कौओं को सम्मान देने का पर्व है – घुघुती

शिवचरण चौहान
मकर संक्रांति के दिन उत्तराखंड में उत्तरायणी पर्व मनाया जाता है। इसे लोक भाषा में घुघुतिया या घुघुती कहा जाता है। मकर संक्रांत के एक दिन पूर्व पहाड़ की महिलाएं गुड़ और आटे की लोई से घुघुती बनाती हैं। मैदानों महीने आटे के लड्डू कहा जा सकता है। मकर संक्रांति यानी उत्तरायणी की सुबह काले कौओंं को बुलाकर खिलाया जाता है। समय की मार के कारण और जोशीमठ की त्रासदी के कारण भले ही आज यह त्यौहार पर्व फीका पड़ गया हो मगर गांव की महिलाओं में पहाड़ पर आज भी उसी उत्साह से घुघुतिया खिलाई जाती है। उत्तराखंड खास तौर से कुमाऊं क्षेत्र की महिलाएं ,गुड़ के घोल में गुंथे हुए आटे की लोई लेकर उसे नया रूपाकार दे देती हैं- लो, यह बन गई ‘प्वे’! और महिलाएं गाती हैं/ गुनगुनाती हैं :
ले कौव्वा प्वे
मैं के दे भलि- भलि ज्वे!
(ले कौव्वा प्वे, मुझे भली सी पत्री दे!)
(फिर ढाल, तलवार, दाड़िम के फूल, डमरू, खजूरे और घुघुति के प्रारूप बनने लगते हैं। घर में जितने बच्चे हैं केवल उन्हीं के लिये नहीं बल्कि नाते रिश्तेदारों में बांटने के लिये भी गुड़ और आटे से मालाएं बनेंगी। शक्कर पारों, गुझिया, नारियल गरी के टुकड़ों और नारंगियों के साथ इन पकवानों को गूंथ कर बच्चे अपने लिये लम्बी मालाएं बनाते हैं। पहाड़ के पुराने लोग बताते हैं ‘हम लोग रात भर सो ही नहीं पाते थे। गांव के बच्चों में होड़ सी लगी रहती थी कि कौन पहले उठकर कौव्वों को बुला पाता है। भोर में भी घर- घर से बच्चों की गुहार सुनाई देती थी-काले कौव्वा! काले- काले!
ले कौवा पूड़ी
मैं के दे दुलि दुलि कुड़ी
ले कौव्वा ढाल
मैं के दे सुनौक थाल
ले कौव्वा तलवार
मैं के बणें दे होश्यार
ले कौवा पूड़ी
मुझे खूब बड़ा घर दे।
ले कौवा ढाल
मुझे दे सोने का थाल
ले कोव्वा तलवार
मुझे बना दे होशियार ।
अपने- अपने मन से तुक जोड़कर बच्चे कौवों को पुकारते और सुबह सुबह बागेश्वर से गंगा स्नान कर कौव्वे उड़ान भर कर आ पहुंचते थे। उन्हें सब बच्चे अपनी-अपनी माला से घुघुते पकवान तोड़कर खिलाते उनका सत्कार करते थे। सच पूछो तो यह पर्व काले कौवे के सम्मान का पर्व है। उत्तराखंड और कुमाऊं अंचल में इतने सुंदर सुंदर पंछी पाए जाते हैं भूल पाए जाते हैं ऐसे में कुरूप काले कौवे को सम्मान देना। उन्हें पकवान खिलाना कहां की समझदारी है। बागेश्वर से सरयू नदी में स्नान कर लौटे कौवों को सम्मानित किया जाता है। बागेश्वर में ही सरयू और गोमती का मिलन होता है।
इसका एक प्रश्न इतिहास में भी मिलता है। बहुत पहले जब कुमाऊं मंडल के सामंतों की शक्ति आपस में लड़ने के कारण कमजोर हो गई थी तब गोरखों क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। गोरखा शासक बहुत अत्याचारी निकले और हर एक को अपना गुलाम बना कर रखते थे। जब अंग्रेज आए तो गोरखे तो चले गए। अंग्रेज भी वही जुल्म करने लगे जो गोरखे करते थे। वह कुमाऊं के आसपास के गांवों के लोगों को अपना कुली समझते थे और बेकार के लिए पकड़ लेते थे। उनसे अपना सारा सामान सिर पर उठा कर उनके पहाड़ो तक चढ़ाते थे। इस गुलाम प्रथा के खिलाफ उत्तराखंड में विद्रोह हुआ और एक समय ऐसा भी आया जब कुमायूं के लोगों ने अंग्रेजों की गुलामी करना दास बनना बंद कर दिया।
कवि का हृदय बहुत संवेदनशील होता है और पहाड़ के लोक भाषा के कवियों ने इस दर्द को बखूबी महसूस किया और अपनी कविताओं में उसी दर्द को ढाल दिया।
गीतों में एक व्यंग देखिए
काले कव्वे
