अगर जल्द ही बहुजन मीडिया स्थापित नहीं किया गया तो लोकतंत्र की हत्या तो होगी साथ ही बहुजन समाज के मुद्दे भी अदृश्य होंगे
प्रबुद्ध भारत निर्माण संघ के राष्ट्रीय संयोजक देव प्रताप सिंह का कहना है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है ,यही कारण है बहुजन महापुरुषों ने मीडिया की भूमिका को समझा। ब्रिटिश पीरियड में देखें बाबा ब्लांगकर, राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले,बाबा साहब आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम साहब ने समाचार पत्रों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से स्थापित करने का प्रयास किया। आज गोदी मीडिया कहें या आरएसएस का झुंड जो मीडिया को नियंत्रित करता है यदि इसे रोकने के लिए बहुजन मीडिया स्थापित नहीं किया गया और संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित नहीं किया तो लोकतंत्र की हत्या तो होगी ही बहुजन समाज के मुद्दे भी अदृश्य होंगे।

मीडिया की शक्ति व जवाबदेही और अधूरा लोकतंत्र
भारत में टीवी न्यूज़ चैनलों के लिए एक संस्था है—NBDSA (News Broadcasting & Digital Standards Authority)। नाम इतना लंबा और प्रभावशाली कि सुनकर लगे मानो मीडिया की जवाबदेही का अंतिम किला हो। लेकिन ज़रा नतीजे देखिए। सैकड़ों शिकायतें। सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाले शो। “घर वापसी” “आरक्षण विरोधी प्रोग्राम”। “लव जिहाद”, “थूक जिहाद”, “भूमि जिहाद”, “जनसंख्या जिहाद” जैसे अभियानों के नाम पर महीनों चलने वाली प्राइम टाइम अदालतें और मानवता विरोधी षडयंत्र। बिना सबूत के आरोप सामान्य बात है। बिना न्यायालय के फैसले के मीडिया ट्रायल चल रहा है । समाज को धर्म की नफरत में बांटने वाले कार्यक्रम और नफरत की पीढ़ी तैयार करने का रेडियो रवांडा जैसी हरकतें और परिणाम की सोचिए .. कभी वीडियो हटाओ। कभी माफ़ीनामा चलाओ। कभी एक लाख रुपये का जुर्माना भर दो। आज के टीवी उद्योग में एक लाख रुपये क्या हैं?
एक प्राइम टाइम शो के विज्ञापन ब्रेक की कीमत भी कई बार इससे अधिक होती है। यानी यदि आरोप सही हैं, तो व्यवस्था का संदेश यह बनता है कि पहले करोड़ों दर्शकों तक नफ़रत पहुँचाओ, टीआरपी कमाओ, विज्ञापन बटोर लो, राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा करो और बाद में सांकेतिक जुर्माना भरकर आगे बढ़ जाओ। लेकिन आदिवासी मुद्दों पर आपने आरएसएस के झुंड मीडिया में आदिवासी मुद्दों पर कब बहस देखी है?

मीडिया में आदिवासी मुद्दे के 5 प्रमुख बिंदु पर नज़र डालो और बताओ कब मुद्दे पर चर्चा मीडिया में देखी है कितने वर्ष पहले देखी है या महीने पहले
1. जल जंगल जमीन के अधिकार
आदिवासी समुदायों के पारंपरिक भूमि अधिकार, वनाधिकार अधिनियम (FRA, 2006) का क्रियान्वयन, तथा खनन और विकास परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन के मुद्दे।
2. आदिवासी विस्थापन और पुनर्वास
बांध, खनन, औद्योगिक परियोजनाओं और वन संरक्षण नीतियों के कारण आदिवासियों के विस्थापन तथा उचित पुनर्वास और मुआवजे की समस्या।
3. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में विद्यालयों, शिक्षकों, अस्पतालों, डॉक्टरों तथा पोषण सुविधाओं की कमी और उससे जुड़ी चुनौतियां।
4. सांस्कृतिक पहचान और भाषा संरक्षण
आदिवासी भाषाओं, लोककला, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रश्न तथा मुख्यधारा मीडिया में उनके प्रतिनिधित्व की कमी।
5. आदिवासी समूह का आर्थिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम (PESA), आरक्षण, स्थानीय स्वशासन, तथा नीति निर्माण में आदिवासी समुदायों की प्रभावी भागीदारी का मुद्दा।
राजनीतिक भागीदारी एवं सामाजिक न्याय व डॉ. भीमराव आंबेडकर की चेतावनी
डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था : “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो वह बुरा सिद्ध होगा।”
यह बात केवल सरकार पर नहीं, लोकतंत्र की सभी संस्थाओं पर लागू होती है—मीडिया पर भी। डॉ. आंबेडकर ने संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) को लोकतंत्र की आत्मा बताया था। यदि मीडिया तथ्य, न्याय और निष्पक्षता की जगह पूर्वाग्रह, उन्माद और प्रचार को चुनता है, तो वह संवैधानिक नैतिकता को कमजोर करता है।
भगत सिंह ने 1928 में लिखा था : “प्रेस का असली कर्तव्य जनता को शिक्षित करना, संकीर्णताओं को दूर करना, सांप्रदायिक भावनाओं का विरोध करना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को मजबूत करना है।”उन्होंने चेतावनी दी थी कि जब प्रेस जनता को शिक्षित करने के बजाय लोगों को भड़काने लगे, तब वह अपने सामाजिक दायित्व से भटक जाता है। आज जब टीआरपी की होड़ में समाचार और उत्तेजना के बीच की रेखा धुंधली हो रही है, तब भगत सिंह की यह चेतावनी पहले से अधिक प्रासंगिक लगती है।

