अपनी औकात यानी इंसानियत और ज़मीनी हक़ीक़त को कभी मत भूलिए

लखनऊ। डीपीआरए के प्रदेश प्रवक्ता व लखनऊ के अध्यक्ष एवं बलरामपुर अस्पताल के चीफ फार्मेसिस्ट राजीव कुमार ने कहा कि हाल ही में नज़र से गुज़री यह पंक्ति सोचने पर मजबूर कर देती है कि “अहंकार ठीक है औकात के अनुसार, अगर रावण बनोगे तो दशहरा भी तय है। इसी बात को वसीम बरेलवी साहब ने अपने इस मशहूर शेर में क्या ख़ूब कहा है-
आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है,
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है।
अहंकार का पहला रूप : हद और औकात (स्वाभिमान)
पंक्ति का पहला हिस्सा कहता है— “अहंकार ठीक है औकात के अनुसार। इंसान के अंदर अपनी मेहनत, हुनर और वजूद का थोड़ा-बहुत ‘स्वाभिमान’ होना ज़रूरी है।
ताकि दुनिया उसे दबा न सके। पर जब तक यह अपनी मर्यादा (औकात) में रहती है, तब तक इंसान सुरक्षित रहता है।
अहंकार का दूसरा रूप : जब इंसान ‘रावण’ बनने लगता है
लेकिन जब इंसान अपनी हद भूलकर ख़ुद को ‘सर्वश्रेष्ठ’ और दूसरों को ‘तुच्छ’ समझने लगता है, तब स्वाभिमान बदलकर ‘अहंकार’ का रूप ले लेता है।

अहमद फ़राज़ साहब ने इस ‘अहंकारी रवैये’ की कसक को कुछ यूँ बयान किया था:
वो जिस घमंड से बिछड़ा, गिला तो इस बात का है,
कि सारी बात मोहब्बत में रख-रखाव की थी।
जब रिश्तों और ज़िंदगी में ‘रख-रखाव’ (सहनशीलता और झुकना) ख़त्म हो जाता है, तब इंसान अकेलेपन के अंधेरे में चला जाता है। हर अहंकार का अपना ‘दशहरा’ होता है।
रावण परम ज्ञानी, महाबली और अपार ऐश्वर्य का स्वामी था। लेकिन उसका ज्ञान और शक्ति उसके अहंकार के सामने हार गए। इसीलिए कहा गया है— “अगर रावण बनोगे तो दशहरा भी तय है।
वक़्त की चाल और कुदरत का नियम हमेशा याद दिलाता है:
”ज़ोम (घमंड) कितना करते हो इक चराग़ पर अपने,
और हवा के चलने में देर कितनी लगती है!
शोहरत, दौलत या पद कितना भी बड़ा क्यों न हो, पैर हमेशा ज़मीन पर होने चाहिए। झुकना कमज़ोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता (Maturity) का प्रतीक है। अपनी औकात यानी इंसानियत और ज़मीनी हक़ीक़त को कभी मत भूलिए।