सामाजिक लोकतंत्र की बहाली के बिना बहुजनों का हित असंभव

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मरना तो सबको एक दिन है ही लेकिन समाज के लिए जियो, जिन्दगी का एक उद्देश्य बनाओ : डॉ. आम्बेडकर

 


                          कमल जयंत

बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर के महानिर्वाण दिवस पर पूरा बहुजन समाज उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहा है। सामाजिक संगठनों के साथ ही सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से उन्हें श्रद्धांजलि देने के साथ ही उनके आदर्शों पर चलने और शोषितों व वंचितों को संविधान में प्रदत्त उन्हें उनके अधिकार देने या दिलाने की बात कर रहे हैं। लेकिन इस मौके पर बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर का यह विचार आज भी बहुजनों के लिए प्रेरणादायक है, उन्होंने कहा था कि ‘इंसान जीता है, पैसे कमाता है, खाना खाता है और अन्त में मर जाता है। जीता इसलिए है ताकि कमा सके, कमाता इसलिए है, ताकि खा सके और खाता इसलिए है ताकि जिन्दा रह सके लेकिन फिर भी मर जाता है। अगर सिर्फ मरने के डर से खाते हो तो अभी मर जाओ, मामला खत्म, मेहनत बच जायेगी। मरना तो सबको एक दिन है ही लेकिन समाज के लिए जियो, जिन्दगी का एक उद्देश्य बनाओ, गुलामी की जंजीरों से जकड़े समाज को आजाद कराओ, अपना और अपने बच्चों का भरण-पोषण तो जानवर भी कर लेता है, मेरी नजर में इंसान वही है जो समाज की भी चिन्ता करे और समाज के लिए कार्य करे। सामाजिक क्रान्ति राजनैतिक क्रान्ति की जननी है। देश में सदियों से प्रचलित सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक गैर बराबरी एवं शोषण पर आधारित मनुवादी विचारधारा द्वारा पुष्पित एवं पल्लवित लगभग 15 प्रतिशत सुविधा सम्पन्न व अधिकार प्राप्त आबादी द्वारा 6743 जातियों/उपजातियों में बांटी गयी लगभग 85 प्रतिशत अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं पिछड़ी जातियों के साथ अमानवीय व्यवहार करके उन्हें शिक्षा, सत्ता, सम्पत्ति एवं सम्मान के अधिकार से वंचित रखा गया एवं इन्हें शूद्रों की श्रेणी में रखते हुए दयनीय जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया।

85 प्रतिशत आबादी वाली इन वंचित, शोषित बहुसंख्यक जातियों को संगठित करने का कार्य यद्यपि समय-समय पर किया जाता रहा है परन्तु सर्वप्रथम भारत का संविधान बनाते समय बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रयासों से भारतीय संविधान में प्राविधानित समानता, स्वतंत्रता, बंधुता एवं पंथनिरपेक्षता की मूल भावना के अनुरूप इन बहुसंख्यक जातियों को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व राजनैतिक आदि अनेक अधिकार दिये गये ताकि वे मनुवादी, गैरबराबरी व शोषण की व्यवस्था से मुक्त होकर देश मे अन्य सम्पन्न वर्गों के समान सम्मानजनक जीवन जी सकें। किन्तु संविधान लागू होने के इतने लम्बे वर्षों के बाद भी संविधान विरोधी मनुवादी ताकतें अपना वर्चस्व निरंतर कायम रखने के लिए इन बहुजन समाज को आपस मे बांटकर उन्हें भ्रमित करते हुए सत्ता पर काबिज हैं और इन 85 प्रतिशत एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. एवं अल्प संख्यकों को उन्हें संविधान में दिये गये पूर्ण अधिकार व हक नहीं दे रहे हैं। इनके संवैधानिक अधिकारों को दिलाने के लिए सर्वप्रथम बहुजन नायक कॉशीराम जी ने ही यह मंत्र दिया कि बहुजन समाज के लोग अपने अधिकार केवल शासन सत्ता पर काबिज होकर ही प्राप्त कर सकते हैं, जिसके लिए उन्होंने बामसेफ नामक संगठन के माध्यम से विभिन्न जातियों में बंटे दलितों, आदिवासियों, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक वर्गों को एक सूत्र में संगठित करने का अभियान चलाया जिसका सार्थक परिणाम 1990 के दशक से दिखायी पडऩे लगा, लेकिन शिक्षा की कमी, सामाजिक एवं धार्मिक जकडऩ व राजनैतिक एकता के अभाव में बहुजनों को संविधान सम्मत कुछ ही अधिकार मिल सके और आगे बहुत कुछ मिलना बाकी है।

