माँ बाप का जो, खिदमतगार नहीं है

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वाल्दैन से जो, कर जायेगा किनारा, दुनियाँ में भला है, न आखिरत में गुज़ारा

    मो. रफीक सलमानी (मामू)

माँ बाप का जो, खिदमतगार नहीं है
कौन कहता है कि, वो गुनाहगार नहीं है
वाल्दैन से जो, कर जायेगा किनारा
दुनियाँ में भला है, न आखिरत में गुज़ारा
वाल्दैन को अगर, हम सतायेंगे
वैसे ही हमारे बच्चे, भी पेश आयेंगे
हाथ बड़ा कर दीजिए, है हाथ की ज़रूरत
तन्हा इन्हें न छोडिय़े, है साथ की जरूरत
कितने नखरे उठाये हैं माँ-बाप ने
सोचिये उनका क्या सिला दिया है आपने
दरियादिली माँ-बाप की, पाल दिया है
हमें जि़न्दगी के साँचे में
ढाल दिया है ऐसे माँ-बाप की, हम खि़दमत नहीं करते
क्यों उनसे आज, हम मोहब्बत नहीं करते
माँ-बाप के प्यार को भुलाइये नहीं
लबों पर रहे तबस्सुम, इन्हें रुलाइये नहीं
वालिद से मिलती है नसीहत,
ढेर सारा प्यार वालिदा के दामन में,
खुशियाँ हैं बेशुमार दुनियाँ में बहुत ऊँचा है,
दर्जा माँ-बाप का उम्र भर की खिदमत से भी,
नहीं उतरता कर्जा माँ-बाप का
वो औलाद बड़ी ही खुशनसीब है
माँ-बाप का साया, जिनके करीब है
बैठने को मिल रहा है, ममता की छाँव में
समन्दर पार कर ले, बैठ कर दुआओं की नाव में
क्या सोच कर तूने, इन्हें छोड़ दिया है
मुहब्ब्त से लबरेज़ दिल, तोड़ दिया है
माँ-बाप का तुझ पर, अगर दुलार हो जायेगा
तो ये फरमान है जन्नत का, तू हकदार हो जायेगा
दूर रहेंगी तुझसे, ज़माने की हर बलायें
अगर साथ हैं तेरे, माँ-बाप की दुआयें
वो जानेंगे माँ-बाप को, जो खो चुके हैं
इनके जैसा प्यार न मिला, सबके आगे रो चुके हैं
नाजेबा है जो, उन खताओं से बचो सुकून चाहते हो
तो, माँ-बाप की बद्दुआओं से बचो
प्यार और ममता थी, उनके लगाव में
तन्हाई की बेड़ी डाल दी, तूने उनके पाँव में
शजर लगाया था, कि बैठेंगे इसकी छाँव में
अरमान सब झुलस गये, वक्त के अलाव में
जाने कहाँ खोया है, तू किसके प्यार में
आँखें पथरा गई, माँ-बाप की तेरे इन्तिज़ार में
वाल्दैन को छोड़ दिया,
‘रफीक’ ज़ईफगाह में क्या वक्अत होगी तेरी, अल्लाह की निगाह में

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