भाजपा से छोटी दुश्मन है समाजवादी पार्टी : डॉ. आनंद स्वरूप

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भाजपा को हराने के लिए दलित सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ

कमल जयंत

डॉ. अम्बेडकर विचार एवं सेवा संस्थान के उपाध्यक्ष व कानपुर मेडिकल कालेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. आनंद स्वरूप का कहना है कि वैसे देखा जाए तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव आज भले ही कांशीराम जी की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मना रहे हैं, लेकिन कांशीराम जी के नाम से बने जिले और शैक्षणिक संस्थानों का नाम मुख्यमंत्री रहते अखिलेश यादव ने ही बदला। इतना ही नहीं दलितों का सबसे ज्यादा नुकसान भी सपा सरकार में ही हुआ। बावजूद इसके अगर यूपी में सपा इंडिया गठबंधन यानि कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ती है तो दलित समाज बड़े दुश्मन को हराने के लिए इस छोटे दुश्मन के साथ खड़ा दिखेगा।

उनका कहना है कि सपा प्रमुख ने तो दलितों के प्रोमोशन में आरक्षण की व्यवस्था खत्म की और हजारों दलित कर्मचारियों व अधिकारियों को डिमोट करके उन्हें अपमानित किया, लेकिन भाजपा सरकार तो भारतीय संविधान ही खत्म करना चाहती है। यदि संविधान खत्म हो गया तो संविधान में प्रदत्त न सिर्फ दलितों के अधिकार बल्कि पिछड़ा वर्ग औरअल्पसंख्यकों के भी अधिकार खत्म हो जाएंगे। हम एक बार फिर आजादी से पहले की स्थिति में पहुंचकर अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक बन जाएंगे।

डॉ. आनंद स्वरूप का कहना है दलित समाज अम्बेकरवादी मिडिल क्लास है। यह समाज सरकारी नौकरियों और राजनीति में आरक्षण पाकर आगे बढ़ा है। बाबा साहब र्डा. भीमराव अम्बेडकर कांशीराम जी के आंदोलन से जुडऩे की वजह से ये वर्ग सामाजिक और राजनीतिक रूप से काफी जागरूक हुआ है। हमारा संगठन भी इन वर्गों को जागरूक करने के लिए अभियान चला रहा है और उसका सकारात्मक प्रभाव भी दिख रहा है। दलितों को इस बात का अहसास है कि उनके अधिकारों के हितों की रक्षा के लिए कौन आंदोलन चला रहा है और कौन उन्हें बेवकूफ बना रहा है। इसलिए चुनाव में वह बहुत ही सोच-समझकर अपना निर्णय लेता है।

ऐसे में हमारे समाज के पास पन्द्रह फीसदी सवर्णों की गुलामी करने के अलावा और कुछ भी नहीं बचेगा

ऐसे में हमारे समाज के पास पन्द्रह फीसदी सवर्णों की गुलामी करने के अलावा और कुछ भी नहीं बचेगा। ऐसे में जरूरी है कि जिस तरह से लोकसभा चुनाव में संविधान की रक्षा के लिए दलित व पिछड़ा समाज एकजुट हुआ था और भाजपा के खिलाफ इंडिया गठबंधन को मजबूत किया था, उसी तरह विधानसभा चुनाव में भी इन वर्गों को इंडिया गठबंधन के पक्ष में एकजुट होना पड़ेगा।

उनका कहना है कि हालांकि ये गठबंधन भाजपा को केन्द्र की सत्ता में आने से नहीं रोक सका, लेकिन भाजपा अपने दम पर चार सौ पार की बात कर रही थी, वह बहुमत लायक सीटें भी नहीं हासिल कर सकी। भाजपा केन्द्र में दो बैशाखियों के सहारे अपनी सरकार चला रही है। दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों को मिलकर यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को शिकस्त देकर इनका विजय रथ यहीं रोकना है। ताकि संविधान खत्म करना तो दूर संविधान खत्म करने की बात भी भाजपा ना सोच सके। हालांकि भाजपा और आरएसएस के विचारक शुरू से ही संविधान और अम्बेडकर विरोधी रहे हैं। इन्हें सत्ता में आने से रोककर इनकी इस दूषित मानसिकता पर विराम लगाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि दलितों की एक मात्र पार्टी बसपा ही हुआ करती थी, लेकिन दुर्भाग्यवश बहुजन समाज पार्टी अपने मूवमेंट से हट गयी है। जिसकी वजह से दलित समाज का भी बसपा से मोहभंग होता जा रहा है। देश की मान्यता प्राप्त पार्टी बसपा ने दलितों की समस्याओं और उनपर हो रही जुल्म ज्यादती के खिलाफ आंदोलन बंद कर दिया। इसी का नतीजा है कि दलितों ने बसपा से किनारा करना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से यूपी में जहां बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार रही, वहां पार्टी का सिर्फ एक विधायक है, लोकसभा और विधान परिषद में एक भी सदस्य नहीं है। वोट प्रतिशत भी तेजी से गिर रहा है। बावजूद इसके बसपा प्रमुख मायावती जी किसी भी आंदोलन में सक्रिय नहीं हैं।

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