दुनिया का बदलता स्टार्टअप मंजरनामा

अली हसन
16 जनवरी 2026 का दिन भारत के आर्थिक, सामाजिक और नवाचार के इतिहास में एक अहम मील का पत्थर बनकर दर्ज हो गया। राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस के अवसर पर नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन केवल एक सरकारी योजना की सालगिरह नहीं था, बल्कि यह उस इंक़लाब का बयान था जिसने भारत के नौजवानों को नौकरी तलाशने वाले से नौकरी देने वाला बनाया। प्रधानमंत्री ने अपने ख़िताब में जिस तरह स्टार्टअप इंडिया को “एक योजना नहीं, बल्कि एक रैनबो विज़न” कहा, उसने यह साफ़ कर दिया कि बीते दस वर्षों में भारत ने केवल स्टार्टअप्स की संख्या नहीं बढ़ाई, बल्कि सोच, जोखिम उठाने की संस्कृति और आत्मनिर्भरता के मिज़ाज को भी बदला है। आज वैश्विक स्तर पर स्टार्टअप्स आर्थिक विकास की धुरी बन चुके हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हेल्थटेक, क्लीन एनर्जी, फिनटेक, स्पेसटेक और एग्रीटेक जैसे क्षेत्रों में स्टार्टअप्स न केवल नवाचार कर रहे हैं, बल्कि सरकारों की नीतियों को भी दिशा दे रहे हैं।
भारत: जहां ख्वाब अब ज़मीन पर उतर रहे हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16 जनवरी 2026 के अपने संबोधन में बताया कि वर्ष 2014 में जहां देश में 500 से भी कम स्टार्टअप थे, वहीं आज यह संख्या 2 लाख से अधिक हो चुकी है। वर्ष 2014 में भारत में केवल 4 यूनिकॉर्न थे, जबकि आज करीब 125 सक्रिय यूनिकॉर्न भारत की उद्यमशील ताक़त का परचम लहरा रहे हैं।
रोज़गार, नवाचार और आत्मनिर्भरता
स्टार्टअप्स की सबसे बड़ी देन रोज़गार सृजन है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स ने बीते वर्षों में लाखों प्रत्यक्ष रोज़गार पैदा किए हैं। यह रोज़गार केवल महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि टियर-2, टियर-3 शहरों और यहां तक कि गांवों तक फैल रहा है।
जोखिम उठाने की संस्कृति: डर से हौसले तक
एक दौर था जब जोखिम उठाना भारत में नाकामयाबी का पर्याय माना जाता था। माता-पिता बच्चों को “सेफ जॉब” की सलाह देते थे। लेकिन प्रधानमंत्री के शब्दों में, “आज रिस्क टेकिंग मेनस्ट्रीम बन चुकी है।” स्टार्टअप इंडिया ने उस मानसिकता को बदला, जहां असफलता को सीख माना जाने लगा।
सरकारी नीतियां: सपनों को पंख देने वाली ताक़त
स्टार्टअप इंडिया की कामयाबी के पीछे केवल निजी उद्यमिता नहीं, बल्कि एक सहायक नीतिगत ढांचा है। जन विश्वास अधिनियम के तहत 180 से अधिक प्रावधानों का अपराधीकरण समाप्त किया गया। सेल्फ-सर्टिफिकेशन, आसान एग्ज़िट पॉलिसी और मर्जर नियमों ने उद्यमियों का बोझ कम किया।
महिला उद्यमिता: एक नई क्रांति
भारत की बेटियां इस स्टार्टअप क्रांति की मज़बूत स्तंभ बनकर उभरी हैं। आज 45% से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला डायरेक्टर या पार्टनर है। महिला-नेतृत्व वाले स्टार्टअप फंडिंग में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इकोसिस्टम बन चुका है।
उत्तर प्रदेश: उभरता हुआ स्टार्टअप पावरहाउस