दिन दिन खजाना का भार बोकणा लै
शिव! शिव! चुली में का बाल न एक कै का तदपि मुलुक तेरो छोड़ि ने कोई माजा
इति बरति गुमानी धन्य गोरखालि राजा।दिनों दिन खजाने का भार ढोने से है शिव ! किसी के सिर में शिखा का एक बाल भी न रह गया। तो भी, धन्य हो गोरखाली राजा! तेरा मुलुक छोड़कर कोई नहीं भागा। पूरे पच्चीस वर्ष तक कुमाऊं ने यह आतंक झेला और अन्त में विकल्प के रूप में अंग्रेजों की कम्पनी सरकार की मदद ली, लेकिन यह विकल्प भी कम त्रासद नहीं सिद्ध हुआ। अंग्रेजों की साम्राज्य लिप्सा, सड़कों का अभाव, मालवाही पशुओं के लिये भी दुर्गम वन पथ। ऐसी स्थिति में कुली बेगार को अनिवार्य बना देना ही नए शासकों की बेगार हो गई। हर काश्तकार कुली बेगार देने के लिए बाध्य था।
साहब दौरे पर निकले हैं। मार्ग में पड़ने वाले सभी गांवों के प्रधान, माल गुजार निर्धारित संख्या में ग्रामीणों को लेकर कुली बेगार देने के लिए हाजिर हो जाते हैं- छोल दारी से लेकर जूतों के बक्से तक, क्राकरी से लेकर कमोड तक, बाबा लोगों से लेकर पिल्लों तक, मक्खन- डबल रोटी से लेकर गोमांस तक सब कुछ सिर पर लादकर ले जाना है दुर्गम शिखरों के पार, हिंस क पशुओं से घिरे जंगलों के बीच; उद्दाम नदियों को पार कर फिसलन भरी चट्टानों वाले संकरे मार्ग पर। किंचित विलम्ब या ढिलाई दिखाने पर बेत या लाठी से पीटे जाने की संभावना ही नहीं, मौत के घाट उतार दिये जाने की भी आशंका रहती थी। और हाकिम- हुक्कामों की ही बात नहीं, सैलानियों, शिकार पार्टियों और छोटे अहलकारों
तक की बेगारी नियमबद्ध बना दी गई थी। कहीं कोई सुनवाई नहीं, कोई मुरव्वत नहीं। केवल श्रम की ही बेगार नहीं, उत्पादन की प्रत्येक वस्तु- फल- फूल, दूध- दही, घी- अन्न पशु- पक्षियों को भी जबरन बर्दायश के नाम पर ले लेना जैसे आम रिवाज हो गया था। प्रतिरोध का उत्तर लाठी- डंडे की मार, हवालात और जुर्माने से मिलता था।
लेकिन मनुष्य अजेय है। किसी भी युग में उसे दबाया- कुचला नहीं जा सका और नहीं कभी ऐसा हो पाएगा। अन्ततः उत्तराखण्ड में भी स्वाभिमान का ज्वार आया। शोषित,अपमानित जनता अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए सर्वस्व दांव पर लगा देने को उद्यत हो उठी। मुक्ति की अलख जगाने संग्रामियों की टुकड़ियां गांव- गांव का दौरा करने लगीं। जुलूस और सभाओं ने निराशा और पस्ती के वातावरण में उत्तेजना फूंक दी। जनकवि गिर्दा ने अपनी कविता में जनता का आह्वान किया।
मुलुक कुमाऊं का सुणि ल्हियो यारो झन दिया कुली बेगार
चाहे पड़ी जा डंडै की मार
जेल हुणी लै होवो तैय्यार… ।
लोक गायक अपने जोड़- भगनौलों के माध्यम से जनचेतना जगाने लगे। औपनिवेशिक शासन की अमानवीय नीतियों का जहां तहां सामूहिक विरोध होने लगा।और उसी के साथ दमन की प्रक्रिया भी तीव्र होती गई, लेकिन यह आग अब यूं बुझने वाली न थी। सन् उन्नीस सौ इक्कीस 1921 की मकर संक्रान्ति का पुण्य पर्व और यही बागेश्वर का पवित्र संगम। आज यह मात्र सरयू और गोमती का संगम नहीं रह गया था। जोहार,दारमा, अस्कोट, दानपुर, गंगोली, बारा मंडल, पाली, सालभ, कत्यूर, बौरारो, सल्ट आदि सभी अंचलों से आई हुई प्रताड़ित, शोषित और मुक्तिकामी जनता का संगम स्थल बन गया था। और लंबे संघर्ष के बाद मुक्ति मिल पाई। काला कुरूप कौवा सुख दुख में गर्मी सर्दी में पहाड़ के लोगों के साथ ही रहता है। दूसरे पंछियों की तरह यह अपनी सुविधा के लिए दूर उड़ कर कहीं और नहीं जाता। इसी कारण काले कौवे को सम्मान दिया जाता है।