पुलिस ज्यादती के बाद भी हजारों लोग रामलीला मैदान में जुटे
कमल जयंत
नई दिल्ली। दलित, ओबीसी, माइनॉरिटीज और आदिवासी संगठनों का परिसंघ (डोमा परिसंघ) द्वारा रविवार को अंबेडकर भवन, रानी झांसी रोड, नई दिल्ली में हज़ारों लोगों ने डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा के समक्ष संविधान बचाने की शपथ ली। यह एक अनोखा कार्यक्रम था, जिसमें हजारों लोगों ने डॉ. अंबेडकर का मुखौटा लगाकर संकल्प लिया। रैली रामलीला मैदान में होनी थी लेकिन बीजेपी नेता की शिकायत पर पुलिस ने एनओसी देने से इनकार कर दिया। अनुशाशनबद्ध होने के कारण कार्यक्रम में परिवर्तन किया गया, फिर भी हज़ारों लोग शामिल हुए। सरकार की ज्यादती आज भी देखने को मिली। जुलाई से प्रचार हो रहा था, कार्यक्रम रद्द होने की खबर दी गयी, फिर भी लोग रामलीला मैदान में पहुंचे और उनके साथ पुलिस ने दुव्र्यवहार किया। क्या लोक तंत्र खत्म हो गया है? डोमा के नेशनल चेयरमैन, डॉ. उदित राज ने संबोधित करते हुए कहा कि संविधान और जनतंत्र बचाना अब केवल राजनीतिक दलों के वश का नहीं रह गया है। तमाम संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हो चुकीं हैं, जिन्हें कुछ ही लोग लडक़र सुरक्षित नहीं कर सकते। अगर संविधान को बचाना है तो जन आंदोलन ही एकमात्र विकल्प है।

अल्पसंख्यकों की धार्मिक आजादी लगभग छीन ली गई
डॉ. उदितराज ने कहा कि अल्पसंख्यकों की धार्मिक आजादी लगभग छीन ली गई है। कदम-कदम पर मुस्लिम समाज के साथ भेदभाव हो रहा है। ईसाई समाज जब प्रार्थना करता है तो उस पर धर्मांतरण का आरोप लगाकर प्रताडि़त किया जाता है। वर्तमान हालत में मुस्लिम और ईसाई समाज से अन्य वंचित समाज जैसे- दलित, पिछड़ा और आदिवासी के साथ सामाजिक नेटवर्किंग करना ही एकमात्र विकल्प है, जिससे संविधान और लोकतंत्र की भी रक्षा हो सकेगी। डोमा एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है, फिर भी सत्ताधारी दल क्यों इतना डरा और सहमा है। पहले से निर्धारित कार्यक्रम को नहीं करने दिया और अंत तक पुलिस के द्वारा रुकावट पैदा की जाती रही।
डोमा के हजारों लोगों ने डॉ. अंबेडकर का मुखौटा पहनकर संविधान बचाने का संकल्प लिया

दिल्ली में चाहे जितनी बड़ी रैली या सम्मेलन हो उसका असर सीमित ही रहता है, इसलिए डोमा के साथी आज अंबेडकर का संदेश लेकर वापस जाएं और गाँव, ब्लॉक और जिला तथा प्रदेश स्तर पर संगठन खड़ा करें ताकि सामाजिक न्याय और वैज्ञानिक सोच धरातल पर उतरे। यह कार्य शायद राजनैतिक दलों से बेहतर सामाजिक संगठन कर सकते हैं। जिस तरह से पाखंड और धर्मांधता सत्ताधारी दल के द्वारा प्रचारित किया जा रहा है, उससे विज्ञान और टेक्नोलॉजी का महत्व खत्म हो रहा है और हो जाएगा और देश फिर से गुलाम बनेगा। जिस किसी समाज में मीडिया और सत्ता खुद के स्वार्थ में धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास और पाखंड फैलाए तो न वहां के लोगों का जीवन बेहतर हो सकता है और न ही आर्थिक स्थिति में सुधार।