कब होगा भ्रष्टाचार पर प्रहार

शिवचरण चौहान
एक बार लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने भ्रष्टाचार उन्मूलन की घोषणा की थी । भ्रष्टाचार और परिवारवाद दोनों को देश के लिए कलंक बताया था । भ्रष्टाचार पर प्रहार किया जाएगा ताकि भ्रष्टाचार से समाज को मुक्त किया जा सके। क्या भ्रष्टाचार पर प्रहार आज तक हो पाया? क्या भ्रष्टाचार समाप्त हो पाएगा? यह एक बड़ा प्रश्न है। यदि कोई संकल्प शक्ति से दृढ़ निश्चय से भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रहार करे तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है। इधर उत्तर प्रदेश सहित पूरे भारत में अधिकारियों कर्मचारियों और सरकारी कर्मचारियों द्वारा भ्रष्टाचार किए जाने के अनेक मामले रोज-रोज सामने आ रहे हैं भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति की हवा निकल गई है ऐसे में प्रश्न उठता है क्या आप कभी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं किया जा सकेगा क्या भ्रष्टाचार आज शिष्टाचार बन गया है।
कुछ देशों को छोड़कर आज पूरी दुनिया भ्रष्टाचार से परेशान है। भारत में आज भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है! भ्रष्टाचार आज पूरी दुनिया की समस्या है। भारत भ्रष्टाचार के पंजों में जकड़ा हुआ कराह रहा है। शायद भ्रष्टाचार को अब मिटाया जाना बहुत मुश्किल हो गया है। ग्राम प्रधान से लेकर दिल्ली तक भ्रष्टाचार की जड़ें फैली हुई हैं। भ्रष्टाचार, शिष्टाचार बन गया है। सरकार और नौकरशाही का भ्रष्टाचार मिटाने को लेकर अन्ना ने दिल्ली में आंदोलन चलाया था और इसी के फलस्वरूप मोदी सरकार आई थी। अब तक ना तो केंद्रीय स्तर पर लोकपाल की नियुक्ति हुई और ना राज्यों में लोकायुक्त की। काले धन को बड़ी समस्या मानने वाली भारतीय जनता पार्टी विदेशों से काला धन लाने की बात तो दूर यह तक नहीं बता पाई कि किन-किन नेताओं और नौकरशाहों का काला धन स्विस बैंकों में जमा है।
21 दिसंबर 1963 को संसद में भ्रष्टाचार और काले धन पर बहस हुई थी जिसमें बोलते हुए प्रमुख समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने भ्रष्टाचार को भारत का कलंक बताया था और कहा था यदि भ्रष्टाचार नहीं रोका गया तो भारत को खोखला कर देगा। पर आज उन्हीं के चलाए समाजवाद और समाजवादी नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। भ्रष्टाचार आदि काल से रहा है संस्कृत में भ्रष्टाचार के लिए उत्कोच शब्द आया है। तब भी अनेक राजपुरुष भ्रष्ट हुआ करते थे और आज तो 70 प्रतिशत से अधिक नौकरशाह और राजनेता भ्रष्ट पाए गए हैं। 2005 के एक सर्वे में 62 प्रतिशत लोगों को सरकारी दफ्तरों में काम कराने के लिए घूस देनी पड़ती थी। आज हालत सुधरे नहीं और अधिक बिगड़े हैं। लगता नहीं अब इसमें सुधार अा पाएगा जब राज सिंहासन में बैठे लोग आचरण से पतित हो जाएंगे तो फिर भ्रष्टाचार निवारण कौन करेगा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकेले कहां तक लड़ेंगे! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किस-किस से लड़ेंगे?
