क्या रहने लायक नहीं रही दिल्ली!

Share

वायु प्रदूषण/ विषैली होती हवा, क्या होगा महानगरों का विकल्प!

 

शिवचरण चौहान

भारत के महानगरों में दिल्ली की हवा सबसे विषैली पाई गई है। कोलकाता ,बेंगलुरु और कानपुर जैसे शहर भी खतरनाक स्तर पर प्रदूषित हैं,। दुनिया भर के अखबारों पत्रिकाओं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह खबरें प्रमुखता से दिखाई जा रही है। किंतु सबक लेने के लिए ना तो सरकार और ना आम लोग तैयार हैं!
कई सालों से यह सवाल उठता रहा है। क्या हमारे महानगर अब मनुष्यों के रहने लायक नहीं रहे? दिन पर दिन प्रदूषित होती हवा/ खतरनाक होती जलवायु के कारण अब आदमी कहां जाकर रहेगा जहां उसकी जान सुरक्षित रह सके। क्या अब छोटे-छोटे गांव बसा कर झोपड़ी डालकर रहने के दिन आ गए हैं! क्या फिर अरण्य संस्कृति जन्म लेगी,।

बहुत पहले बंगलुरु वासियों को चेतावनी दी गई थी कि कुछ सालों बाद बैंगलोर ( बंगलुरु) मनुष्यों के रहने लायक शहर नहीं रह जाएगा! आज यही स्थिति दिल्ली सहित देश के अनेक महानगरों की हो गई है। अनेक महानगर अब रहने लायक नहीं रहे इनका पर्यावरण बहुत खराब हो चुका है और ऑक्सीजन का लेबल रोज पर रोज घटता जा रहा है। सरकारें सिर्फ वादे वादे और वादे करती हैं। आम जनता भी सब देख सुन कर भी अपनी तरफ से खुद सुधार नहीं करना चाहती। मोटर गाडिय़ों का प्रयोग धुआंधार किया जा रहा है। विकास के नाम पर लगाए गए कल कारखाने जहर उगल रहे हैं। धूल और धुआं आज सबसे प्रमुख समस्या है। आदमी की धूर्तता इस सब की जिम्मेदार है।

सुप्रीम कोर्ट चिंतित है आखिर होगा क्या? अगर अभी हम नहीं सुधरे तो मनुष्य का जीवन कैसे बचेगा?

अभी कुछ दिन पहले भारत के उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी की वायु गुणवत्ता के बारे में गहरी चिंता व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्यों की सरकारों को फटकार लगाते हुए पूछा कि दुनिया को आखिर हम क्या संदेश दे रहे हैं? राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दिल्ली, नोएडा गुरुग्राम में लगातार हवा जहरीली बनी हुई है और नौकरशाही हाथ पर हाथ रखे बैठी है। न्यायाधीशों ने कहा, वायु गुणवत्ता के गंभीर श्रेणी में जाने का इंतजार बंद कर पहले से कार्रवाई क्यों नहीं की जाती ? सरकारों को वैज्ञानिक व सांख्यिकी मॉडल के आधार पर कदम उठाने चाहिए। एनसीआर में बिगड़ी वायु गुणवत्ता को नियंत्रित करने के लिए आपात कदम उठाने का निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान तत्कालीन सीजेआई एनवी रमण की पीठ ने कहा था कि हम गंभीर स्थिति होने का इंतजार करते रहते हैं कि तब कदम उठाएंगे। नौकरशाही के इस रवैये को बदलना होगा। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के सुझावों जैसे औद्योगिक प्रदूषण, ताप कोयला बिजलीघरों, मोटर वाहनों से कार्बन उत्सर्जन, धूल नियंत्रण, डीजल जनरेटरों पर रोक के साथ कुछ और दिन ‘घर से काम’ को बढ़ावा देना चाहिए था। पर गरीब देश में यह संभव नहीं है। आयोग को सांख्यिकी आधारित मॉडल पर भरोसा दिखाना होगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया,था कि कोयले से चलने वाले छह बिजली संयंत्रों को बंद किया गया है ट्रकों के प्रवेश पर रोक है और शैक्षणिक संस्थानों को बंद करने जैसे कदम उठाए गए हैं।

