मुस्लिमों के सामने पहचान का संकट और नागरिकता पर संदेह

इरशाद राही
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसकी बुनियाद विविधता, समानता और संवैधानिक मूल्यों पर टिकी है। इस देश की मिट्टी में अनेक धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ साथ-साथ पली-बढ़ी हैं। मुसलमान इस बहुलतावादी समाज का एक अभिन्न हिस्सा रहे हैं और उन्होंने शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान, व्यापार और स्वतंत्रता संग्राम तक में ऐतिहासिक योगदान दिया है। इसके बावजूद आज भारतीय मुसलमान कई गंभीर समस्याओं और चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जिन पर ईमानदारी से चर्चा किया जाना समय की आवश्यकता है। आज मुसलमानों के सामने सबसे बड़ा संकट उनकी पहचान और नागरिकता पर उठते सवाल हैं। एक आम मुसलमान को अक्सर उसके नाम, पहनावे या धार्मिक पहचान के कारण संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। नागरिक होने से पहले उसे अपनी देशभक्ति प्रमाणित करनी पड़ती है। यह स्थिति केवल एक समुदाय की पीड़ा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है, जहाँ समानता और गरिमा का अधिकार संविधान द्वारा सुनिश्चित किया गया है।
शिक्षा और आर्थिक पिछड़ापन : एक कड़वी सच्चाई
शिक्षा और आर्थिक स्थिति के क्षेत्र में मुसलमानों की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। विभिन्न सरकारी रिपोर्टें यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि शिक्षा, सरकारी नौकरियों और संगठित क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम है। बड़ी संख्या में मुसलमान असंगठित क्षेत्र, छोटे कारोबार और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं, जहाँ न स्थायित्व है और न सामाजिक सुरक्षा।
शिक्षा के अभाव और आर्थिक असमानता का यह चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है, जिससे समुदाय का एक बड़ा हिस्सा मुख्यधारा के विकास से पीछे छूट जाता है।
मीडिया और सार्वजनिक छवि
मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश मुख्यधारा के कुछ माध्यम मुसलमानों की छवि को नकारात्मक घटनाओं से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। इससे समाज में भय, भ्रम और नफरत का माहौल बनता है। मुसलमानों की उपलब्धियाँ, उनके संघर्ष और सकारात्मक योगदान शायद ही कभी सुर्खियों में आते हैं। इस एकतरफा प्रस्तुति से सामाजिक ध्रुवीकरण और गहराता है।
सुरक्षा, न्याय और कानून का प्रश्न
बीते वर्षों में भीड़ हिंसा, झूठे आरोप और लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं ने मुसलमानों के भीतर असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है। कानून का राज तभी सार्थक होता है, जब वह बिना भेदभाव के लागू हो। यदि किसी समुदाय को यह महसूस हो कि न्याय उसके लिए देर से या संदेह के साथ आता है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है।
धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक दबाव
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन व्यवहार में कई बार धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं को विवाद और राजनीति का विषय बना दिया जाता है। मस्जिदों, मदरसों, त्योहारों और धार्मिक प्रतीकों को संदेह के दायरे में रखना सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाता है। मुसलमानों की समस्याओं का समाधान केवल शिकायतों या आरोप-प्रत्यारोप से संभव नहीं है। इसके लिए निष्पक्ष शासन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आर्थिक अवसरों का विस्तार, निष्पक्ष मीडिया और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है। सरकार को चाहिए कि वह विकास योजनाओं को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के लागू करे और समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चले।
साथ ही समाज को यह समझना होगा कि किसी एक समुदाय को कमजोर करना पूरे देश को कमजोर करना है। भारत की ताकत उसकी एकता और विविधता में है, न कि विभाजन में।
निष्कर्ष
भारतीय मुसलमानों की समस्याएँ केवल अल्पसंख्यक मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र, न्याय और समानता की परीक्षा हैं। जब तक देश का हर नागरिक सुरक्षित, सम्मानित और समान अधिकारों से युक्त महसूस नहीं करेगा, तब तक विकास और प्रगति अधूरी रहेगी। मुसलमानों को संदेह नहीं, अवसर चाहिए, नफरत नहीं, समानता चाहिए; और बहिष्कार नहीं, भागीदारी चाहिए। यही भारत की आत्मा है और यही उसके उज्ज्वल भविष्य का रास्ता।