राजनीति व्यवसाय बन जाए तब उससे लोकतंत्र की अपेक्षा करना बेमानी

शिव चरण चौहान
वंश वाद, परिवारवाद राजनीति का पर्याय बन गया है। सभी पार्टियों में वंशवाद है। हर नेता सांसद ,विधायक, मंत्री यही चाहता है कि उसका बेटा, बेटी, भतीजा अथवा रिश्तेदार ही सांसद, विधायक मंत्री बने और ग्राम प्रधान तक में उसी का कब्जा हो। नेहरू का परिवार इंदिरा गांधी का परिवार, मुलायम सिंह का परिवार, देवी लाल का परिवार रामा राव का परिवार केसी पंत का परिवार अब तक सत्ता में -हम हमार हम्मन, बाप , पूत, झम्मन। -की कहावत को चरितार्थ कर र हे हैं। अपने परिवार के अलावा किसी और को राजनीत में नहीं घुसने देना चाहता। जब राजनीतिक व्यवसाय बन जाए तब उससे लोकतंत्र की अपेक्षा करना बेमानी हो जाता है और आज वही हो गया है ।
राजनीति व्यापार बन गई है। राजनीति कुछ घरानों तक सीमित रह गई है। क्या आज कांग्रेस में कोई ऐसा नेता नहीं है जो गांधी परिवार के अलावा कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सके अथवा देश का प्रधानमंत्री बन सके। क्या सारे नेता इंदिरा गांधी के परिवार में ही पैदा होते हैं। क्या अखिलेश यादव के अलावा समाजवादी पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जो उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन सके। क्या बहुजन समाज पार्टी में मायावती के अलावा कोई नेता ही नहीं है जो मुख्यमंत्री बनने की हैसियत रखता हो। ये ऐसे सवाल हैं जिन्हें जनता देख रही है समझ रही है और मन मार कर स्वीकार कर रही है। क्योंकि इन लोगों ने ऐसा षड्यंत्र बना रखा है कि दूसरा इन्हे चुनौती ही नहीं दे सकता।
अब हमारा गणतंत्र जनता के काम का नहीं रहा
अब यह सवाल उठने लगा है कि अब हमारा गणतंत्र जनता के काम का नहीं रहा। संसदीय प्रणाली लगभग असफल हो गई है। सांसद, विधायक मंत्री मेयर ,जिला परिषद अध्यक्ष ब्लाक प्रमुख अब जनता के काम के लिए नहीं अपना घर भरने के लिए लूट मचाने के लिए राजनीति में आते हैं। सांसद निधि ,विधायक निधि कमीशन खोरी का जरिया बन गई है। इस पर गहन विचार किया जाना चाहिए। तहसील के लेखपाल से लेकर सारे विभागों के उच्च पदों तक अधिकांश लोग भ्रष्टाचार में डूबे हैं। इनकी संपत्तियों की जांच सही ढंग से की जाए तो अधिकांश राजनेता, नौकरशाह, राज्य कर्मचारी, पुलिस के कर्मचारी अधिकारी भ्रष्ट, महा भ्रष्ट निकलेंगे।
पूरी जिंदगी में जितना वेतन नहीं पाते अफसरों के पास एक साल में इतनी दौलत आ जाती है। बंगले, कोठियां , कारें और रहन-सहन, नौकर शाहों और जन सेवकों का ऐसा है कि बड़े-बड़े राजा महाराजा और बादशाह भी शरमा जाएं। आज भ्रष्टाचार, शिष्टाचार बन गया है लोकतंत्र लूटतंत्र बन गया है। गणतंत्र, गनतंत्र बन गया है। लोकतंत्र के चारों पायों में घुन लग गया है। अब कौन इसे सही करेगा दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई देता है। गणतंत्र दिवस मनाना बेईमानी लगने लगा है। यह कैसा मजाक है कि गणतंत्र में जनतंत्र में जनता की ही नहीं सुनी जाती। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाल किले से यह घोषणा जनता को आश्वस्त करती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक प्रहार किया जाएगा।
राजनीतिक दलों की आस्था जनतंत्र में नहीं
यह कैसा मजाक है कि पूरी दुनिया सहित भारत कोरोना जैसी महामारी और रोज रोज आ रहे वेरिएंट से प्रभावित हो रहा है। लोग बेमौत मर रहे हैं और हमारे नेता चुनाव करा रहे हैं। लाशों के ढेर पर अपना सिंहासन स्थापित करना चाहते हैं। रैलियों में भीड़ लाने के नाम पर लोग खरीदे जा रहे हैं। पैसा लेकर लोग सभी दलों की रैलियों में जिंदाबाद करने के लिए जाते हैं। इन सब बातों से यही पता चलता है कि राजनीतिक दलों की आस्था जनतंत्र में नहीं है? जनता के दु:ख-दर्दो से उनका कितना सरोकार है?
