बहुजन संवाद : संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए 18 अक्टूबर को राष्ट्रीय मंथन

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बहुजन कर्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक करेंगे राष्ट्रीय संवाद; जनआंदोलन की दिशा में लिया जाएगा बड़ा फैसला : डॉ. उदित राज

नई दिल्ली। दलित, ओबीसी, माइनॉरिटीज और आदिवासी संगठनों के परिसंघ (डोमा परिसंघ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद डॉ. उदित राज ने बताया कि 18 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में देशभर के बहुजन कर्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और चिंतक राष्ट्रीय संवाद में भाग लेंगे। इस संवाद में संविधान, लोकतंत्र, आरक्षण, सामाजिक न्याय और बहुजन समाज के भविष्य से जुड़े गंभीर सवालों पर विचार-विमर्श किया जाएगा तथा राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा फैसला लिया जाएगा।
डॉ. उदित राज ने कहा कि जिस तरह से चुनावी प्रक्रिया में कथित वोट चोरी और हेरफेर के आरोप सामने आ रहे हैं, उससे लोकतंत्र के साथ-साथ नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और राजनीतिक अस्तित्व पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ऐसे समय में नागरिक समाज का मौन रहना न केवल अपने अधिकारों से समझौता करना है, बल्कि देश और संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना भी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश के युवा, विद्यार्थी, वकील, पत्रकार और जागरूक नागरिक संविधान तथा लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब बहुजन समाज उदासीन कैसे रह सकता है?

उन्होंने कहा, “पिछले लोकसभा चुनाव में संविधान बचाने की लड़ाई वोट के माध्यम से लड़ी गई और उसमें कुछ सफलता भी मिली। लेकिन अब संघर्ष को केवल चुनाव तक सीमित नहीं रखा जा सकता। संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर व्यापक जनआंदोलन खड़ा करना होगा।”

संसद और न्यायपालिका से निराशा, जनआंदोलन ही विकल्प

डॉ. उदित राज ने संसद और न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि संसद में लगातार गतिरोध के कारण देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा नहीं हो पा रही है। कभी-कभार कोई जनप्रतिनिधि आवाज उठाता भी है, तो उसका अपेक्षित प्रभाव दिखाई नहीं देता।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बावजूद अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर अपेक्षित राहत नहीं मिल रही है। उच्च न्यायपालिका में जातिवाद, भाई-भतीजावाद और पारदर्शिता के अभाव को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था में सामाजिक प्रतिनिधित्व और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
डॉ. उदित राज ने सवाल किया, “आखिर उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति किस पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया से होती है? क्या उनकी नियुक्ति किसी खुली परीक्षा या सार्वजनिक चयन प्रक्रिया के माध्यम से होती है? जब देश की सर्वोच्च संस्थाओं में ही सामाजिक विविधता और पारदर्शिता का अभाव होगा, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करेगा?”
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का दायित्व संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है। लेकिन जब संवैधानिक संस्थाओं की निष्क्रियता पर सवाल उठाने वालों को ही कठघरे में खड़ा किया जाने लगे, तो लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंता स्वाभाविक है। “जब संसद में जनता की आवाज बेअसर होने लगे और न्यायपालिका से भी अपेक्षित न्याय न मिले, तब लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण जनआंदोलन ही परिवर्तन का सबसे प्रभावी रास्ता बचता है।”

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