महाभारत महा पुराण की रचना कृष्ण द्वैपायन, वैशंपायन और स्रोति उग्रश्रवा ने की थी

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 वेदव्यास ने 24 हजार श्लोक लिखे थे और इसका नाम जय दिया था

        शिवचरण चौहान

कहते हैं 18 पुराण और 18 उप पुराणों की रचना कृष्ण द्वैपायन अर्थात वेदव्यास जी ने की थी। पर यह बात सच नहीं है। कुछ पुराणों की रचना वेदव्यास जी ने की थी और कुछ पुराण उनके शिष्यों और बाद के ऋषियों ने लिखे हैं। पहले महाभारत और फिर श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना का श्रेय वेदव्यास जी को जाता है। कहते हैं वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना मन ही मन में की थी और इसके लिखने के लिए गणेश भगवान को बुलाया था। श्रद्धा और विश्वास के रूप से यह बातें मानी जा सकती हैं किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से यह सच नहीं है। महाभारत महापुराण में करीब एक लाख श्लोक हैं। श्रीमद्भगवद्गीता भी इसी में समाहित है। श्री कृष्ण द्वैपायन यानी वेदव्यास जी ने महाभारत के 24 हजार श्लोक लिखे थे। और इस ग्रंथ का नाम जय दिया था।

इसमें पांडवों की विजय गाथा अंकित है। बाद में वेदव्यास के शिष्य वैशंपायन ने इसमें कथा का विस्तार किया और इसे ‘भारत’ नाम दिया। इसके बाद स्रोति उग्रश्रवा ने इसमें अनेक कथाएं और जोड़ी। उन्होंने इसका नाम महाभारत दिया। वेद व्यास के बाद वैशंपायन और सौति ने मी महाभारत की रचना में योग दान दिया किंतु मूल रूप से व्यास को ही ‘महाभारत’ का रचनाकार माना जाता है क्योंकि महाभारत की कल्पना और रचना मूल रूप ने वेद व्यास ने हीं की थी। आज जो ‘महाभारत मिलती है उसमे अठारह पर्वऔर एक लाख श्लोक बताये जाते हैं। महाभारत में धर्म, राजनीति.कर्तव्य, विज्ञान, दर्शन आदि शास्त्रों का ज्ञान भरा हुआ कुछ विद्वान इसकी रचना का समय ईसा से 1400 वर्ष पूर्व बताते हैं । कुछ विद्वान महाभारत की रचना ईसा पूर्व 5 हजार वर्ष मानते हैं।

पाश्चात्य विद्वान और वैज्ञानिक महाभारत का रचना काल ईसापूर्व 320 से 200 तक के बीच में मानते हैं। प्राचीन जीवन, नीति, धर्म, व्यवहार, आदर्श आदि का विवरण प्रस्तुत करने के कारण इसे धर्मशास्त्र की प्रतिष्ठा प्राप्त है। इसके ही एक अध्याय में श्रीमद् भगवत गीता में श्री कृष्ण अर्जुन संवाद में अध्यात्म का ज्ञान भरा हुआ है। कहते हैं महाभारत की रचना में करते समय मारकाट और हिंसा के कारण वेदव्यास जी का मन उदास हो गया। वह परेशान रहने लगे थे इसी कारण बाद में प्रेम का ग्रंथ श्रीमद्भागवत महापुराण उन्होंने लिखा है। श्रीमद्भागवत की रचना के बाद उनके मन को शांति मिली थी।

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