दिखावे की हमदर्दी और किसी भी प्रकार से वोट पटा लेने की बाजीगरी में लगे ये लोग निश्चय ही प्रजा तांत्रिक व्यवस्था तथा संसदात्मक प्रणाली को स्वयं प्रश्न चिह्नों में ला रहे हैं? ऐसे ही कारणों से लोगों में यह चर्चा रहती है कि भारतीय व्यवस्था में यह संसदीय व्यवस्था ‘मिसफिट’ है। आज एक ओर पंजीवादी राष्ट्रों का शिकंजा कसता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विश्व बैंक समेत अन्य आर्थिक संस्थानों का, नई उदार आर्थिक नीति की पैरोकारी करते वक्त संप्रभु राष्ट्र के मंत्रीगण इस बात का ध्यान भी नहीं रखते कि ऋण या सहायता के रूप में धन प्राप्त करके वे किन-किन शर्तों पर हस्ताक्षर बना रहे हैं। बर्बाद हुए श्रीलंका का हाल सबके सामने है।
आदम पशु सभ्यता की ओर.बढऩे की प्रवृत्ति वोट की भारतीय राजनीति की देन
यह सब भी तब जब पूरे देश में राजनीतिक दलों में शक्ति प्रदर्शन की होड़, तेजी से बढ़ रही है तथा हर स्थान पर रैली या रैले हो रहे हैं और ऋण से प्राप्त धन का खुलेआम दुरुपयोग सरकार के ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी व मंत्रीगण कर रहे हैं। अब राजनीति गुटों, समूहों, कबीलों, जातियों व धर्मों की बैसाखी की ओर बढ़ चुकी है। जिस दृष्टिकोण को छोडक़र मानव सभ्यता आगे बढ़ी थी, और भारतीय मनीषा ने ‘वसुधैव कुटंबकम्’ के गीत गाए थे, वह पुन: संकीर्णता की ओर वापस लौट रही है।.जाहिर है कि आदम पशु सभ्यता की ओर.बढऩे की प्रवृत्ति वोट की भारतीय राजनीति की देन है जहां जाति, धर्म, वर्ग, गुट, समूह के आधार पर उम्मीदवार तलाशा जाता है और वही है और फिर जातिगत समीकरणों को आगे रखकर अगली चुनाव की वैतरणी पार करना चाहता है।
स्पष्ट है कि लगातार चुनावों के कारण होने वाले अप्रत्याशित व्यय के कारण भी ये दल ही हैं। दल बदल विरोधी विधेयक बनने के बावजूद उसका कोई कारगर लाभ नहीं मिल रहा है। दरअसल अब जनता एक हद तक इस प्रतिनिधित्व व चुनावी नाटक से ऊब चुकी है यही कारण है कि चुनाव पडऩे वाले वास्तविक वैध मतों की संख्या निरंतर घटती जा रही है। इस सब के बावजूद कोई राजनीतिक दल किसी गलती का दारोमदार अपने ऊपर लेने को तैयार नहीं है। सब एक दूसरे पर राष्ट्रद्रोही, घोर सांप्रदायिक होने के आरोप उछालते रहते हैं।
जनता को ही आगे आकर अपनी बात समझानी होगी
सांप्रदायिक तथा जातीय दंगों की जब भी पोल खुलती है तो अधिकांश की जड़ें राजनीतिक लोग के ऐशगाह की तरफ ही जाती हैं तो ऐसी स्थिति में कोई इन दलों, प्रतिनिधियों व विधायी संस्थानों पर विश्वास कैसे करे? यह भी अवश्य है कि भारतीय नौकरशाही में अनेक बार निर्णय संपन्न प्रखर प्रशासक दिखाई दिए हैं। वर्तमान शासन प्रणाली से ऊब चुके जनमानस को यदि बदलाव की सांस लेनी ही है तो इस प्रदूषित वर्तमान व्यवस्था के कर्णधारों को उचित माध्यमों से अपनी आवाज पहुंचानी ही चाहिए। वास्तव में भारतीय जनमत अब इतना सुशुप्त रहा भी नहीं है कि उस पर जो जो थोपा जाएगा, सब मंजूर कर लेगा। चूंकि जनप्रतिनिधि तो अब जनमत का सम्मान करते नहीं, अत: जनता को ही आगे आकर अपनी बात समझानी होगी। इसी से कोई नई राह भी दिखाई देगी।
अदम गोंडवी कहते हैं
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है।
दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है।।
रघुवीर सहाय भी यही कहते हैं
जन गण मन में भला कौन
वह भारत भाग्य विधाता है?
फटा सुथन्ना पहने जिसके
हरचरना गुन गाता है
अंग्रेजों के समय भी भारत में भ्रष्टाचार था किंतु आजादी के 75 साल बाद भी भ्रष्टाचार घटा नहीं और बढ़ा है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भ्रष्टाचार पर प्रहार की बात से लोगों में उत्सुकता जगी है। भारत का आम आदमी भ्रष्टाचार मुक्त भारत देखना चाहता है।