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 31 अक्टूबर 2003 को भ्रष्टाचार मिटाने के लिए 9 दिसंबर को भ्रष्टाचार निवारण दिवस मनाने की घोषणा की थी। 9 दिसंबर को भ्रष्टाचार निवारण दिवस मनाया भी जाता है। पर भ्रष्टाचार रोज-रोज बढ़ता चला जा रहा है।
भ्रष्टाचार ,आज सरकार, नौकरशाही न्यायपालिका, मीडिया, शिक्षा व्यवस्था समाज कल्याण , लोक निर्माण ,मठ मंदिरों सभी जगह व्याप्त हो गया है। लोकतंत्र की प्रथम इकाई गांव सभा से लेकर सिपाही, लेखपाल जैसे छोटे पद के लोग भी बिना घूस के काम नहीं करते। कलयुग देवता ने द्वापर में परीक्षित से अपने रहने के लिए थोड़ी सी जगह मांगी थी और आज भ्रष्टाचार पूरे समाज, विश्व में फैल गया है। अमीर और अमीर और गरीब अति गरीब होता चला जा रहा है। तमाम धार्मिक ग्रंथ, ऋषि मुनि संत, समाज सुधारक कवि साहित्यकार न जाने कब से भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए प्रयास करते रहे हैं पर अब लगता है सबके प्रयास असफल हुए।
कबीर का लिखा ही सही है
माया महा ठगिन हम जानी!
तिर्गुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरी बानी।।
मंदिर में मूरत बन बैठी ब्रह्मा के ब्रह्मानी।।
भ्रष्ट तंत्र के शिकंजे में बेहाल जन!
आज पूरा समाज भ्रष्ट तंत्र, लालफीताशाही के शिकंजे मे पड़ा कराह रहा है! लोग सोचने पर मजबूर हैं कि क्या यही लोकतंत्र है? जिसके लिए हमने अंग्रेजों से लड़कर आजादी प्राप्त की। क्या हम सचमुच आजाद हो पाए! क्या हम वास्तव में आजाद हो पाए,! यह सच है कि लोकतंत्र अथवा गणतंत्र के चलते ही एक गरीब अथवा एक दलित की बेटी मुख्यमंत्री बन सकती है। दलित का बेटा राष्ट्रपति बन सकता है। मुस्लिम सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है। यह हमारे गणतंत्र की ही ताकत थी कि ऐसा संभव हो सका। किंतु क्या इतना ही यह सच है। आज हर कोई राजनीति में आने की सोच रहा है। गांव से लेकर राजधानी तक नए नए नेताओं की भरमार है। यह नेता अपने को जनसेवक कहते हैं। किंतु यह लोग जन सेवा के लिए नहीं स्व सेवा के लिए राजनीति में आ रहे हैं। धन कमाना ही इनका लक्ष्य है।
आखिर थोड़े समय में भी एक नेता कैसे गरीब से अमीर बन जाता है। आम आदमी से महाराजा बन जाता है। साइकिल पर चलने वाला महंगी महंगी गाड़ियों और हवाई जहाज में चलने लगता है। उसका घर सोने चांदी और नोटों से भर जाता है। खातों में अनाप-शनाप पैसा आ जाता है। आज गणतंत्र के नाम पर गलत धंधा करने वाले गंदा धंधा करने वाले राजनीति में आकर अपना पैसा सफेद कर लेते हैं। सांसद, विधायक बनकर राजा महाराजाओं का सा जीवन जीने लगते हैं। उन्हें गरीब लोगों से घृणा हो जाती है। चुनाव के समय छल -कपट तीन तिकड़म और झूठ बोलकर चुनाव जीत जाते हैं और फिर जी भर कर भ्रष्टाचार करते हैं। शराब के अवैध ठेके, अवैध खनन, अपराध, घूसखोरी भ्रष्टाचार और वे सारे काम जो लोकतंत्र में वर्जित हैं वही कानून बनाने वाले हमारे जनसेवक करने लगते हैं। राजनैतिक दल उन्हीं लोगों को टिकट देते हैं जो चुनाव लड़ने की क्षमता रखते हों। जो पार्टी का भला कर सके और अपना भी भला कर सकें। हर राजनीतिक दल गुंडों को ,माफियाओं को ,अपराधियों को संरक्षण देता है। मेरा गुंडा दूध का धुला और दूसरी विपक्षी पार्टी का माफिया गंदा , यही परंपरा चल निकली है। आम जनता और मतदाता आंखें फाड़े देख रहा है। लोकतंत्र के नाम पर राजतंत्र काबिज हो गया है। आज गांधी के रामराज का सपना खो गया है।
