देवी सरस्वती कला व संगीत की भी अधिष्ठाती हैं

शिवचरण चौहान
सरस्वती, विद्या की देवी हैं। विद्या के साथ-साथ वह कला व संगीत की भी अधिष्ठाती हैं। प्राचीन काल से ही विद्याध्ययन की शुरूआत माँ सरस्वती के पूजन व वन्दना से की जाती है। किसी भी शुभ अवसर पर कार्य का प्रारम्भ बुद्धि के देव गणेश तथा विद्या की देवी सरस्वती के स्मरण से किया जाता है। सरस्वती, सृष्टि के निर्माता परमपिता ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं। सरस्वती का वाहन हंस है। जो विद्या के मोती चुगता है। हमारे वेदों व पुराणों मे विद्या की देवी सरस्वती का विस्तृत उल्लेख मिलता है। वेदों में सरस्वती को संस्कृत भाषा की जननी कहा गया है। इसी कारण उनका एक नाम वाग्देवी भी कहा जाता है।

सरस्वती का नदी के रूप में भी बहना माना गया है। वैज्ञानिक भी अब मान गए हैं कि एक नदी विलुप्त हो गयी है। वह सरस्वती ही थी। वेदों की ऋचाएं सरस्वती नदी के तट पर ही रची गयीं थीं। सरस्वती, यमुना व गंगा का प्रयाग (इलाहाबाद) में संगम होता है । इसे त्रिवेणी कहा गया है और यहाँ पर प्रत्येक 12 वर्ष में कुम्भ का मेला लगता है। बसंत पंचमी के दिन, जब पेड़ों में नव कोपलें, पौधों में कलियां , फूल तथा आमों में बौर आने लगते हैं, सरस्वती की बौर-फुलों व पत्तों से पूजा की जाती है । महाकवि निराला जी का जन्म भी बसंत पंचमी के दिन हुआ माना जाता है।
संस्कृत में श्लोक है- शुकलाम् ब्रहमविचारणीम् , वीणा-पुस्तक धारिणीम् ।….
पूर्व रूप से, श्वेत वस्त्रों से सुसज्जित सरस्वती कमल के फूल पर विराजमान हैं। श्वेत हंस. उनका वाहन है। वीणा और पुस्तक उनके हाथों में सुशोभित हैं। सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में हार, उपग्रीव , बाहों में बाहुबन्ध, हाथों में कंगन उंगलियों मे अंगूठियां, कमर में कटिसूत्र,पैरों में नुपूर धारण किए हुए सरस्वती सर्वत्र ज्ञान का प्रसार करती हैं। हिन्दू धर्म के अलावा जैनों के श्वेताम्बर व दिगम्बर पंथी भी सरस्वती के पूजक हैं। जैनियों में यक्षी, अम्बिका और चक्रेश्वरी की ही तरह सरस्वती भी पूज्य देवी हैं । सरस्वती की प्राचीनतम मूर्ति मथुरा में मिली है, जो कुषाण काल की है ।
बीकानेर में विलुप्त सरस्वती के तट पर जैनियों के एक मंदिर में भी सरस्वती की अति प्राचीन मूर्ति मिली है, जो चौहान शासकों के समय की निर्मित है । यह ग्यारहवीं शताब्दी की है। पृथ्वीराज चौहान व उनके मित्र कवि चन्द वरदाई सरस्वती के उपासक थे । महाकवि कालिदास तथा भूषण महामूख थे। पं. बोपदेव भी महामूर्ख थे किन्तु सरस्वती की आराधना से महाकवि, विद्वान बनकर प्रसिद्ध हुए। सरस्वती के अन्य नाम- शारदा, हंसवाहिनी, वीणावादिन आदि भी हैं । भक्त, पूजन,मन्त्रों, गीतों श्लोकों से सरस्वती को प्रसन्न करते हैं। बौर, आम पत्तों, पीले फूलों पीले चावल अक्षत से सरस्वती की बसंत पंचमी के दिन पूजा की जाती है और उत्सव मनाया जाता है। संस्कृत में सरस्वती का मंत्र पाठ किया जाता है। सरस्वती का मंत्र नित्य प्रति पाठ करने से विद्या पड़ती है बुद्धि तेज होती है और मनुष्य कला में पारंगत हो जाता है ऐसा माना जाता है।