सूर्य चंद्रमा और अग्नि प्रत्यक्ष देवता हैं इसीलिए अग्नि की पूजा की जाती है

शिवचरण चौहान
मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व मनाया जाने वाला पर्व लोहड़ी ऋतु परवर्तन का पर्व है। पंजाब और जहां भी पंजाबी बसे हैं लोहड़ी का पर्व हंसी खुशी से मनाया जाता है। उत्तर भारत में हिंदू इसे तेलैयां कहते हैं और इस दिन और रात में तिल के लड्डू खाते और उड़द मूंग के दही बड़े बनाते खाते हैं। पंजाब में आग जलाकर उसके आसपास इकट्ठा होकर पंजाबी स्त्री पुरुष नाचते हैं और आग से पूरे परिवार की कुशलता मांगते हैं। वेदों में अग्नि को ही देवता कहा गया है। सूर्य चंद्रमा और अग्नि प्रत्यक्ष देवता हैं। इसीलिए अग्नि की पूजा उपासना की जाती है।
लोहड़ी का पर्व खुशी का त्योहार है। ऋतु परिवर्तन की खुशी का पर्व है। प्रकृति का पर्व है। जिस तरह से भारत के कुछ भागों में मकरसंक्रांति का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है लोहड़ी का पर्व पंजाब व पूरे भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। जहां-जहां भी सिख व पंजाबी बसे हैं भारत के विभिन्न शहरों, विदेशों में लोहड़ी का पर्व मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। सूर्य के ढलने के बाद रात में अलाव जलाकर पंजाबी उसके आसपास गोल गोल घूमकर गाते हुए ढोल के थापों पर नृत्य करते हैं व गुड और तिल से बने लड्डू आदि का वितरण किया जाता है। लोहड़ी के एक दिन बाद सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है- माघ मकर जब रवि मग होई। तीरथ पतहि आव सब कोई।। – तुलसीदास। प्रयाग इलाहाबाद, नासिक हरिद्वार में कुंभ लगता है। तो पंजाब में लोहड़ी मनाई जाती है।
सुंदरी मुन्दरिए हो, तेरा कौन विचारा हो दुल्ला भट्टी वाला हो
सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होने लगते हैं। कड़ाके की ठण्ड की विदाई होने लगती है। रात में.जलाए गए अलावों के पास लोग इकट्ठा होते हैं और नाचते हुए गाते हैं- सुंदरी मुन्दरिए हो, तेरा कौन विचारा हो दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले धी बिहायी हो कुड़ी दा शालू पाटा हो, शालू कौण समेटे हो चाचे चूरी कुट्टी हो, जिमीदारां लुट्टी हो जिमीदार सधाए, गिण-गिण पोले लाए हो इक पोला रह गया, सिपाही पकड़ के ले गया सिपाही ने मारी इट, भावं रो ते भांवे मिट।। लोहड़ी के संबंध में प्रचलित लोककथा के अनुसार वर्षों पहले पंजाब के गांजीबार क्षेत्र(अब पाकिस्तान में) रहने वाली एक ब्राह्मण सुंदरी पर मुस्लिम शासकों की नजर पड़ी तो वे उसके अप्रतिम सौंदर्य पर मोहित होकर रह गए और उसे प्राप्त करने के लिए उसके पिता पर दबाव डालने लगे। स्वाभिमानी पिता व पुत्री गंजीबार जंगल में रहने वाले मुसलमान डाकू दुल्ला भट्टी के पास पहुंचे और उनसे अपनी व्यथा कहकर सहायता की गुहार की ।
दुल्ला भट्टी ने रातोंरात ब्राह्मण लड़का तलाश कर सुंदरी के सात फेरे करा दिए
दुल्ला भट्टी ने रातोंरात ब्राह्मण लड़का तलाश कर सुंदरी के सात फेरे करा दिए। उस दिन दुल्ला भट्टी के पास लूट के माल की बजाय शक्कर और तिल ही था जिसे उसने सुंदरी के दुपट्टे में दुल्ला ने बांध दिया। इस घटना के बारे में पता चलने पर शाही सेना ने गंजीवार पर चढ़ाई कर दी और इस क्षेत्र की जनता ने शाही सेना का डटकर मुकाबला किया और दुश्मनों पर जीत हासिल की। जीत की खुशी में गंजीबार क्षेत्र की जनता ने आग के बड़े-बड़े अलाव जलाए और तभी से लोहड़ी पर्व का आयोजन होता चला आ रहा है। लोहड़ी के दिन दुल्ला भट्टी का गीत भी खास तौर पर लोकप्रिय है। घर-घर में लोहड़ी मांगते समय यह गीत गाया जाता है। और गाना पूरा होने के बाद जब भेट देने के लिए कोई दरवाजा नहीं खोलता तो उन्हें रिझाने के लिए कई युक्तियां काम में लाई जाती हैं जैसे-पा माई पा, काले कुत्ते नू वी पाकाला कुत्ता देवे दुआवांतेरियां जीण मझा-गांवा।
लोहड़ी के दिन घर के बुजुर्ग अग्नि को तिल, मक्का, गुड इत्यादि अर्पित करते हैं और उसके बाद सगे-संबंधी और परिचित ढोल की थाप पर भंगड़ा करते हैं।लोहड़ी की रात को घी और चावल की खिचड़ी चंद्रमा की रोशनी में रखी जाती है व संक्रांति के दिन स्नान के पश्चात खाई जाती है। ऐसी धारण है कि खीर व खिचड़ी चंद्रमा की रोशनी में रात भर रखकर खाने से आंखों की ज्योति बढ़ती है। इस बार 20 22 में कोरोना के कारण सामूहिक रूप से लोहड़ी का त्यौहार मनाने का रोक लगाई गई है फिर भी इस बार भी 13 जनवरी को लोहड़ी का त्यौहार पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाएगा। 2020 और 2021 में भी कोरोना संक्रमण के चलते लोहारी का त्यौहार सामूहिक रूप से मनाने पर प्रतिबंध था पर प्रकृति परिवर्तन का यह पर्व स दियों से मनाया जाता है। लोग हंसी खुशी का इजहार करते हैं और आपस में बधाइयां देते हैं। यह पर्व बेटी के सम्मान का पर्व भी है।