यदि राज्यों की बात करें, तो उत्तर प्रदेश एक नया उदाहरण बनकर सामने आया है। ₹1,000 करोड़ का UP स्टार्टअप फंड i-Hub और विभिन्न सेंटर ऑफ एक्सीलेंस विश्वविद्यालयों में E-Cells और इनक्यूबेशन सेंटर इन पहलों ने यूपी को महाराष्ट्र और कर्नाटक के बाद एक प्रमुख स्टार्टअप हब के रूप में स्थापित किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसे के साथ कहा कि बीते दस वर्षों ने भारत की क्षमता साबित कर दी है। अब अगला दशक भारत को नई स्टार्टअप प्रवृत्तियों और तकनीकों में वैश्विक नेतृत्व दिलाने का होगा। यह केवल सरकार का सपना नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं की उम्मीद, जुर्रत और जुनून का सफ़र है—जहां ख्वाब हकीकत बन रहे हैं और भारत एक नई इबारत लिख रहा है। आज की आलमी अर्थव्यवस्था में स्टार्टअप सिर्फ़ कारोबार का ज़रिया नहीं, बल्कि तरक़्क़ी, रोज़गार और नवाचार का अहम वसीला बन चुके हैं। दुनिया भर में टेक्नोलॉजी, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, हेल्थटेक, एग्रीटेक और क्लीन एनर्जी जैसे सेक्टर्स में स्टार्टअप्स ने न सिर्फ़ नए हल पेश किए हैं, बल्कि मुल्कों की आर्थिक सूरत भी बदल दी है।
हिंदुस्तान: नवाचार से नई पहचान
भारत ने बीते एक दशक में स्टार्टअप की दुनिया में एक नई मिसाल क़ायम की है। आज भारत दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते स्टार्टअप इकोसिस्टम्स में शुमार है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, दो लाख के क़रीब स्टार्टअप्स को आधिकारिक मान्यता मिल चुकी है। इन स्टार्टअप्स ने लाखों नौजवानों को रोज़गार दिया है और आत्मनिर्भर भारत के ख़्वाब को हक़ीक़त में बदलने की राह आसान की है।
हुकूमती पॉलिसियाँ: सहारा और संबल
स्टार्टअप इंडिया मिशन, सीड फ़ंड स्कीम, टैक्स में राहत, आसान रजिस्ट्रेशन और फंड ऑफ फंड्स जैसी हुकूमती पहलें स्टार्टअप्स के लिए मजबूत बुनियाद बनी हैं। इन पॉलिसियों का मक़सद सिर्फ़ कारोबार को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि नौजवानों में एंटरप्रेन्योरशिप की रूह फूँकना भी है।
क्यों ज़रूरी है स्टार्टअप पर तवज्जो?
आज बेरोज़गारी, टेक्नोलॉजी का तेज़ बदलाव और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ऐसे मसाइल हैं जिनका हल स्टार्टअप्स के पास है। स्टार्टअप्स न सिर्फ़ रोज़गार पैदा करते हैं, बल्कि नई सोच, नई टेक्नोलॉजी और स्थानीय समस्याओं के देसी हल भी सामने लाते हैं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्टार्टअप्स का फैलाव क्षेत्रीय असमानता को भी कम कर रहा है।
चुनौतियाँ और आगे का रास्ता
हालाँकि शुरुआती पूंजी, मार्केट तक पहुँच और स्किल गैप जैसी दिक़्क़तें अब भी मौजूद हैं, लेकिन सरकार, निजी निवेशकों, तालीमी इदारों और मीडिया की साझी कोशिशें इन मसाइल को हल कर सकती हैं। स्टार्टअप आज सिर्फ़ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि ज़रूरत-ए-वक़्त हैं। अगर भारत को आलमी ताक़त बनना है और उत्तर प्रदेश को आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर करना है, तो स्टार्टअप इकोसिस्टम को मज़बूत करना ही होगा। यही रास्ता तरक़्क़ी, रोज़गार और खुशहाल मुस्तक़बिल की तरफ़ जाता है।