दलित शौर्य का ग्वाह है भीमा कोरेगांव

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सपा सांसद आरके चौधरी ने दलितों की वीरगाथा पर चर्चा को बुलाई गोष्ठी

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के सांसद आरके चौधरी सपा और पासी साम्राज्य शोध संस्थान की ओर से भीमा कोरेगांव युद्ध में दलितों की वीरगाथा पर चर्चा करने के लिए प्रेसक्लब में एक गोष्ठी रखी है। इस गोष्ठी का मकसद बहुजन समाज में खासतौर पर दलितों को उनके पूर्वजों के बलिदान उनकी वीरता और उनकी शौर्य गाथा से अवगत कराना है। दलितों की शौर्यगाथा को बहुत कम लोग जानते हैं। सपा सांसद का गोष्ठी करने का मकसद भी दलितों को उनके गरिमामयी इतिहास से अवगत करना है। महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी 1818 के ऐतिहासिक युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लडऩे वाले महार सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान को श्रद्धांजलि देने से जुड़ी है, जहां दलित समुदाय के लोग विजय स्तंभ पर जुटकर अपने पूर्वजों को नमन करते हैं।

 

पेशवाओं के अत्याचार के खिलाफ महार सैनिकों के साहस और जीत का प्रतीक

एक जनवरी 1818 को महार सैनिकों ने पेशवाई को हराकर भारत को जातिमुक्त और लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में पहला ऐतिहासिक $कदम बढ़ाया। पुणे के पास भीमा कोरेगांव में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (जिसमें महार सैनिक थे) और पेशवा की सेना के बीच युद्ध हुआ था, जिसमें महार सैनिकों ने बहादुरी से लड़ते हुए जीत हासिल की थी। शौर्य दिवस का महत्व दलित समुदाय इस दिन को ‘शौर्य दिवस’ या ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाता है, जो पेशवाओं के अत्याचार के खिलाफ महार सैनिकों के साहस और जीत का प्रतीक है, जैसा कि डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर भी श्रद्धांजलि देने आते थे। युद्ध में शहीद हुए महार सैनिकों की याद में एक विजय स्तंभ (स्मारक) बनाया गया है, जिस पर उनके नाम अंकित हैं, और हर साल लोग यहां आते हैं।

1 जनवरी 1818 को कोरेगांव के युद्ध में महार सैनिकों ने ब्राह्मणवादी पेशवाओं को धूल चटा दी थी। बाबासाहेब ने अपनी किताब राइटिंग्स एंड स्पीचेस (अंग्रेज़ी) के खंड 12 में ‘द अनटचेबल्स एंड द पेक्स ब्रिटेनिका’ में इस तथ्य का वर्णन किया है। यह कोरेगांव की लड़ाई थी, जिसके माध्यम से अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य को ध्वस्त कर भारत में ब्रिटिश राज स्थापित किया। यहां 500 महार सैनिकों ने पेशवा राव के 28 हजार सैनिकों की फौज को हराकर देश से पेशवाई का अंत किया।
कोरेगांव भीमा नदी के तट पर महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित है। 01 जनवरी 1818 को सर्द मौसम में एक ओर कुल 28 हजार सैनिक जिनमें 20000 हजार घुड़सवार और 8000 पैदल सैनिक थे, जिनकी अगुवाई पेशवा बाजीराव-ढ्ढढ्ढ कर रहे थे तो दूसरी ओर बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्री के 500 महार सैनिक, जिसमें महज 250 घुड़सवार सैनिक ही थे। आप सोच सकते हैं कि सिर्फ 500 महार सैनिकों ने किस जज्बे से लड़ाई की होगी कि उन्होंने 28 हजार पेशवाओं को धूल चटा दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो एक ओर ब्राह्मण राज बचाने की फिराक में पेशवा थे तो दूसरी ओर पेशवाओं के पशुवत अत्याचारों से बदला चुकाने की फिराक में गुस्से से तमतमाए महार। आखिरकार इस घमासान युद्ध में पेशवा की शर्मनाक पराजय हुई। 500 लड़ाकों की छोटी सी सेना ने हजारों सैनिकों के साथ 12 घंटे तक वीरतापूर्वक लड़ाई लड़ी।

महार रेजिमेंट के ज्यादातर सिपाही 43 किलोमीटर पैदल चलकर युद्ध स्थल तक पहुंचे

भेदभाव से पीडि़त अछूतों की इस युद्ध के प्रति दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महार रेजिमेंट के ज्यादातर सिपाही बिना पेट भर खाने और पानी के लड़ाई के पहले की रात 43 किलोमीटर पैदल चलकर युद्ध स्थल तक पहुंचे। यह वीरता की मिसाल है। इस युद्ध में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक चौकोर मीनार बनाया गया है, जिसे कोरेगांव स्तंभ के नाम से जाना जाता है। यह महार रेजिमेंट के साहस का प्रतीक है। इस मीनार पर उन शहीदों के नाम खुदे हुए हैं, जो इस लड़ाई में मारे गए थे। 1851 में इन्हें मेडल देकर सम्मानित किया गया। इस युद्ध में पेशवा की हार के बाद पेशवाई खत्म हो गयी थी और अंग्रेजों को इस भारत देश की सत्ता मिली। इसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने इस भारत देश में शिक्षण का प्रचार किया, जो हजारों सालों से बहुजन समाज के लिए बंद था।

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