ये संविधान विरोधी ताकते बहुजनों में आपसी फूट इस आधार पर डालते हैं कि बहुजनों की विभिन्न जातियां एक दूसरे का अधिकार छीन रही है। जैसे अनुसूचित जातियों में चमार, जाटव, पासी के लिए यह दुषप्रचार करते हैं कि ये अन्य अनुसूचित जातियों का हक छीनती हैं। चूँकि पिछडी जातियों की जातिवार जनगणना नहीं होती है। इसका लाभ लेकर मनुवादी विचारधारा वाले संविधान विरोधी यह दुषप्रचार करते हैं कि यादव, कुर्मी जैसी कुछ जातियां दूसरी पिछडी जातियों से ज्यादा लाभ ले रही हैं। देश मे लगभग 15 प्रतिशत जो सवर्ण जातियां हैं उनकी भी जातिगत जनगणना नहीं होती है इसलिए यह पता नहीं चलता है कि इनकी कितनी संख्या है एवं इनका कितने संसाधनों पर कब्जा है। इसलिए जरूरी है कि सभी जातियों की जातिगत जनगणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण कराया जाये, जिससे यह पता चल सके कि किस जाति की कितनी संख्या है एवं किस जाति का देश के समस्त संसाधनों पर कितना कब्जा है। हम सभी को यह पता होना चाहिए कि वे कौन लोग हैं जो जातिगत जनगणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण का विरोध कर रहे हैं। अब तो यह स्थिति आ गयी है कि देश में 10 वर्षीय आम जनगणना भी नहीं हो रही है जो वर्ष 2021 में होनी थी। वर्ष 2025 भी शुरू हो गया है अभी तक इसे कराये जाने की कोई सुगबुगाहट नहीं है। इसलिए यह आवश्यक है कि वर्तमान मे हम लोग एक साथ मिलकर संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष करें एवं विशेष रूप से जातीय जनगणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण कराये जाने के लिए घर-घर जाकर लोगों के बीच जन जागरण का कार्य करें।

ें सामाजिक व राजनैतिक संघर्षों में सभी संगठनों को एक साथ आना होगा : फतेह बहादुर

सामाजिक संस्था बहुजन भारत व अन्य तमाम संगठनों समेत देश में भी कई सामाजिक संगठन इस दिशा में अलग-अलग काम कर रहे हैं। बहुजन भारत संस्था के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस कुंवर $फतेह बहादुर का कहना है कि इस संस्था का गठन इसी उद्देश्य से किया गया है कि विभिन्न जातियों में बटे दलितों, आदिवासियों, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक वर्गों के बीच सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने के साथ ही उनमें राजनीतिक चेतना पैदा की जाये। वैसे बहुजन भारत संस्था का प्रयास है कि ये सभी संगठन समाज हित में आने वाली सामाजिक एवं राजनैतिक संघर्षों में एक साथ संगठित हों। साथ ही यूपी समेत सभी राज्यों व देश मे सत्ता पर काबिज होने की बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर की परिकल्पना को साकार करें।

कुंवर फतेह बहादुर का कहना है कि उनका ये संगठन एक प्रकार से बामसेफ की तरह दलितों, पिछड़ा वर्ग व अल्प संख्यक समाज का गैर धार्मिक, गैर आन्दोलनकारी, गैर राजनीतिक, बौद्धिक बैंक की तरह हैं। इनका मुख्य लक्ष्य संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा सत्ता प्राप्ति के माध्यम से गैर बराबरी व विभाजन पर आधारित मनुवादी सामाजिक व्यवस्था एवं आर्थिक विपन्नता से इन वंचित शोषित वर्गों को मुक्ति दिलाना है और इन वर्गों में सामाजिक एवं राजनैतिक जागरूकता, आपसी विश्वास एवं भाईचारा पैदा करना है, जो इन वर्गों के बीच सम्पर्क एवं कैडर के माध्यम से कर सकते हैं। इसलिए सभी संगठनों से आहवान है कि वे अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में रहने वाली एस.सी.,एस.टी.,ओ.बी.सी. एवं अल्पसंख्यकों के बीच घर-घर जाकर जन जागरण व कैडर के माध्यम से उनमें चेतना एवं सामाजिक भाईचारा विकसित करें।

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