तानाशाह हमेशा हथियारों से नहीं आते—वे चुनाव जीतकर भी सत्ता में पहुँचते हैं
नई दिल्ली। दलित, ओबीसी, माइनारिटीज एवं आदिवासी संगठनों का परिसंघ (डोमा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद डॉ. उदितराज ने कहा कि भारतीय संविधान को बचाने के लिए हमें घर से निकलकर सडक़ों पर लोकतांत्रिक व अहिंसक आंदोलन चलाना होगा। नहीं तो संविधान विरोधी ताकतें भारतीय संविधान को खत्म करके यहां मनु का कानून लागू कर देंगी।

उनका कहना है तानाशाह हमेशा हथियारों से नहीं आते—वे चुनाव जीतकर भी सत्ता में पहुँचते हैं। इतिहास गवाह है: जर्मनी में हिटलर, इराक़ में सद्दाम हुसैन, लीबिया में गद्दाफी, श्रीलंका, बांग्लादेश और कई अन्य देशों में भी तानाशाही चुनावी प्रक्रिया के सहारे ही मजबूत हुई और अंततः उन्हें जन–आंदोलन ने ही हटाया।
बहुत संभव है कि 2027 में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की घोषणा कर दी जाए
बिहार चुनाव के बाद भी अगर किसी को यह भ्रम है कि केवल राजनीतिक दल ही इन शक्तियों को रोक लेंगे, तो यह भूल जाएँ। जो चुनाव स्वयं ईमानदारी से जीत नहीं पा रहे, उनसे उम्मीद करना अब व्यर्थ है। बहुत संभव है कि 2027 में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की घोषणा कर दी जाए। जिस तरह बिहार में बेईमानी से चुनाव जीते गए, उसी तरह 2029 के लोकसभा चुनाव में भी धांधली कर ‘400 पार’ कर संविधान बदलने की पूरी कोशिश की जा सकती है। यह खतरा बिल्कुल वास्तविक और सामने खड़ा दिख रहा है।
आरक्षण पहले ही लगभग समाप्त कर दिया गया है। जो लोग कहते थे कि ऐसा नहीं होगा, उन्हें अब सच्चाई समझ में आ जानी चाहिए। इसलिए अब यह बहस भी बंद होनी चाहिए कि फलाना नेता को यह करना चाहिए या नहीं—सबकी नाकामी सामने है; हमें खुद आगे आना होगा।बिहार चुनाव के नतीजों के बाद दूरदर्शी लोग चिंतित हैं। मैं कल मुंबई में था, वहाँ भी अनेक लोग निराशा और हताशा में मिले। उनका कहना था कि अब संविधान खतरे में है। इस निराशा से लोगों को बाहर निकालने और नई ऊर्जा देने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है।
संविधान और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई किसी एक की नहीं, बल्कि हम सबकी
उदितराज ने कहा कि सौभाग्य से, 30 नवंबर 2025 को दिल्ली के रामलीला मैदान में संविधान और वोट बचाने के लिए एक बड़ी रैली होने जा रही है। हर जागरूक नागरिक को, हर काम छोड़कर, इस रैली में शामिल होना चाहिए। यह उपस्थिति न केवल मनुवादी ताकतों के बढ़ते हौसलों को कमजोर करेगी, बल्कि बहुजन समाज में फैली मायूसी को भी कम करेगी। यदि अभी जन–आंदोलन नहीं हुआ, तो वही हालात पैदा होंगे जैसे इतिहास में बौद्ध धर्म और बौद्धों के साथ हुआ—मार–काट और दमन के माध्यम से उनका नाम तक मिटा दिया गया। ठीक वैसा ही संविधान और बहुजनों के विचार के साथ भी किया जा सकता है। अब समय है कि हम सब मिलकर आवाज़ उठाएँ। संविधान और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई किसी एक की नहीं, बल्कि हम सबकी है।