पत्ता टूटा डाल से, ले गई पवन उड़ाय

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बसंत आने के लिए पतझड़ अनिवार्य है


 शिवचरण चौहान

पत्ता टूटा डाल से, ले गई पवन उड़ाय।
अब के बिछड़े ना मिलें, दूर पड़ेंगे जाय।।

हेमंत और शिशिर ऋतु पाले की ऋतु है। इन दोनों रितुओं में इतनी अधिक सर्दी होती है/ बर्फ गिरती है /पाला पड़ता है कि पेड़ों/ पौधों के पत्ते पीले पड़ जाते हैं, नीम के पत्ते पीले तो अमरूद के पत्ते कत्थई रंग के हो जाते हैं। डालें तक सूख जाती हैं। पाला के मारे पेड़ पौधे अपनी पत्तियां नीचे गिरा देते हैं। इसे ही पतझड़ कहते हैं। एक एक पत्ते जब सूखकर डाल से नीचे गिर जाते हैं तो पेड़ ठूंठ नजर आता है। बरगद ,पीपल, शीशम, आम आदि के विशाल वृक्ष भी पतझड़ कर देते हैं। पतझड़ प्रकृति का सत्य है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

जैसे ही जीर्ण शीर्ण फटे हुए कपड़े छोड़कर मनुष्य नए कपड़े धारण करता है उसी तरह शिशिर से मुरझाए पत्ते पतझड़ करते हैं और फिर बसंत में नई कोपलें पेड़ पौधों की डालियों में मुस्कुराने लगती हैं। आम में मंजरियां और पौधों में फूल खिल खिलाने लगते हैं। यही तो मनुष्य के जीवन का सत्य है। बालपन युवावस्था के बाद वृद्धावस्था पतझड़ ही तो है। जिसके बाद नवा नि ग्रहनात्रि नरो परानी आत्मा नया तन धारण करती है। बरसों पहले पराग बाल पत्रिका में एक बाल कविता छपी थी।
पत्ते गिरने लगे डाल से।
एक-एक कर दांत गिरे जो
बूढ़ी दादी के।।
जब पत्ते पेड़ से गिरने लगें तो पतझड़ मान लेना चाहिए और जब मुख से दांत गिरने लगें तो वृद्धावस्था आई मान लेना चाहिए। पतझड़ बहुत ज्ञान देता है। पतझड़ के बाद बसंत आता है यह सत्य है किंतु पतझड़ से गुजरे बगैर बसंत कदम नहीं रखता। पेड़ों के पत्ते झर जाते हैं। तमाम पशु और पक्षियों के पंख,/पंखे भी बसंत में झर कर नए उगते हैं। सन 1987 में शशि कपूर और ऋषि कपूर की एक फिल्म आई थी सिंदूर। इस फिल्म में एक गाना था जिसे लता मंगेशकर ने गाया था
पतझड़ सावन बसंत बहार।
एक बरस के मौसम चार।
इसे लिखा था आनंद बख्शी ने। सावन के बाद पतझड़ आता है और पतझड़ के बाद ही बसंत की बहार। बसंत का मौसम ही प्यार का मौसम है। जब भी प्यार का मौसम आएगा वह बसंत का ही मौसम होगा। पतझड़ के बगैर बसंत बहार नहीं आती। यह कटु सत्य है। प्राकृतिक घटना है।
एक शेर है
बहार पतझड़ों की राख से पनपती है
इसलिए उसे पतझड़ ही रास आता है।

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है।
जाने न जाने गुल ही न जाने,बाग ती सारा जाने है।।

सुमित्रानंदन पंत का गीत है

झरो झरो झरो जंगम जग प्रांगण में
जीवन संघरसन में नव युग परिवर्तन में
मन के पीले पत्तों झरो झरो झरो।।
सन सन शिशिर समीरण, देता क्रान्ति निमंत्रण।
यह जीवन विस्मृत क्षण,जीर्ण जगत के पत्तों झरो झरो ।।
कवि सुमित्रानंदन पंत भी कहते हैं कि पतझड़ के बाद ही नए जीवन की शुरुआत होती है। जीव जगत के पत्ते झड़ जाने पर ही नया जीवन यानी बसंत आता है।

सुप्रसिद्ध गीतकार / कवि हरिवंश राय बच्चन पतझड़ के स्वागत में गाते हैं—

है पतझड़ की यह शाम सखे!
नीलम से पल्लव टूट गए।
मरकत से साथी छूट गए।
अटके फिर भी दो पीत पात
जीवन डाली को थाम सखॆ।
है पतझड़ की यह शाम सखॆ।।
जीवन डाली को आखरी तक पत्ता तक आस लिए रहता है। कविवर बच्चन जी पतझड़ गीत के माध्यम से जीवन की सच्चाई बयान करते हैं।

भगवती चरण वर्मा गाते हैं—-

पतझड़ के पीले पत्तों ने
प्रिय देखा था मधुमास कभी।
जो कहलाता है आज रुदन
वह कहलाया था हास कभी।
आंखों के मोती बन बनकर
जो टूट चुके हैं अभी अभी
सच कहता हूं उन सपनों में
भी था मुझको विश्वास कभी।।

कबीर का तो कहना ही क्या—

जैसी पात गिरे तरुवर से मिलता बहुत दहेला।ना जाने कब कहां मिलेगा, लगा पवन का रेला।।
पता नहीं डाल से टूटे पत्ते अब कहां मिलेंगे? पतझड़ में पत्ते गिरते हैं हवा का रेला आ जाता है और पत्तों को न जाने कहां उड़ा ले जाता है? यही तो जीवन की सच्चाई है। पेड़ में पतझड़ आने के कुछ समय बाद ही बसंत आ जाता है। पेड़ के पीले पत्ते गिरते देखकर जहां उदासी आती है वही पेड़ को अपने नव पल्लव और फूल की कलियां देख कर मन प्रसन्न हो जाता है ।यही तो जीवन का सत्य है।

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