वाराणसी में जन्मी थीं मनु बाई
शिवचरण चौहान

काशी में आज पेशवा महल ध्वस्त पड़ा है। वाराणसी के गंगा घाटों की सुंदरता के क्रम में वाराणसी के सांसद और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घाटों के सुंदरीकरण का कुछ काम कराया तो है पर जहां पर मणिकर्णिका यानी मनु बाई का जन्म हुआ था वह अब भी उपेक्षित पड़ा है। आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है किंतु 18 57 की वीरांगना लक्ष्मी बाई काशी में ही अंजान हैं। वाराणसी में गंगा के अस्सी घाट पर उपेक्षित पड़े पेशवा महल की दीवारों पर संगमरमर का एक शिलापट्ट लगा हुआ है, जिस पर लिखा है- ‘काशी की कन्या, झांसी की रानी!’ यही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली है जो उपेक्षित है। अस्सी घाट के तुलसीदास मठ से थोड़ी दूर स्थित झांसी की रानी का यह जन्म स्थान वर्षों तक मुर्गीखाना और दशकों तक साधुओं का तबेला बना रहा और अब घाटों के सुंदरीकरण के बाद भी उपेक्षित पड़ा हुआ है।
महाराष्ट्र के देशभक्त पेशवाओं ने बनारस को भी अपनी कर्मस्थली बनाया था।
पेशवा बहादुर चिम्मा जी अप्पा जब बनारस आए तो साथ में उनके सलाहकार मोरोपन्त ताम्बे भी आए थे। बनारस गजेटियर के अनुसार पेशवा बहादुर चिम्मा जी अपने सलाहकार मोरोपन्त ताम्बे और अन्य कर्मचारियों सहयोगियों के साथ अस्सी घाट के तीन मकानों में रहे थे, जिसे उस जमाने में गणेश बाड़ा पेशवा महल के रूप में जाना जाता था। पेशवा महल में रह रहे मोरोपन्त और उनकी पत्नी भागीरथी बाई के घर 19 नवंबर 18 28 को एक बालिका ने जन्म लिया जिसका नाम मणिकर्णिका रखा गया जो बाद में, ‘मनु’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

यही मनु बाद में झांसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई बनी। उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार के दस्तावेजों से भी इस सत्य की पुष्टि होती है कि मोरोपन्त ताम्बे अस्सी घाट स्थित पेशवा महल में पेशवा बहादुर चिम्मा जी के साथ में रहा करते थे। राजकीय अभिलेखागार के तत्कालीन निदेशक काशी प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा 25 अक्टूबर 1976 में लिखे गये एक पत्र में कहा गया था कि पेशवा बहादुर चिम्मा जी की मृत्यु के बाद उनकी बेटी द्वारिका बाई ने रेजीडेंट आफ बनारस को एक अर्जी भेजकर पेशवा महल की हिफाजत के लिए धन देने का निवेदन किया था।
फारसी भाषा में लिखी इस अर्जी में द्वारिका बाई ने कहा था कि चिम्मा जी अप्पा के जो तीन मकान अस्सी मुहाल बनारस में मौजूद हैं, उन पर कुछ लोग अनधिकार अतिक्रमण कर कब्जा करने की फिराक में हैं। लिहाजा रेजीडेंट की ओर से उनकी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाए। 25 अगस्त सन् 1841 में लिखे गये इस पत्र में यह उल्लेख भी है कि ये मकान स्वर्गीय चिम्मा जी अप्पा ने बनवाये थे और इनमें से एक में वे खुद रहते थे। द्वारिका बाई के पत्र के अनुसार उन्हीं मकानों में से एक में मोरोपन्त ताम्बे जी भी रहते थे जो अप्पा के साथ ही आये थे। फारसी भाषा में द्वारिका बाई द्वारा प्रेषित इस अर्जी पर सखाराम कानेरेका (मुख्तार, द्वारिका बाई) ने मराठी में अपने हस्ताक्षर किए हैं ।
1842 को मनु बाई की शादी झांसी के महाराज गंगाधर राव नेवलकर से हो गई थी और वह मनु महारानी लक्ष्मीबाई बन गई
लक्ष्मीबाई के झांसी की रानी बन जाने के बाद काशी के पेशवा अपनी इमारतों के रखरखाव की जिम्मेदारी अपने कारिन्दों को सौंपकर बिठूर चले गये। बाद में 18 57 के स्वतंत्रता संग्राम में दुष्ट अंग्रेजों से लड़ते हुए 18 जून 18 58 को महारानी लक्ष्मीबाई शहीद हो गईं। इसके पहले मार्च 18 58 में अंग्रेजों से लड़ते हुए अवंती बाई लोधी भी शहीद हो गई थीं। लक्ष्मी बाई के बलिदान के बाद बनारस में पेशवाओं की सारी सम्पत्ति पर तत्कालीन काशी राज ने अपना कब्जा जमा लिया। काशी के राज परिवार के कब्जे में जाने के बाद झांसी की रानी की यह जन्मस्थली कालान्तर में गोस्वामी तुलसीदास अखाड़े के महंत स्वामीनाथ को सौंप दी गयी।
अखाड़े वालों ने इसे पंचायती अखाड़ा के साधुओं के निवास स्थल के रूप में तब्दील कर दिया। सरकारी दस्तावेजों में यह जमीन अभी भी तुलसी अखाड़े की सम्पत्ति के रूप में दर्ज है। काशी के कुछ जागरूक लोगों ने अपने प्रयासों से संगमरमर का एक शिलापट्ट जरूर लगवा दिया था , जिस पर झांसी की रानी के जन्म-मृत्यु के विवरण के साथ खुदा हुआ था- ‘काशी की कन्या ,झांसी की रानी।’ झांसी की रानी के इस जन्मस्थल पर चार वर्षों तक मुर्गीखाना बना रहा और दशकों तक साधुओं का अखाड़ा । निरंतर उपेक्षा का शिकार महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म स्थल एक वीरांगना की जन्मभूमि है। उनका नाम मणिकर्णिका रखा गया था । घरवाले उसे मनु कह कर बुलाते थे। आज काशी/ वाराणसी विश्व पर्यटन का एक बड़ा स्थल बन रहा है तो ऐसे में महारानी लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली को भी संरक्षित किया जाना चाहिए। केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों मिलकर या काम बखूबी कर सकते हैं।