राष्ट्रीयता थोपी नहीं जाती, वह नागरिकों के भीतर से पैदा होती है
लखनऊ। दलित, ओबीसी, माइनारिटीज, आदिवासी परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद डॉ. उदितराज ने कहा कि इंसान की बराबरी, स्वतंत्रता और आज़ादी की कोई कीमत नहीं रह गई है। रीति-रिवाजों का महत्व इंसानियत से अधिक हो गया है। ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य कर दीजिए या कुछ और कर दीजिए, जब तक इंसान की आज़ादी, उसके अधिकार और सम्मान को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक सब व्यर्थ रहेगा। राष्ट्रीयता थोपी नहीं जाती, वह नागरिकों के भीतर से पैदा होती है। कोई व्यक्ति ‘वंदे मातरम् या ‘जन गण मन’ के समय खड़ा न हो, फिर भी सच्चा देशभक्त हो सकता है, और दिखावे के लिए खड़ा होने वाला व्यक्ति गद्दार भी हो सकता है। उदितराज ने कहा कि अब ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम्’ गाया जाएगा। स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में यह अनिवार्य होगा। अमेरिका में राष्ट्रीय झंडा जलाकर या उसे विकृत करके विरोध जताया जाता है। वहां लोग झंडे का उपयोग शर्ट, टोपी और अन्य वस्तुओं पर भी करते हैं। यदि किसी को राष्ट्रीय भावना देखनी हो तो अमेरिकियों से सीखे।

आज भी प्राइमरी स्कूलों में दलित रसोइया का बनाया सवर्ण बच्चे नहीं खाते
उन्होंने कहा कि क्या ‘वंदे मातरम्’ से वास्तव में कोई फर्क पड़ने वाला है? क्या इससे राष्ट्रीय भावना और भाईचारा बढ़ेगा? यदि बढ़े तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है? स्कूलों में दलित बच्चों के साथ मिड-डे मील के दौरान भेदभाव आम बात है। कई स्कूलों में एससी/एसटी बच्चों को उच्च जाति के बच्चों से अलग बिठाकर खाना खिलाया जाता है। दलित रसोइयों के हाथ से बने भोजन को सवर्ण बच्चे खाने से इंकार कर देते हैं। उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर में 2018 की एक रिपोर्ट में सामने आया कि एक स्कूल में 76 में से केवल 6 बच्चों ने मिड-डे मील खाया, क्योंकि खाना एक दलित रसोइया ने बनाया था। कानपुर देहात के एक प्राइमरी स्कूल में वहां की प्रधानाध्यक दलित रसोइया से शौचालय साफ करा रही थी। क्या ऐसे मामलों में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई।
उदितराज ने कहा कि यहां पत्थर और पहाड़ की पूजा की जाती है। राष्ट्रीय गान के समय खड़े न होने पर बवाल हो जाता है, लेकिन छुआछूत सामान्य बात समझी जाती है। धरती, नदी और परंपरा की पूजा की बात से नेताओं के भाषण शुरू होते हैं। क्या दुनिया में इतना भेदभाव वाला समाज कहीं और होगा? हर गांव, गली, संस्थान और सार्वजनिक स्थल पर कुछ हो या न हो, जातीय नफरत अवश्य मिल जाती है। अब तो मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति भी वैसा ही व्यवहार शुरू हो गया है।