मीडिया विचारकों की चेतावनी
अमेरिकी पत्रकार और मीडिया विचारक वाल्टर-लिपमैन (Walter Lippmann) ने कहा था : “जहाँ सभी लोग एक जैसा सोचते हैं, वहाँ कोई भी बहुत अधिक नहीं सोच रहा होता।” मीडिया का काम सत्ता, समाज और स्वयं मीडिया पर भी प्रश्न उठाना है, न कि एक ही आख्यान को लगातार दोहराना। पत्रकारिता के महान सिद्धांतकार बिल_कोवाच और टॉम रोज़ेनस्टील लिखते हैं : “Journalism’s first obligation is to the truth.” “पत्रकारिता का पहला दायित्व सत्य के प्रति है।”यदि सत्य की जगह सनसनी ले ले, तो पत्रकारिता लोकतंत्र की प्रहरी नहीं, प्रचार का उपकरण बन जाती है।
अमेरिकी मीडिया विद्वान नोम चॉम्स्की ने कहा था : “The smart way to keep people passive and obedient is to strictly limit the spectrum of acceptable opinion.” “लोगों को निष्क्रिय और आज्ञाकारी बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका है स्वीकार्य विचारों की सीमा को संकुचित कर देना।” लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व विचारों का विस्तार करना है, न कि बहस को संकुचित करना।
असली समस्या क्या है : समस्या केवल कुछ चैनलों की नहीं है। समस्या उस “Self_Regulation” मॉडल की है जिसमें रेगुलेटर के पास न लाइसेंस निलंबित करने की शक्ति है, न प्रसारण रोकने की, न ही ऐसी आर्थिक दंड व्यवस्था जो बड़े मीडिया समूहों को वास्तव में प्रभावित कर सके। लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता अनिवार्य है। लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता और दंडमुक्ति एक ही चीज़ नहीं हैं। यदि कोई डॉक्टर बार-बार गलत इलाज करे, कोई इंजीनियर बार-बार गलत पुल बनाए, कोई पायलट बार-बार सुरक्षा नियम तोड़े, तो उसके पेशेवर परिणाम होते हैं। फिर मीडिया के लिए अलग व्यवस्था क्यों?क्योंकि लोकतंत्र में मीडिया केवल एक उद्योग नहीं है। वह सार्वजनिक चेतना का निर्माता है। और जब चेतना का निर्माता ही जवाबदेही से मुक्त हो जाए, तब झूठ समाचार नहीं रह जाता—वह सामाजिक वास्तविकता बन जाता है। अंतिम प्रश्न सभी भारतीय नागरिकों से है।
डॉ. आंबेडकर ने लोकतंत्र को केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं, बल्कि समानता, बंधुत्व और संवैधानिक नैतिकता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था माना था।
भगत सिंह ने प्रेस को जनता का शिक्षक माना था। और आधुनिक मीडिया सिद्धांत पत्रकारिता को सत्य एवं सार्वजनिक हित के प्रति उत्तरदायी मानते हैं।
इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि NBDSA ने कितने जुर्माने लगाए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत में मीडिया की शक्ति के अनुपात में उसकी जवाबदेही भी मौजूद है? यदि उत्तर “नहीं” है, तो यह बहस केवल मीडिया की नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता, नागरिक विवेक और संविधान की आत्मा की बहस है।
“स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र की आवश्यकता है, लेकिन जवाबदेह मीडिया लोकतंत्र की सुरक्षा है।”