आदि-वंश आन्दोलन के प्रणेता थे स्वामी अछूतानन्द हरिहर

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स्वामीजी ने जाति-पात और छुआ-छूत के विरुद्ध स्वत्रंत रूप से आन्दोलन चलाया

                   नवल किशोर

स्वामी अछूतानन्द हरिहर जी, आदि-वंश आन्दोलन के प्रणेता थे. उन्होंने उत्तर प्रदेश में इस सामाजिक, धार्मिक आन्दोलन की स्थापना की थी। स्वामीजी जन्म यूपी के फर्रुखाबाद जिले के सौरिख गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम राम पियारी और पिता का नाम मोतीराम था। माता-पिता ने काफी समय पहले से ही उच्चवर्ण हिन्दुओं की जातिगत-घृणा और कलह से तंग आकर पैतृक गांव छोड़ दिया था। वे जिला मैनपुरी के उमरी गांव में आ बसे थे। बाद में पिताजी ने आर्मी ज्वाइन कर लिया था। स्वामीजी बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे। उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था। आपका ब्याह हिराबाई से हुआ था। इनकी चार पुत्रियां थीं। शुरू में स्वामी जी ने आर्य समाजियों के साथ थे। मगर, जल्दी ही हिन्दू आर्य-समाजियों से इनका भ्रम टूट गया। तब स्वामीजी ने जाति-पांति और छुआ-छूत के विरुद्ध स्वत्रंत रूप से आन्दोलन चलाया। उन्होंने गांव-गांव भ्रमण कर अपनी बात को लोगों के सामने रखा।

स्वामीजी 1917 में दिल्ली आये। आपने अपने लोगों को जगाने के लिए यहां से आदि-हिन्दू नामक हिंदी मासिक पत्रिका का सम्पादन किया था।

स्वामीजी के अनुसार आदि-हिन्दू जातियां अर्थात अनार्य इस भारत-भूमि के मूलनिवासी थे। आर्यों ने यहाँ आकर छल-कपट से उनको दास बनाया और बाद में कई तरह की पाबंदियाँ उन पर लाद दी। आर्य जातियों का यह षड्यंत्र यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि, आगे चलकर अनार्य जातियों को पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को बाध्य किया।

स्वामीजी ने दिल्ली में अछूत नेता वीररतन दास और जगतराम जाटिया के साथ मिलकर अखिल भारतीय स्तर पर अछूत महासभा का गठन किया। 1922 के दरम्यान दिल्ली में ही स्वामी जी ने अछूत जातियों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कर उसमें प्रिंस आफ वेल्स को आमंत्रित किया था।

वहां आपने प्रिंस आफ वेल्स को अछूत जातियों के उत्थान से सम्बन्धित 17 बिन्दुओं का मेमोरेंडम दिया था। इस मेमोरेंडम के मांग की गई थी कि आदि-हिन्दू (अछूत जातियों) के लिए पृथक चुनाव और प्रतिनिधित्व का प्रावधान हो। इसके साथ ही छुआ-छूत के उच्छेद के लिए कड़े नियम बनाये जाये। इन जातियों के शिक्षित बच्चों को नौकरी और व्यवसाय में प्राथमिकता मिले। बलात-श्रम पर पाबंदी लगे और गाँव के कोटवार इन जातियों के हो आदि आदि।

1927 में स्वामी जी ने एक पब्लिक मीटिंग में हिन्दू और मुसलमानों की तर्ज पर आदि हिन्दुओं (अछूत जातियों) के लिए पृथक स्वत्रंता की मांग की थी। आपने कहा कि अछूत जातियां इसकी सही हकदार है. 30.11.1930 को स्वामी जी ने सायमन कमीशन से मुलाकात की थी, जिसके सदस्य डा.अम्बेडकर थे। स्वामी जी की डॉ.अंबेडकर से 1928 में संपन्न ‘आदि हिन्दू’ महासभा के एक अधिवेशन में पहली मुलाकात हुई। बाद में इन दोनों महापुरुषों ने देश के आजादी के साथ-साथ पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए, जो उनके शोषकों को सुनाई दे, ऐसी आवाज बुलंद की।

राउंड टेबल कन्फेरेंश के दौरान स्वामी जी ने भारत में अछूतों के सर्वमान्य नेता के तौर पर डॉ.अंबेडकर और राव बहादूर श्रीनिवासन को सपोर्ट के लिए देश के कई कोनों से टेलीग्राम कराये थे। यह स्वामी जी का प्रयास था की ब्रिटिश भारत में अछूतों को संसद और विधान सभाओं में पृथक प्रधिनिधित्व और अछूत जातियों वाले अधिसंख्यक सीटों पर दोहरे मत का अधिकार मिला था।

किन्तु गांधी जी के आमरण अनशन ने इन दोनों मांगों की मिटटी-पलीद कर दी. किसी तरह 24.9.1932 को पूना पैक्ट हुआ जिसके साक्षी स्वामी जी थे। स्वामी जी ने ‘आदि-हिन्दू धर्म’ इजाद किया था। जिसकी 7 मान्यताएं थी- 1.इस देश के मूलनिवासी होने से वे ‘आदि-हिन्दू’ हैं. आदि-हिन्दू होने के नाते उनका कर्तव्य है कि वे अपनी इस मातृभूमि पर सत्य और न्याय का शासन स्थापित करे। 2.आर्यों के आने के पहले यहाँ के मूलनिवासियों की जो आस्था और मान्यताएं थी, वही उनका ‘आदि-धर्म’ है।

3.यह कि ईश्वर अवतार नहीं लेता। 4.ऊँच-नीच का भेद गलत है। 5.क्रोध, मोह, लोभ और काम वासना से अलिप्त रहना। वेश्यागमन, जुआ, हिंसा और मद्य-पान से अलिप्त रहना। 6.संत कबीर का कथन सत्य है कि हिन्दुओं के धर्म-शास्त्र झूठे, अन्यायी और उनके वर्ग हित को साधने वाले हैं। ये ही हमारी अधोगति के कारण है। इसलिए वे उनके देवताओं, अवतारों, उपदेशों को त्यागने की शपथ लेते हैं। 7.वे अपने पूर्वजों के उच्च चरित्र और आदि-वंश के गर्व भरे इतिहास को प्रचार-प्रसार करेंगे।

देश की शोषित-पीडि़त जातियों के लोग जो हिन्दुओं से भयाक्रांत थे और जिनके लिए अंग्रेजों से आजादी पाने का कोई अर्थ नहीं था, हिन्दुओं से अपनी आजादी के लिए संघर्षरत थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो तब, बड़े जोर-शोर से आजादी का आन्दोलन चला रहा था, के कर्ता-धर्ताओं के सामने स्वामीजी ने जमीदारी उन्मूलन की मांग रखी थी। स्वामीजी के पत्र के उत्तर में मोतीलाल नेहरू ने लिखा था- ‘पहले आजादी के आन्दोलन में सहयोग करे। जमीदारी उन्मूलन के सम्बन्ध में स्वराज प्राप्त होने पर विचार किया जा सकता है। ‘

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