नये वर्ष का जश्न मनायें पर हुड़दंग नहीं

शिवचरण चौहान
बेशक आप नया साल मनाएं ,किंतु हुड़दंग नहीं। पिछले कई वर्षों से रोमन नए वर्ष के जन्मोत्सव पर बड़ी-बड़ी पार्टियों के हुड़दंग पर रोंक है किंतु लोग मानते कहां हैं? इस वर्ष भी रोमन वर्ष 2025 के प्रस्थान और 2026 के आगमन पर 31 दिसंबर की मध्य रात्रि तक हुड़दंग होगा। जन्मोत्सव मनाना बुरी बात नहीं है किंतु शराब पीकर हुड़दंग मचाना निश्चित तौर से बुरी बात है। जिससे दूसरे के आराम में सुख शांति में खलल पड़े उसे हुड़दंग कहते हैं। इस पर नियंत्रण होना चाहिए। वैसे पूरी दुनिया में नए वर्ष के आगमन की रात पर हुड़दंग होता ही है किंतु अगर इस पर नियंत्रण किया जा सके तो बहुत अच्छी बात है। भारत का कैलेंडर सदियों पुराना है ।
सड़क के किनारे, फुटपाथ पर, रेलवे स्टेशन के पास, बस-टैक्सी स्टैण्ड के पास या ऐसे ही किसी सार्वजनिक-स्थल पर सर्दियों में गर्मियां बेचते लोग मिल जाएगे। शिमला, चण्डीगढ़, दिल्ली, भोपाल, लखनऊ, कानपुर, पटना, देहरादून, जालन्धर, रायपुर, इन्दौर सहित भारत के सभी प्रमुख शहरों में गर्म कपड़े बचते तिब्बती पुरुष, महिलाएं, युवक-युवतियों के जत्थे, सर्दियों में दिखाई देते हैं। रंग बिरंगे स्वेटर, पुलोवर, मुफलर, टोपियां, जैकेट, ऊन व पश्मीने के शाल, लोइयां आदि सामान सजाएं रहते हैं। गली-गली में पीठ में ये ऊन व ऊन के कपड़े लादे से फेरी लगाकर भी स्वेटर, शालें बेचते हैं।

नवम्बर का महीना आते ही जैसे सर्दियां शुरू होती हैं, तिब्बतियों के झुण्ड के झुण्ड सर्दियों से बचने के साधन लिए हमारे बीच आ जाते हैं। उत्तर भारत में शिमला व दिल्ली में पहले अपने लोगो के पास ये लोग आते हैं। दिल्ली में तो मजनू के टीले मे पास पुर्नवासित तिब्बतियों की पूरी कालोनी ही आबाद है। इसी तरह हिमाचल में भी ये बसे हुए हैं। करीब 30 से 40 हजार तिब्बती व्यापारी सर्दियों में भारत भर में आते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय ही ऊन के बने स्वेटर, मफलर, मोजे, टोपे, जैकेट, शाल, दुशालें, पुलोवर, लूजर आदि बेचना होता है। तिब्बत की ऊन व पश्म, अच्छी होती है; अत: इनके द्वारा निर्मित ऊन के कपड़े अच्छे माने जाते हैं। चमचमाती दूकानों व बड़े उत्पादकों की अपेक्षा, इनका माल अच्छा व सस्ता होता है, इसलिए इनके उत्पादों को मध्यम व उच्चा वर्ग दोनों करते हैं। अधिकांश तिब्बत के युवक युवतियां सुन्दर, ईमानदार व कम बोलने वाले होते हैं, इसलिए इनसे किसी का झगड़ा- झंझट नहीं होता है अपने देश से कटे, स्वाभिमानी तिब्बती आज शरणर्थियों सा जीवन बिता रहे हैं। चीन ने इनकी आजादी छीन ली है, और भारत को छोड़कर दुनिया का कोई देश इनकी मदद करने वाला नहीं है। अधिकांश तिब्बती गरीबी के लिए अभिशापित है और मुश्किल से दो वक़्त की रोटी जुटा पाते है। इनके धर्मगुरू दलाईलामा वर्ष 1959 से भारत में शरण पाए हुए हैं। आज करीब एक लाख 25 हजार तिब्बतो लोग, भारत नेपाल व सिक्किम शरणार्थी बन कर रह रहे हैं। करीब 65 लाख की आबादी वाला तिब्बत का अधिकांश भाग चीन के कब्जे में हैं। गरीबी बेहन्तहा है और कोई दुनिया का देश ये कहने वाला नही है कि तिब्बतियों को भी आजाद होना चाहिए। उन्हें भी अपनी सरकार चुनने, चलाने को स्वतन्त्रा मिलनी चाहिए।

