भोले मन

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नासमझी जीवन की भारी, गलेे पड़े भीतर बीमारी

  डाॅ. जितेन्द्र राव

( आचार्य केजीएमयू )

नासमझी जीवन की भारी

गलेे पड़े भीतर बीमारी

यदि उत्तम हो आहार विहार

जीवन में खिलता फूलो का हार

आओ दिनचर्या को जाने

जीवन अपना समृद्व बनाये

सांसो की महिमा को जाने

आती जाती नजर बनाये

थोडा सा व्यायाम जरूरी

सेायी जीवन शक्ति जगायें

नाश्ता अपना कभी न भूले

फल और पेय को दोस्त बनाये,

दोपहर का भोजन हो हल्का

चाहे चपाती मिलेट या फुल्का

देर शाम करो, अन्तिम भोजन

सम्यक कर्म व वाणी हो तन मन

उच्च कोटि का ज्ञान ही धन

नहीं विकारो में फसना तुम,

दूर रहो व्यसनों से भोले मन तुम।।

 

 

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