सत्ता के सपने दिखाने वाले लोगों की वजह से बहुजन समाज के लोगो ने अपने अधिकारों को बचाने का संघर्ष खत्म कर दिया

भोपाल । दलित आदिवासी माइनॉरिटी आदिवासी डोमा परिसंघ के प्रदेश एवं जिला पदाधिकारियों की गत दिवस एक बैठक होटल एल एन आई एस बी टी भोपाल में आयोजित हुई।
जिसमें मुख्य अतिथि डोमा परिसंघ के *राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद दिल्ली डॉ. उदित राज* ने कहा कि 30-35 साल से सत्ता के सपने दिखाने वाले लोगों की वजह से बहुजन समाज के लोगो ने अपने अधिकारों को बचाने का संघर्ष खत्म कर दिया।
बहुजन समाज को मिले नोकरियों में आरक्षण,पदोन्नतियां, बैकलॉग, निजीकरण के रास्ते,और एट्रोसिटी कानून को कमजोर कर दिये जाने से इन लोगों की आर्थिक सामाजिक रूप से प्रताड़ना अन्याय अत्याचार बढ़ गए।

अधिकारों को बचाने के लिए घर से बाहर निकलकर सड़कों पर आंदोलन करना होगा
उदित राज ने कहा कि सत्ता हासिल करने की सनक में कि हम देने वाले बनेंगे, जो बाबा साहब के संविधान से आर्थिक भागीदारी पेट्रोल पंपों के आवंटन, राशन की दुकानों, विशेष भर्ती अभियान के तहत लाखों लोगों को नौकरी मिली। भूमिहीन लाखों दलितों को सरकारी जमीन के पट्टे मिले। जिससे बहुजन समाज की आर्थिक सामाजिक स्थिति में बेहताशा वृद्धि हुई थी,आईआईटी और एम्स जैसे संस्थानों में बहुजनो को आरक्षण मिला।अधिकार मिला लेकिन इसके विपरीत जब कर्तव्य की बारी आई।
यूजीसी का मसला आया कोई आंदोलन देश में नहीं हुआ। मुट्ठी भर लोगों ने आंदोलन चलाकर रोक लगवा दी । तब बहुजन समाज के लोग सड़कों पर नहीं निकले और कुछ लोग जो भावनात्मक तौर पर बहुजनों के रहनुमा बनने के चक्कर में उछल कूद करते देखे जा सकते हैं। वह भी ऐसा कोई आंदोलन खड़ा न कर सके जिससे दलितों को राहत मिल सके।

डोमा परिसंघ का गठन देश की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ही किया गया। जिसमें मुस्लिम दलित आदिवासी ओबीसी वर्ग अपने अधिकारों के लिए आगे आये। उन्होंने कहा कि अधिकारों को बचाने के लिए घर से निकलकर सड़कों पर आंदोलन के बिना कुछ भी नहीं बच सकता है, यही बताने के लिए प्रेरित करता हूँ।
आजादी के 70 सालों में जो कुछ मिला था धीरे धीरे छीना जा रहा है जिस कारण हमारे समाज पर अत्याचार बढ़ गए। निजीकरण से हमारी तरक्की रुक गई लेकिन हुकमरान बनाने की सनक के चलते देश का बहुजन आंदोलन ही खत्म कर दिया जाना समझदारी नहीं कही जा सकती है। डॉ. उदित राज ने कहा कि निजीकरण के खिलाफ सबसे पहले 2005 में परिसंघ ने ही आंदोलन के जरिये देश के बहुजनों को सतर्क किया था। जिस पर उल्टे मुझे ही तमाम तरह से बदनाम किया गया था। वर्ष 2011 में जब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संदर्भ में पदोन्नति नियमों को खारिज करते हुए गलत आदिवासी कर्मचारी को बड़ी संख्या में डिमोशन करने का फरमान जारी किया। वो लडाई भी मेरे नेतृत्व में लड़ी गई। उस समय उत्तर प्रदेश में बहुजनों की सरकार होते हुए भी जन आंदोलन नहीं खड़ा किया जबकि सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय में उल्लेख किया था कि यदि सरकार चाहे तो एक्ट बनाकर पदोन्ति में आरक्षण लागू कर सकती है लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया और लाखों कर्मचारी डिमोट हो गए।
हमें अपने दोस्त और दुश्मन को पहचाना होगा, यह भी मुमकिन है कि दुश्मन हमारे लोग ही हों
डॉ. उदित राज द्वारा पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि हमें अपने दोस्त और दुश्मन को पहचाना होगा।
यह भी मुमकिन है कि दुश्मन हमारे लोग ही हों ? जो सीधे दलितों के विरोध तो नहीं करेगें लेकिन उनके क्रिया कलाप दलितों के विरोध में ही अप्रत्यक्ष रूप से हो रहे हों,यह समझना हम सब की जिम्मेदारी है। मध्य प्रदेश के कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण पर रोक का मुद्दा मैने सबसे पहले लोकसभा में उठाया। सरकार की नीतियों के कारण मध्य प्रदेश में लाखों कर्मचारियों को पदोन्नति से वंचित होना पड़ा। बैठक की अध्यक्षता करते हुए डोमा परिसंघ के प्रदेश अध्यक्ष इंजी एआर सिंह द्वारा ने संगठन की गतिविधियों के बारे में बताया। राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रदेश अध्यक्ष द्वारा दिनेश पचौरी को चंबल संभाग अध्यक्ष और पूर्णेश उइके को कटनी जिले का अध्यक्ष बनाये जाने के आदेश प्रदान किये गए।
बैठक में डोमा परिसंघ के राष्ट्रीय सचिव गौरीशंकर सूर्यवंशी प्रदेश उपाध्यक्ष आर एन ठाकुर ,के एस गंगवार, डॉ पी डी महंत, लक्ष्मण सिंह सिलौट्रे , प्रदेश महासचिव नरेंद्र चौधरी, जे के मालवीय, बसंत खरे,डॉ के के बच्चन, प्रदेश सचिव आशीष रायपुरिया, चम्बल संभाग अध्यक्ष दिनेश पचौरी, कटनी जिला अध्यक्ष पूर्णेश उइके, खंडवा जिला अध्यक्ष तेजेंद्र राउत, राजेंद्र प्रसाद एवं सामाजिक संगठनों के श्री अब्बास इनायत, डॉक्टर सोहराब सदावर्ते, के सी अहिरवार, डॉ रविकांत वी रामदास उत्साही हरिवंश राय पथ रोड रवि कटारिया महेश गणावा, बृजेश पचौरी, आदि ने अपने विचार रखे। संचालन प्रदेश महासचिव जे के मालवीय द्वारा किया गया।