वर्ष 1959 में जब तिब्बती भाग कर भारत आए तो हिमाचल, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश में अलग अलग हिस्सों में शरणार्थी के रूप में रहे। भारत सरकार ने इन्हें कृषि हेतु जमीन व मकान के लिए भी भूमि दी किन्तु तिब्बती लोगों ने इसमें रूचि नहीं दिखाई। घरों, होटलों, ढाबों में नौकरों का काम करने के अलावा इन्हें अपना पुश्तैनी धंधा, ऊन का धन्धा ही ज्यादा अच्छा लगा। अमृतसर इनकी बिक्री का मुख्या केन्द्र है। यहां से तमाम कम्पनियां से माल खरीद कर लेवल बदल भारत भर में बेंचती हैं। लुधियाना, चण्डीगढ़, दिल्ली में भी यह थोक का काराबार करते हैं। बाकी शहरों में तो फुटकर ब्रिकी ही होती है। नवम्बर से फरवरी-मार्च तक तिब्बती ऊन का समान बेंचते हैं, बाद में ये अपने वतन लौट जाते हैं या सौन्दर्य प्रशाधन, महिलाओं के उपयोग की वस्तुएं बेचते हैं।
करीब 105 किलोमीटर क्षेत्र में फैला तिब्बत समुद्र तल से 15 हजार फुट की ऊँचाई पर आबाद है और कड़ाके की ठण्ड पड़ती है। सीमा विवाद को लेकर चीन और भारत की सेना यें तिब्बत में आमने-सामने हैं और युद्ध की स्थिति बनी हुई है। फिर भी साहसी तिब्बती अपने देश में जमे हुए हैं। यहां की भेड़े व बकरियों का ऊन व पश्म अच्छे किस्म का होता है। सदियों से तिब्बती ऊन व पश्म से शाल, स्वेटर, जैकेट, टोपियां, मफलर, लोई आदि बीनते रहे हैं। दलाईलामा, हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला जिले के पास अपना आश्रम बनाकर रहते हैं। आम तिब्बतियों में दलाई लामा के प्रति अटूट आस्था और उन्हें विश्वास है कि एक न एक दिन उन्हें चीन की गुलामी से मुक्ति मिलेगी।
भारत में वर्षों से रह रहे तिब्बती यही रच बस गए हैं। कुछ एक तो सम्पन्न व्यक्ति हो गए हैं और अब, लद्दाख या सिक्किम वापस नहीं जाना चाहते हैं। आज भी तिबबतियों को थुपा और थम खाना पीना अच्छा लगता है। सेब जैसे गोल व सुन्दर चेहरे वाले तिब्बती युवक-युवतियां सामान्यतः सीधे-सच्चे, मित भाषी होते हैं।
ज्यादा मोल भाव करना या झगड़ा टण्टा करना इनकी आदत नहीं है किन्तु जब ये अपस में मिल बैठते हैं, या किसी समारोह में इक्टठे होते हैं तो खूब नाचते, कूदते,गाते, खिलखिलाते व झगड़ते भी हैं। शादी-विवाह, तीज, त्योहार आदि ये आपस में करते व मनाते हैं। सड़क किनारे फुटपाथ की रेलिंग, बिजली के खम्बों में अपनी दूकान सजाएं ये लोग इक्टठे सर्दियों में कहीं भी मिल जाएंगे। पीठ में गर्म कपड़ों, स्वेटरो, शालों का गठ्ठर लाटें, गलियों में फेरी लगाते भी से कहीं भी मिल सकते हैं। चोरी, डकैती की अपेक्षा ये नौकर बनकर अपनी जिन्दगी गुजारनाबेहतर समझते हैं। भारत को ये अपना तीर्थस्थल व मित्र देश मानते हैं। अपने देश, समाज, संस्कृति, कला से कटे टूटे, बिखरे, विपन्न इन तिब्बतियों को उम्मीद है कि फिलीस्तीन की तरह, अफ्रीका की तरह इन्हें भी कभीआजादी मिलेगी और से आजाद तिब्बत में आबाद हो सकेंगे। सामंतवादी साम्राज्यवादी चीन के आतंक से इनको मुक्ति मिलेगी।