वंश वाद, परिवारवाद राजनीति का पर्याय बन गया है। सभी पार्टियों में वंशवाद है। हर नेता सांसद ,विधायक, मंत्री यही चाहता है कि उसका बेटा, बेटी, भतीजा अथवा रिश्तेदार ही सांसद, विधायक मंत्री बने और ग्राम प्रधान तक में उसी का कब्जा हो। नेहरू का परिवार इंदिरा गांधी का परिवार, मुलायम सिंह का परिवार, देवी लाल का परिवार रामा राव का परिवार केसी पंत का परिवार अब तक सत्ता में -हम हमार हम्मन, बाप , पूत, झम्मन। -की कहावत को चरितार्थ कर र हे हैं। अपने परिवार के अलावा किसी और को राजनीत में नहीं घुसने देना चाहता।
जब राजनीतिक व्यवसाय बन जाए तब उससे लोकतंत्र की अपेक्षा करना बेमानी हो जाता है और आज वही हो गया है । राजनीति व्यापार बन गई है। राजनीति कुछ घरानों तक सीमित रह गई है। क्या आज कांग्रेस में कोई ऐसा नेता नहीं है जो गांधी परिवार के अलावा कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सके अथवा देश का प्रधानमंत्री बन सके। क्या सारे नेता इंदिरा गांधी के परिवार में ही पैदा होते हैं। क्या अखिलेश यादव के अलावा समाजवादी पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जो उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन सके। क्या बहुजन समाज पार्टी में मायावती के अलावा कोई नेता ही नहीं है जो मुख्यमंत्री बनने की हैसियत रखता हो। ये ऐसे सवाल हैं जिन्हें जनता देख रही है समझ रही है और मन मार कर स्वीकार कर रही है। क्योंकि इन लोगों ने ऐसा षड्यंत्र बना रखा है कि दूसरा इन्हे चुनौती ही नहीं दे सकता। अब यह सवाल उठने लगा है कि अब हमारा गणतंत्र जनता के काम का नहीं रहा। संसदीय प्रणाली लगभग असफल हो गई है। सांसद, विधायक मंत्री मेयर ,जिला परिषद अध्यक्ष ब्लाक प्रमुख अब जनता के काम के लिए नहीं अपना घर भरने के लिए लूट मचाने के लिए राजनीति में आते हैं। सांसद निधि ,विधायक निधि कमीशन खोरी का जरिया बन गई है। इस पर गहन विचार किया जाना चाहिए।
तहसील के लेखपाल से लेकर सारे विभागों के उच्च पदों तक अधिकांश लोग भ्रष्टाचार में डूबे हैं। इनकी संपत्तियों की जांच सही ढंग से की जाए तो अधिकांश राजनेता, नौकरशाह, राज्य कर्मचारी, पुलिस के कर्मचारी अधिकारी भ्रष्ट, महा भ्रष्ट निकलेंगे। पूरी जिंदगी में जितना वेतन नहीं पाते अफसरों के पास एक साल में इतनी दौलत आ जाती है। बंगले, कोठियां , कारें और रहन-सहन, नौकर शाहों और जन सेवकों का ऐसा है कि बड़े-बड़े राजा महाराजा और बादशाह भी शरमा जाएं। आज भ्रष्टाचार, शिष्टाचार बन गया है लोकतंत्र लूटतंत्र बन गया है। गणतंत्र, गनतंत्र बन गया है। लोकतंत्र के चारों पायों में घुन लग गया है। अब कौन इसे सही करेगा दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई देता है। गणतंत्र दिवस मनाना बेईमानी लगने लगा है। यह कैसा मजाक है कि गणतंत्र में जनतंत्र में जनता की ही नहीं सुनी जाती। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाल किले से यह घोषणा जनता को आश्वस्त करती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक प्रहार किया जाएगा।
