लंदन से आई एक ताज़ा रिपोर्ट ने वैश्विक ऊर्जा जगत में हलचल मचा दी

डॉ. सीमा जावेद
लंदन से आई एक ताज़ा रिपोर्ट ने वैश्विक ऊर्जा जगत में हलचल मचा दी है। एम्बर नाम के एक स्वतंत्र ऊर्जा थिंक-टैंक ने बताया कि अब बैटरी इतनी सस्ती हो चुकी है कि दिन में बनी सोलर बिजली को स्टोर करके रात में भी आसानी से दिया जा सकता है. यानी सोलर अब सिर्फ ‘डेलाइट’ बिजली नहीं रहा, बल्कि किसी भी वक्त इस्तेमाल होने वाली विश्वसनीय बिजली बन चुका है। रिपोर्ट कहती है कि 2025 में बैटरी स्टोरेज की लागत गिरकर सिर्फ 65 डॉलर प्रति मेगावॉट-घंटा रह गई है। यह लागत चीन और अमेरिका के बाहर की वैश्विक मार्केट के लिए है. ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट पिछले दो सालों में सबसे तेज़ रही है और पूरी दुनिया की बिजली व्यवस्था को नया आकार दे सकती है। एम्बर की ग्लोबल इलेक्ट्रिसिटी एनालिस्ट कोस्तांसा रेंगेलोवा ने कहा, ‘2024 में बैटरी उपकरणों की कीमतें 40′ गिरी थीं. और 2025 में भी वही तेज़ गिरावट जारी है. बैटरियों की अर्थव्यवस्था बदल चुकी है, और उद्योग अभी इस नई हकीकत को समझ रहा है। ‘कैसे सस्ती बैटरी सोलर को ‘हमेशा तैयार’ बिजली बनाती है : अब तक सोलर का सबसे बड़ा सवाल यही था कि दिन में तो यह खूब बनती है, पर रात में क्या? इसका जवाब अब बैटरी दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक पूरी बैटरी स्टोरेज सिस्टम की लागत अब 125 डॉलर/किलोवाट-घंटा रह गई है। इनमें से सिर्फ 75 डॉलर/किलोवाट-घंटा बैटरी उपकरण की कीमत है, जो चीन से आती है। बाकी लागत इंस्टॉलेशन और ग्रिड कनेक्शन की है। इस कम लागत का सीधा मतलब है कि सोलर को स्टोर करके जरूरत पडऩे पर किसी भी समय इस्तेमाल किया जा सकता है।
एम्बर की गणना बताती है कि अगर दिन की आधी सोलर बिजली को बैटरी में स्टोर किया जाए, तो स्टोरेज की लागत कुल बिजली पर सिर्फ 33 डॉलर/ एमडब्ल्यूएच का बोझ डालती है। वैश्विक औसत सोलर कीमत 43 डॉलर/एमडब्ल्यूएच है। इस तरह, स्टोरेज के साथ तैयार बिजली की कुल लागत 76 डॉलर/ एमडब्ल्यूएच बैठती है। रेंगेलोवा कहती हैं, ‘अब सोलर सिर्फ दिन में मिलने वाली सस्ती बिजली नहीं रहा, बल्कि ‘कभी भी’ मिलने वाली मनचाही बिजली बन गया है. यह खासकर उन देशों के लिए गेम-चेंजर है जहां मांग तेज़ी से बढ़ रही है।‘भारत और दुनिया के लिए क्या मायने : रिपोर्ट सीधे कहती है कि सस्ती बैटरी और सोलर मिलकर उन देशों के लिए नई रीढ़ बन सकते हैं जो तेजी से बढ़ती बिजली मांग से जूझ रहे हैं। कोयले पर निर्भर हैं। और ऊर्जा सुरक्षा के जोखिम देख रहे हैं। भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं में जहां पीक डिमांड लगातार बढ़ रही है और कोयले पर निर्भरता अभी भी बहुत अधिक है, बैटरी-समर्थित सोलर सिस्टम शहरों से लेकर गांवों तक बिजली के भविष्य को बदल सकते हैं।
ऊर्जा क्षेत्र में ‘पलटाव’ का संकेत : एम्बर का कहना है कि बैटरी की उम्र बढ़ी है। एफिशिएंसी बेहतर हुई है। फाइनेंस पर लागत कम हुई है और नीतियां अब बैटरियों को स्थिर राजस्व मॉडल दे रही हैं, जैसे पावर स्टोरेज की नीलामी इन सबने मिलकर बैटरी स्टोरेज को बेहद सस्ता, विश्वसनीय और मुख्यधारा का समाधान बना दिया है।
