पीडीए दिवस पर आपत्ति मायावती की संकुचित विचारधारा का परिचायक

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कांशीराम जी को किसी एक दल से जोड़कर देखना गलत : फतेह बहादुर

कमल जयंत

सामाजिक संस्था बहुजन भारत के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस कुंवर फतेह बहादुर का कहना है कि बहुजन नायक कांशीराम जी को किसी एक जाति या किसी सियासी दल विशेष से जोड़कर देखना गलत है। कांशीराम जी महापुरुष हैं और महापुरुष किसी दल विशेष का नहीं हो सकता। कांशीराम जी की जयंती के मौके पर 15 मार्च को समाजवादी पार्टी पीडीए दिवस मना रही है तो इसमें गलत क्या है और बसपा अपनी पार्टी के संस्थापक के सम्मान में आयोजित होने वाले कार्यक्रम को लेकर इतना विचलित क्यों हो रही है।

मायावती जी ने पार्टी की मूल विचारधारा बहुजन को बदलकर सर्वजन कर दिया

दरअसल सपा ने भी कांशीराम जी की मूल परिकल्पना दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समाज को जोडऩे के लिए ही पीडीए का गठन किया है। कांशीराम जी ने भी इन वर्गों को जोड़कर बहुजन समाज बनाया था। दुर्भाग्यवश बहुजनों को बसपा से जोड़े रखने के लिए पार्टी प्रमुख मायावती जी ने लंबे समय से काम करना बंद कर दिया। कांशीराम जी के देहावसान के बाद मायावती जी ने पार्टी की मूल विचारधारा बहुजन को बदलकर सर्वजन कर दिया। बसपा नेतृत्व ने वंचितों की लड़ाई लड़ना बंद कर दिया है और वे चाहती हैं कि इन वर्गों की लड़ाई कोई और दल भी न लड़े। मौजूदा राजनीतिक हालात में यूपी में बहुजन समाज की लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक केवल सपा ही लड़ रही है।

सपा द्वारा बहुजन नायक की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने का फैसला स्वागतयोग्य कदम

अब ऐसेे में अगर कोई सियासी दल बहुजनों की बात करता है और कांशीराम जी के आदर्शों पर चलने की बात करता है तो उसका विरोध करने के बजाय बसपा नेतृत्व को उनका स्वागत करना चाहिए। सपा प्रमुख अखिलेश यादव जी ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों को जोड़ने के लिए पीडीए बनाया और पीडीए का मूल विचार कांशीराम जी का है उन्होंने इन वर्गों को एकजुट करने के लिए बहुजन समाज बनाया।

सपा बहुजनों को पीडीए कह रही है तो इसमें बुराई क्या है

कुंवर फतेह बहादुर का कहना है कि इसलिए बहुजन समाज के निर्माता के जन्मदिन को पीडीए दिवस के रूप में मनाये जाने का सपा नेतृत्व का फैसला स्वागतयोग्य है। इसकी सराहना की जानी चाहिए। उनका कहना है कि मायावती जी ने बहुजनों की लड़ाई लड़ना बंद कर दिया है और पूरी पार्टी को आत्म केन्द्रित कर लिया है। ऐसी स्थिति में सपा बहुजनों की बात कर रही है, कांशीराम जी के आदर्शों पर चलने की बात कर रही है, हां सपा बहुजनों को पीडीए कह रही है तो इसमें बुराई क्या है।

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