जजों ने कहा था, यह काफी नहीं हैं, प्रदूषण पर अंकुश के लिए हवा की चाल के सांख्यिकी मॉडल को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के साथ दिल्ली, हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश की सरकारों को कठोर चेतावनी दी थी । साधारण लोगों की बात कौन कहे अब तो सुप्रीम कोर्ट भी कहता है कि इतने साल नौकरशाही क्या कर रही थी? आखिर इतने वर्षों से नौकरशाही क्या कर रही है? अफसरों को पर्यावरण सुधारने के लिए मौके पर जाना चाहिए काम करना चाहिए ताकि ठोस परिणाम सामने आ सके। पराली जलाने के मसले पर विशेषज्ञों को साथ लेकर गांवों में जाना चाहिए, किसानों से बात करनी चाहिए। उन्हें जागरूक करना चाहिए, उनकी समस्याएं सुनें, समाधान निकालें। वैज्ञानिकों को शामिल कर निर्णय हों। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने प्रदूषण रोकने के लिए मौसमी मॉडलिंग का सुझाव दिया। कहा, जनवरी से मार्च, अप्रैल से जून, जुलाई से सितंबर और नवंबर से दिसंबर तक दिल्ली में अलग मॉडल होना चाहिए।
इतना सब के बावजूद ना तो केंद्र सरकार और ना दिल्ली सरकार कुछ ठोस कदम उठाने को तैयार है। यही हाल सभी प्रदेश की सरकारों का है। दिल्ली ही नहीं लखनऊ, कानपुर इलाहाबाद, वाराणसी, मेरठ चेन्नई कोलकाता, हैदराबाद अहमदाबाद सूरत सहित अनेक महानगरों की हालत बहुत खराब है। इन महानगरों की हवा जहरीली हो गई है। इन सब शहरों के निवासियों, अधिकारियों नगर निगम और प्रांत सरकारों को मिलकर काम करना पड़ेगा ।स्वैच्छिक संगठनों को आगे आना पड़ेगा तभी जहरीली हवा में कुछ सुधार हो सकता है वरना अस्पताल मरीजों से भरे रहेंगे नर्सिंग होम में सीट नहीं बचेगी और हम असमय काल के गाल में जाने को मजबूर होंगे। प्रकृति से छेड़छाड़ होगी तो प्रकृति बदला भी लेगी जिसके बहुत भयंकर परिणाम सामने आते हैं। कुछ सालों में प्रकृति के भयंकर परिणाम देखने में आए हैं।

आज भारत ही नहीं दुनिया भर में पर्यावरण के लिए धूल और धुआं बहुत खतरनाक है। इसी के कारण हमारी जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। किंतु धूल और धुआं से भी ज्यादा खतरनाक मनुष्य की धूर्तता भी है। यह धूर्तता ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में साफ दिखाई पड़ी थी। ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में दुनिया भर में धुआं फैलाने वाले देशों ने धूर्तता की है। चीन ,रूस और अमेरिका , ऑस्ट्रेलिया आदि संपन्न देशों में दुनिया के आसमान में 45 प्रतिशत से भी ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ा है किंतु इसकी भरपाई करने के लिए अपने हिस्से की राशि प्रगतिशील देशों के नहीं दी। अपनी धूर्तता के कारण अमीर देशों ने प्रगतिशील देशों की स्थिति बहुत खराब कर दी है। अमीर देशों के अमीर यात्रियों ने इतनी अधिक हवाई यात्राएं की हैं कि आसमान धुएं से भरा हुआ है। हवाई जहाज में प्रयुक्त ईंधन इतनी अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करता है जिससे पृथ्वी के क्षोभ मंडल में बढ़ोतरी होती है। इसी कारण महानगरों का वायुमंडल बहुत खराब हो गया है जहरीला हो गया है जिसमें सांस लेना मुश्किल है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *