’सिंधी साहित्यकारों की दृष्टि में वीर राजा दाहिर सेन का महत्व
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सिन्धी अकादमी को शासन द्वारा इन्दिरा भवन में आवंटित राजा दाहिरसेन सभा कक्ष का आज प्रमुख सचिव भाषा मनीष चौहान के निर्देशन में फीता काटकर उद्घाटन किया गया। उद्घाटन के उपरान्त मां सरस्वती जी एवं भगवान झूलेलाल जी की प्रतिमा पर अकादमी निदेशक अभिषेक कुमार ’अखिल’ प्रकाश गोधवानी, अशोक चॉदवानी, सत्येन्द्र भावनानी, सुरेश छबलानी, राजाराम भावनानी, दुनीचन्द चंदानी, अनिल चंदानी, कनिका गुरूनानी, लाज आदि द्वारा माल्यार्पण कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया।
अकादमी के 30वें स्थापना दिवस के अवसर पर ’’सिंधी साहित्यकारों की दृष्टि में वीर राजा दाहिर सेन’’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में दुनीचन्द चंदानी, पटेल दास हीरवानी, साक्षी बत्रा द्वारा वक्तव्य प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता दुनीचन्द चंदानी द्वारा अवगत कराया गया कि दाहिर सेन सिंध के अंतिम हिन्दू राजा थे, उनके समय में ही अरबों ने सर्वप्रथम 712 ई0 में भारत पर आक्रमण किया था। मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया था जहां पर दाहिर ने उसे रोका और उसके साथ युद्ध लड़ा। उन्होंने मुहम्मद बिल कासिम को कई बार युद्ध में परास्त किया किन्तु मुहम्मद बिल कासिम ने 712 ई0 की लड़ाई में युद्ध में जहरीले तीर एवं भालों से राजा दाहिर सेन के हाथी पर वार किया जिससे हाथी नदी में कूद गया और दाहिरसेन को सिंधु नदी के किनारे परास्त होना पड़ा और लड़़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त हुई ।

वक्ता पटेल दास हीरवानी के उनके जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला और बताया कि राजा दाहिर सेन की मृत्यु के उपरान्त आठवीं सदी में बगदाद के गवर्नर हुज्ज्ज बिल युसुफ के आदेश पर उनका भतीजा और नौजवानी सिपासालार मुहम्मद बिल कासिम ने सिंधु पर हमला करके राजा दाहिर सेन को शिकस्त दी और यहां पर अपना शासन स्थापित किया। दाहिर के पुत्र जय सिंह भी 712 के इस युद्ध में मारे गये। साक्षी बत्रा ने बताया गया कि राजा दाहिर सेन सिंध के अंतिम राजा थे। वह बहुत की साहसी थे उन्होने कई युद्ध लगे परन्तु अपने जीवनकाल में कभी भी कोई युद्ध नही हारे। अकादमी निदेशक अभिषेक कुमार अखिल द्वारा अकादमी कार्यक्रमों एवं योजनाओं के बारे में लोगों को जानकारी प्रदान की गयी।