कांशीराम जी के निर्वाण दिवस के बाद अब बाबा साहब के निर्वाण दिवस पर बड़े आयोजन की तैयारी
कमल जयंत
बहुजन समाज पार्टी बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के निर्वाण दिवस के मौके पर 6 दिसंबर को यूपी में दो बड़े आयोजन करने जा रही है। चूंकि यूपी में विधानसभा चुनाव को अब महज एक साल ही बचा है, इसलिए सियासी गलियारे में बहनजी के इस कार्यक्रम को रैली का नाम दिया जा रहा है। हालांकि ये सही भी है। बसपा ने यूपी की राजधानी लखनऊ और नोएडा में अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन रखा है। बाबा साहब को श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए बारह मंडल के कार्यकर्ताओं को लखनऊ और छह मंडल के कार्यकर्ताओं को नोएडा बुलाया गया है। हालांकि इस बार मायावती नोएडा में रहेंगी, लेकिन पार्टी के अन्य बड़े नेता लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे। लखनऊ में होने वाले इस कार्यक्रम की तैयारियां लगभग पूरी कर ली गयीं हैं। यहां बाबा साहब के गोमतीनगर स्थित स्मारक में इस कार्यक्रम का आयोजन होना है। बसपा बाबा साहब के महानिर्वाण दिवस के मौके पर कार्यक्रम करके एक बार फिर अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास यूपी में अपने विरोधियों को कराना चाहती है। लगभग तेरह साल बाद कांशीराम जी के निर्वाण दिवस के बाद बाबा साहब के निर्वाण दिवस के मौके पर तकरीबन दो महीने के अंतराल में बसपा यह दूसरा बड़ा कार्यक्रम करने जा रही है। इस कार्यक्रम में भी बसपा प्रमुख मायावती मौजूद रहेंगी।

2027 में 2007 दोहराने की तैयारी, बसपा का मिशन यूपी फतह
हालांकि यूपी में सत्ता से बाहर होने के बाद मायावती ने इन महापुरुषों के जयंती और निर्वाण दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों में इनके स्मारक स्थलों पर जाना बंद कर दिया था, पहले वे पार्टी कार्यालय में बाद में अपने आवास पर ही दोनों मसीहा को श्रद्धासुमन अर्पित करने लगीं थीं। इस साल कांशीराम जी के निर्वाण दिवस के मौके पर कांशीराम स्मारक में आयोजित रैली में उमड़ी भीड़ के बाद यहां कार्यकर्ताओं में भी उत्साह बढ़ा है। साथ ही पार्टी प्रमुख को भी यह महसूस होने लगा है कि अगर वह कार्यकर्ताओं का उत्साह बनाये रखने में सफल रहतीं हैं तो 2027 में 2007 भले ही न दोहरा पाएं, लेकिन वह यूपी में एक बार फिर बैलेंसिंग आफ पावर बनकर उभर सकती हैं। हालांकि बसपा का मकसद तो यूपी में एक बार फिर 2007 को दोहराने का है, लेकिन राज्य में बसपा का जनाधार तेजी से गिरता जा रहा है और विधानसभा में भी पार्टी का एक ही सदस्य है। वोट के लिहाज से भी बसपा घटकर नौ प्रतिशत पर आ गयी है। अब देखना यह होगा कि बसपा किस रणनीति को अपनाकर एकबार फिर अपने जनाधार को वापस लाने में कामयाब होगी।

छह दिसंबर को लखनऊ व नोएडा में आयोजित रैली या श्रद्धांजलि सभा के आयोजन के सफल होने को लेकर लेसमात्र भी संशय नहीं है। बाबा साहब के निर्वाण दिवस पर आयोजित कार्यक्रम की सफलता से कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद होंगे, साथ ही उनमें जोश भी बढ़ेगा। यह दोनों स्थिति राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिहाज से बसपा के लिए अच्छी है। अब देखना यह होगा कि बसपा के कार्यक्रमों में जुट रही भीड़ को पार्टी विधानसभा चुनाव में इसे वोट में कैसे तब्दील कर पाती है। क्योंकि दलितों, शोषितों पर हो रहे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ ही इस पार्टी का जन्म हुआ था, लेकिन नौ अक्टूबर को हुई रैली में जुटी भारी भीड़ के बाद भी मायावती ने दलितों पर हो रहे उत्पीडऩ को लेकर न तो कोई आंदोलन चलाया और न ही किसी भी जिले में कोई धरना-प्रदर्शन आदि किया। यूपी में दलितों पर हो रहे सामाजिक और शारीरिक उत्पीडऩ के मामले में बसपा की चुप्पी क्या पार्टी की किसी रणनीति का हिस्सा है। फिलहाल चुनाव में इन मुद्दों को लेकर भी दलित समाज बसपा के योगदान के बारे में भी विचार करेगा।
बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा ने एक सीट पर जीत हासिल की। हालांकि बसपा का बिहार में पहले ज्यादा मजबूत जनाधार था, लेकिन इन दिनों जिसतरह से बसपा का लगातार जनाधार गिरता जा रहा है, उसको देखते हुए बसपा की एक सीट पर जीत उसके लिए संजीवनी का काम कर रही है। क्योंकि बिहार में जिस तरह से एनडीए गठबंधन के सामने विपक्ष बुरी तरह से धराशायी हुआ है। उसको देखते हुए बसपा समर्थक बिहार में एक सीट पर जीत को अपनी सफलता से जोडक़र देख रहे हैं। और साथ ही यहभी कह रहे हैं कि अब बसपा का जनाधार बढऩा शुरू हो गया है। हालांकि सामाजिक सरोकार के मुद्दों पर मायावती के तेवर आक्रामक नहीं हैं। लेकिन रैली और आयोजनों में भीड़ जुटाकर वह यह बताने में सफल हो रहीं हैं कि बहुजन समाज पार्टी बहुजनों में खासतौर पर दलितों में अब भी सर्वमान्य दल है और ये वर्ग अब भी बसपा के साथ मजबूती से खड़ा है। फिलहाल यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों से ही पता चलेगा कि मायावती के इन दावों में कितनी सच्चाई है।