असहमति को दमन का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।