पतंगोत्सव के रूप में भी मनाई जाती है मकर संक्रांति

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“उड़ी-उड़ी रे पतंग, चली बादलों के संग”

 

              शिवचरण चौहान

कागज व बांस की पतली खप्पचियों से बनी पतंग को देखते ही बच्चे और बड़े सभी दीवाने हो जाते हैं। रील-मंझा लेकर छत पर या मैदान में ऊंचे आसमान तक पतंग उड़ाना बहुत अच्छा लगता है। पर शायद बहुत कम लोगों को मालूम हो पतंग का जन्म कहां हुआ? वैसे पतंग पहले कहां बनीं और उड़ाई गई, इस विषय में विवाद है किन्तु मान्यता है कि पतंग का आविष्कार डेढ़ हजार वर्ष से भी पहले चीन में हुआ था। चीन में हान वंश के शासनाकाल में पतंग उड़ाए जाने का विवरण मिलता हैं। भारत में भी प्राचीनकाल से पतंगें उड़ाई जाती रही हैं। भारत में संस्कृत में पतंग को बाल गुडी कहा गया है। अमरकोश में भी पतंग का उल्लेख मिलता है। पतंग का संस्कृत में अर्थ हवा में उड़ने वाली वस्तु होता है। संस्कृत में पतंग के लिये बाल गुडी’ शब्द आया है। तुलसीदास ने भी पतंग को “बालगुडी’ कहा है।

भारत में पतंगों के दंगल व मेले मुगलों के शासन काल में लगने शुरू हो गए थे। मकर संक्रांति, गणतंत्र दिवस, पन्द्रह अगस्त, नागपंचमी और रक्षा बन्धन पर भी पतंगें उड़ाई जाती हैं। मकरसंक्रांति 14 _ 15 जनवरी को राजस्थान समेत पूरे भारत में पतंगें उड़ाई जाती हैं! अब तो प्लास्टिक की पन्नियों वाली, जगमग रोशनी व संगीत वाली पतंगें भी बनने व बिकने लगी हैं। मुगल बादशाह “आलमशाह” प्रथम को पतंगबाजी का बेहद शौक था। उसी ने पतंग को शाही खेल का दर्जा दिया और पतंग प्रतियोगिताएं शुरू कराई। अंग्रेज शुक्रवार को पतंग उड़ाते थे। सन् 1969 में दिल्ली में दिल्ली काइट प्लाइंग एसोसिएशन का गठन हुआ। पतंग को उर्दू में कनकौआ कहते हैं।

प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक माइकल फैराडे ने जून 1752 में पतंग के जरिये ही आकाश की बिजली का पता लगाया था। भारत के अलावा जापान, थाईलैण्ड, चीन,कोरिया, अमेरिका, पाकिस्तान, इण्डोशिया में भी पतंग उड़ाने की प्रतियोगिताएं होती हैं। प्रतिवर्ष 14 जनवरी को राजस्थान की राजधानी जयपुर में विश्व पतंग प्रतियोगिता होती है। दुनिया भर की पतंग बाज जयपुर आते हैं और पतंग प्रतियोगिता में भाग लेते हैं। दुनिया में भारत कैसा देश है जहां पर विश्व पतंग प्रतियोगिता होती है। दुनिया की सबसे बड़ी पतंग 1936 में जापान के नारूटो नगर में बनाई गई थी। इसे बनाने में साढ़े आठ टन कागज लगा था इसे उड़ाने में सत्तर लोगों ने डोर थामी थी।

नीदरलैण्ड के गिरटि वेंडरलू ने नायलान से एक पतंग बनाई थी जिसका वजन 230 किलोग्राम था