साफ एनर्जी ट्रांजिशन का नया अध्याय : रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि दुनिया का ऊर्जा भविष्य अब सोलर और बैटरी के जोड़ पर खड़ा होगा। ये दोनों मिलकर सस्ती बिजली देंगे। स्थिर पावर सिस्टम बनाएंगे और कोयले-तेल पर निर्भरता खत्म करने की राह तेज़ करेंगे। दुनिया जिस ‘क्लीन पावर मोमेंट’ का इंतज़ार कर रही थी, वह शायद अब तेजी से सामने आ रहा है। भारत की सोलर फैक्ट्रियाँ पकड़ रहीं रफ़्तार, पर आधी क्षमता अब भी ठप है। भारत में सोलर मैन्युफैक्चरिंग का माहौल इन दिनों अजीब तरह की दो आवाज़ें सुन रहा है. एक तरफ जश्न, क्योंकि देश ने पहली बार पोलिसिलिकॉन जैसे मुश्किल हिस्सों में भी वास्तविक क्षमता खड़ी करना शुरू किया है. दूसरी तरफ एक चिंता, क्योंकि ये क्षमता अभी अपनी पूरी ताकत से चल ही नहीं पा रही।
यह दोहरी तस्वीर सामने रखी है। आईईईएफए और जेएमके रिसर्च की नई संयुक्त रिपोर्ट ने, जिसे आज जारी किया गया। रिपोर्ट कहती है कि सरकार की प्रोडक्शन लिंक इंसेंटिव ने सोलर सेक्टर को नई गति ज़रूर दी है। 2021 के 4,500 करोड़ रुपये से शुरू होकर, 2022 में 19,500 करोड़ रुपये और फिर कुल 24,000 करोड़ के पैकेज ने उद्योग को लंबे समय बाद ऐसा प्रोत्साहन दिया जिसकी कमी बरसों से महसूस हो रही थी। लेकिन जमीन पर तस्वीर उतनी सरल नहीं। पीएलआई में जितनी क्षमता का दावा किया गया था, उसका आधा हिस्सा ही अभी ऑपरेशनल है। रिपोर्ट के मुताबिक जून 2025 तक देश ने 3.3 पॉलीसिलिकॉन वफर 29 जीडब्ल्यू सोलर सेल और करीब जीडब्ल्यू मॉड्यूल 120 क्षमता खड़ी कर ली है. पहली बार अपस्ट्रीम वैल्यू चेन में ये प्रगति नोट करने लायक है।
पर आईईईएफए जेएमके रिसर्च साफ कहती है कि यह उपलब्धि अपनी पूरी ताकत में तब बदलेगी जब घोषित 65 जीडब्ल्यू मॉड्यूल क्षमता के मुकाबले महज़ 31 त्रङ्ख की चालू क्षमता जैसी खाइयों को भरा जाएगा. निवेश के लक्ष्य और वास्तविक निवेश के बीच का फर्क भी बड़ा है. अनुमानित 94,000 करोड़ के मुकाबले अब तक 48,120 करोड़ रुपये ही लगे हैं। यह रिपोर्ट, जिसे लिखा है आईईईए$फए की विभूति गर्ग और जेएमके रिसर्च के प्रभाकर शर्मा, चिराग तेवानी और अमन गुप्ता ने, यह भी चेतावनी देती है कि अगर विस्तार समय पर नहीं हुआ तो कंपनियाँ 41,834 करोड़ रुपये तक का संभावित नुकसान झेल सकती हैं।
रिपोर्ट के लेखकों का तर्क स्पष्ट है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती से अपस्ट्रीम से आ रही है, जहां पॉलिसिलिकॉन और वफर जैसे हिस्सों के लिए देश अब भी लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है। ग्लोबल कीमतों में तेज गिरावट भारतीय निर्माताओं की लागत-प्रतिस्पर्धा को और मुश्किल बनाती है। ऊपर से तकनीकी उपकरणों और स्किल्ड मैनपावर की कमी तस्वीर को और जटिल बनाती है। आईईईएफए और जेएमके रिसर्च का आकलन है कि भारत ने दिशा सही पकड़ ली है, पर रास्ता आसान नहीं. दुनिया की सोलर सप्लाई चेन जिस तेज़ी से बदल रही है, उसमें भारत के पास मौका भी है और चुनौती भी। मौका इस बात का कि वह वैश्विक खिलाड़ी बन सके। चुनौती इस बात की कि ऐसा तभी होगा जब अपस्ट्रीम,। रिपोर्ट का निचोड़ यही कहता है कि पीएलआई ने दरवाज़ा खोल दिया है, पर कमरे को रोशन करने के लिए अभी काफी काम बाकी है।