टैगोर का लिखा जन गण मन अधिनायक जय हे + क्या अब प्रासंगिक नहीं रहा!

शिवचरण चौहान
गान और गीत खोज लेना चाहिए! रविंद्र नाथ टैगोर का लिखा जन गण मन अधिनायक जय हे + क्या अब प्रासंगिक नहीं रहा! रवींद्रनाथ टैगोर के गीत में अधिनायक शब्द का प्रयोग किंग जॉर्ज पंचम के स्वागत के लिए किया गया है ऐसा बहुत से लोगों का मानना है। अब सिंध भी भारत का हिस्सा नहीं रहा तो ऐसे में नया राष्ट्रगीत रचा जाना चाहिए। ऐसी मांग बहुत समय से अनेक बुद्धिजीवी उठाते रहे हैं। रेडियो सीलोन के उद्घोषक अमीन सायनी ने एक बार कहा था कि भारत को अपना नया राष्ट्रगीत खोज लेना चाहिए।
यदि वंदे मातरम गीत संस्कृत और बांग्ला निष्ट न होता तो उससे बढ़िया राष्ट्रगीत और कोई नहीं था। वंदे मातरम गाने में कुछ लोगों को इसलिए परेशानी होती है कि उसमें ईश्वर का गुणगान किया गया है। टैगोर ने आजादी से 37 वर्ष पहले जन गण मन अधिनायक गीत लिखा था और भारत भाग्य विधाता शब्द किंग जॉर्ज पंचम के लिए माना गया। किंग जॉर्ज पंचम ने हीं बंगाल विभाजन को अंतिम मुहर लगाई थी। यह गीत कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था । भारत भाग्य विधाता, अधिनायक शब्द हमेशा विवादित रहे हैं और कहा जाता रहा है कि यह किंग जॉर्ज पंचम के लिए लिखा गया था।
अब ऐसा राष्ट्रगीत तैयार हो जिसमें भारत का स्पंदन हो। जन गण मन अधिनायक आज भारत के राष्ट्रगीत के रूप में एकदम सही नहीं बैठता। झंडा ऊंचा रहे हमारा। विजई विश्व तिरंगा प्यारा भी एक अच्छा गीत है। या सच है कि राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान बार बार नहीं बदले जाते किंतु आज के परिवेश में भारत की उपलब्धियों को देखते हुए नए राष्ट्रगीत की तलाश की जा सकती है। इसके लिए प्रबल इच्छाशक्ति की जरूरत है। जो सरकार ने अब तक हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं घोषित कर पाईं वे आज के परिवेश का राष्ट्रगीत लिखवा कर स्वीकार कर पाएंगे इसमें संदेह नजर आता है।
ना समझेंगे तो मिट जाएंगे हम भारत के सभी वासी।
हमारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।