जो हमसे जलने वाले है मंज़िल उन्हें मिलेगी

मो. रफीक सलमानी (मामू)
गजल
हाथ मलते रह जायेंगे जो हमसे जलने वाले है मंज़िल उन्हें मिलेगी
जो साथ साथ चलने वाले हैं शीशे का मकाँ है तुम्हारा ज़रा होशियार
तुम रहो तुम्हारी तरफ भी अब पत्थर उछलने वाले हैं कितने गिरेंगे गश खाकर
आज इस बस्ती में सुना है आज वो बेनकाब निकलने वाले हैं समझा बुझा के मैंने उन्हें खामोश कर दिया है
अरमान इस दिल के जो भी मचलने वाले हैं हमने किया यकीन उनकी ज़बाँ पर
मगर क्या ख़बर थी कि वो बात बदलने वाले हैं वादों का इनसे कोई सरोकार ही न हो
जैसे अपने वादों से ये तो मुकरने वाले हैं बुलन्दी पे आ गये अब कदम सम्भाल के रखना
इस कोह के संग बड़े ही फिसलने वाले हैं सीखा कहाँ से तुमने ये शीरी अन्दाज़े बयानी
तेरे हर अल्फाज़ मेरे दिले में उतरने वाले ह उल्फत वफा खुलूस इनायत मुहब्बत रग्बत
वो भी काट डाले जो शजर फलने वाले हैं कयामत तो अभी हरगिज़ हो ही नहीं सकती
जब तक इस दुनियाँ में खुदा से डरने वाले हैं राहों में फूल नहीं पलकों को बिछा दिया है
सुना है आज वो इघर से गुज़रने वाले हैं मेरे ही अक्स का पैरहन पहन लिया है
उसने खुद से मिलने के लिए उससे मिलने वाले हैं इस मुलाकात को यादगार बना लो
वरना बिछड़ जायेंगे ये लम्हात बिखरने वाले हैं
गर्मों में जीने की तो आदत सी पड़ गई है कौन समझाये इन्हें “रफीक” ये तो घुलने वाले हैं