नीदरलैण्ड के गिरटि वेंडरलू ने नायलान से एक पतंग बनाई थी जिसका वजन 230 किलोग्राम था। इसे 3 अगस्त 1981 को शेवेनिजेन नामक पतंगबाज ने 40 मीटर ऊंचाई तक उड़ाया था। एक ही डोरी में सर्वाधिक पतंगें उड़ाने का श्रेय जापान के काजुदिको असाबा का था। उसने 21 सितम्बर 1978 को एक ही डोरी में 2128 पतंगें एक साथ उड़ाई थीं। सन् 1983 में 14 मीटर चौड़ी व 19 मीटर लम्बी पतंग उडाने का रिकार्ड भी जापान का है। 118 मीटर उड़ी दुनिया की सबसे लम्बी पतंग को 500 लोगों ने उड़ाया था। सबसे अधिक ऊंचे यानी 9 किलोमीटर 740 मीटर ऊंचाई तक पतंग उड़ाने का श्रेय जर्मनी के लिडेनबर्ग को है, जिसने पहली अगस्त 1919 ई. को 8 पतंगों को एक सथ उड़ाया था। सबसे ऊपर की पतंग 9,740 मीटर तक उड़ी थी। अकेली पतंग 3 किलोमीटर 801 मीटर तक, 28 फरवरी 1898 में अमेरिका में उड़ाई गई थी।

सबसे तेज गति से यानी 195 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से पतंग उड़ाने का रिकार्ड अमेरिका के पीट डीग्याकोमा के नाम है। उन्होंने 22 सितम्बर 1989 के दिन पतंग उड़ाकर यह कीर्तिमान बनाया। लगतार 180 घण्टे 17 मिनट यानी सात दिन रात से अधिक समय तक पतंग उड़ाने का कीर्तिमान वाशिंगटन (अमेरिका) में सन् 1982 को 21 से 29 अगस्त तक पतंग उड़ाकर बनाया जा चुका है। सन् 1840 में मजबूत डोर से होमन वाल्स नामक अमेरिका युवक ने निपाग्रा जल प्रपात के ऊपर पतंग उड़ाई थी। इस डोर में मोटे-मोटे जल प्रपात के ऊपर लटका कर झूलता हुआ पुल बनाया गया था।

पतंग बाजी के रिकार्ड

जहां बड़ी-बड़ी पतंगे बनाई गई वहीं छोटी पतंगे बनी, जो माचिस की डिबिया में भी रखी जा सकती हैं। पतंगों से खबरें, संदेश भेजने, जासूसी करने के भी किस्से है। सेना के संदेश भी भेजने का काम भी पतंगों के माध्यम से किया जा चुका है। आज भारत में हर गली मुहल्ले में छोटी बड़ी पतंगे मिल जाती हैं। चरखी, धागा, मंझा , डोर, ढील, पेंच आदि शब्द पतंगबाजी में प्रचलित हैं। बच्चे, जवान और बूढ़े सभी पतंगों के खेल में रूचि लेते हैं। प्रेमचंद्र की कहानी के “बड़े भाई साहब” भी पतंग लूटने से अपने को नहीं रोक पाए थे।

भारत में अहमदाबाद में 2 फरवरी 1986 को एक पतंग संग्रहालय बनाया गया था। यहां प्रतिवर्ष पतंगों का मेला लगता है। यहां दुनिया भर की पतंगे व पतंगों से संबंधित सामान व साहित्य खरीद सकते हैं। जयपुर और अहमदाबाद में पतंगबाजी प्रतियोगिताएं होने लगे हैं यहां पर अनेक देशों के लोग प्रतियोगिता में भाग लेने आते हैं। जयपुर की पतंग और बरेली का मांझा बहुत लोकप्रिय है। लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की पतंग उड़ाते थे और पतंग के दंगल आयोजित करवाते थे। 10 पतंगे काटने वाले को नौ शेर खां की उपाधि दी जाती थी। कविताओं, कहानियों, फिल्मों में पतंगबाजी के किस्से भरे पड़े हैं। आज के कम्प्यूटर युग में भी पतंगबाजी, बच्चों व बड़ों में बेहद लोकप्रिय हैं। पतंगबाजी करते समय एक बात का विशेष ध्यान रखें की चाईनीज मांझे किसी की गर्दन ना कटने पाए। चीन से आए पतंग के मांझे बहुत खतर नाक अा रहे हैं। चीन के मांझे का प्रयोग कतई न करें।

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