दलित, पिछड़ा अपना अधिकार न मांगें तो हम सब हिंदू
लखनऊ। दलित, ओबीसी, माइनारिटीज, आदिवासी परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद डॉ. उदितराज ने कहा कि अगर जातिवाद का असली चेहरा देखना हो तो कहीं भी हिस्सेदारी की मांग करके देख लीजिए ‘हम सब हिंदू हैं’ का नारा तुरंत फीका पड़ जाएगा। उन्होंने कहा कि बार काउंसिल ऑफ दिल्ली का चुनाव हो रहा है, जिसमें 25 सदस्य चुने जाने हैं। हर पांच साल में चुनाव होता है, लेकिन आज तक एक भी दलित या आदिवासी सदस्य चुनकर नहीं आया जबकि लगभग 20 फ़ीसदी वकील इन्हीं समुदायों से हैं। जैसे ही उनके प्रतिनिधित्व की बात उठती है, तुरंत आरोप लग जाता है कि यहाँ भी जातिवाद लाया जा रहा है।

20 फीसदी वकील दलित व पिछड़ा वर्ग के लेकिन एक भी चुनकर नहीं आता बीसीडी में
डॉ. उदितराज ने कहा कि मैंने अपने अधिवक्ता साथियों से पूछा कि ऐसा क्यों होता है? वकीलों का कहना था कि भले ही सभी काले कोट में एक जैसे दिखते हों और साथ बैठते हों, लेकिन वोट देने के समय लगभग शत-प्रतिशत वकील जाति के आधार पर मतदान करते हैं, कुछ अपवादों को छोडक़र। बनिया अपने समाज के उम्मीदवार को, ब्राह्मण अपने समाज के उम्मीदवार को, और ठाकुर अपने समाज के उम्मीदवार को प्राथमिकता देता है। उन्होंने कहा कि यह बात तब और स्पष्ट हुई जब डोमा के साथी एडवोकेट शाहिद अली ने बीसीडी चुनाव में समर्थन की बात उठाई। दलित उम्मीदवारों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही रहती है। एक मतदाता 25 उम्मीदवारों को वोट दे सकता है, लेकिन बताया गया कि बनिया, ब्राह्मण और ठाकुर मतदाता सीमित उम्मीदवारों को ही वोट देते हैं, ताकि उनका वोट ‘दूसरे वर्ग’ के उम्मीदवार को न चला जाए।
डोमा के अध्यक्ष ने कहा कि यदि दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक भी उसी तरह संगठित होकर वोट करें, तो आधे सदस्य उनके समुदाय से जीत सकते हैं। लेकिन वे अक्सर जाति से अधिक व्यक्तिगत संबंधों और प्रचार से प्रभावित होकर ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर उम्मीदवारों को वोट दे देते हैं। स्थिति कुछ ऐसी हो जाती है जैसे ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ और यही हाल यूजीसी गाइडलाइन के मामले में भी दिखाई देता है।