यह कैसा मजाक है कि पूरी दुनिया सहित भारत कोरोना जैसी महामारी और रोज रोज आ रहे वेरिएंट से प्रभावित हो रहा है। लोग बेमौत मर रहे हैं और हमारे नेता चुनाव करा रहे हैं। लाशों के ढेर पर अपना सिंहासन स्थापित करना चाहते हैं। रैलियों में भीड़ लाने के नाम पर लोग खरीदे जा रहे हैं। पैसा लेकर लोग सभी दलों की रैलियों में जिंदाबाद करने के लिए जाते हैं। इन सब बातों से यही पता चलता है कि राजनीतिक दलों की आस्था जनतंत्र में नहीं है? जनता के दुःख-दर्दो से उनका कितना सरोकार है? दिखावे की हमदर्दी और किसी भी प्रकार से वोट पटा लेने की बाजीगरी में लगे ये लोग निश्चय ही प्रजा तांत्रिक व्यवस्था तथा संसदात्मक प्रणाली को स्वयं प्रश्न चिह्नों में ला रहे हैं? ऐसे ही कारणों से लोगों में यह चर्चा रहती है कि भारतीय व्यवस्था में यह संसदीय व्यवस्था ‘मिसफिट’ है। आज एक ओर पंजीवादी राष्ट्रों का शिकंजा कसता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विश्व बैंक समेत अन्य आर्थिक संस्थानों का, नई उदार आर्थिक नीति की पैरोकारी करते वक्त संप्रभु राष्ट्र के मंत्रीगण इस बात का ध्यान भी नहीं रखते कि ऋण या सहायता के रूप में धन प्राप्त करके वे किन-किन शर्तों पर हस्ताक्षर बना रहे हैं। बर्बाद हुए श्रीलंका का हाल सबके सामने है।
यह सब भी तब जब पूरे देश में राजनीतिक दलों में शक्ति प्रदर्शन की होड़, तेजी से बढ़ रही है तथा हर स्थान पर रैली या रैले हो रहे हैं और ऋण से प्राप्त धन का खुलेआम दुरुपयोग सरकार के ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी व मंत्रीगण कर रहे हैं। अब राजनीति गुटों, समूहों, कबीलों, जातियों व धर्मों की बैसाखी की ओर बढ़ चुकी है। जिस दृष्टिकोण को छोड़कर मानव
सभ्यता आगे बढ़ी थी, और भारतीय मनीषा ने ‘वसुधैव कुटंबकम्’ के गीत गाए थे, वह पुनः संकीर्णता की ओर वापस लौट रही है।.जाहिर है कि आदम पशु सभ्यता की ओर.बढ़ने की प्रवृत्ति वोट की भारतीय राजनीति की देन है जहां जाति, धर्म, वर्ग, गुट, समूह के आधार पर उम्मीदवार तलाशा जाता है और वही है और फिर जातिगत समीकरणों को आगे रखकर अगली चुनाव की वैतरणी पार करना चाहता है।स्पष्ट है कि लगातार चुनावों के कारण होने वाले अप्रत्याशित व्यय के कारण भी ये दल ही हैं। दल बदल विरोधी विधेयक बनने के बावजूद उसका कोई कारगर लाभ नहीं मिल रहा है। दरअसल अब जनता एक हद तक इस प्रतिनिधित्व व चुनावी नाटक से ऊब चुकी है यही कारण है कि चुनाव पड़ने वाले वास्तविक वैध मतों की संख्या निरंतर घटती जा रही है। इस सब के बावजूद कोई राजनीतिक दल किसी गलती का दारोमदार अपने ऊपर लेने को तैयार नहीं है। सब एक दूसरे पर राष्ट्रद्रोही, घोर सांप्रदायिक होने के आरोप उछालते रहते हैं। सांप्रदायिक तथा जातीय दंगों की जब भी पोल खुलती है तो अधिकांश की जड़ें राजनीतिक लोग के ऐशगाह की तरफ ही जाती हैं तो ऐसी स्थिति में कोई इन दलों, प्रतिनिधियों व विधायी संस्थानों पर विश्वास कैसे करे? यह भी अवश्य है कि भारतीय नौकरशाही में अनेक बार निर्णय संपन्न प्रखर प्रशासक दिखाई दिए हैं। वर्तमान शासन प्रणाली से ऊब चुके जनमानस को यदि बदलाव की सांस लेनी ही है तो इस प्रदूषित वर्तमान व्यवस्था के कर्णधारों को उचित माध्यमों से अपनी आवाज पहुंचानी ही चाहिए। वास्तव में भारतीय जनमत अब इतना सुशुप्त रहा भी नहीं है कि उस पर जो जो थोपा जाएगा, सब मंजूर कर लेगा। चूंकि जनप्रतिनिधि तो अब जनमत का सम्मान करते नहीं, अतः जनता को ही आगे आकर अपनी बात समझानी होगी। इसी से कोई नई राह भी दिखाई देगी।
अदम गोंडवी कहते हैं
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है।
दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है।।
रघुवीर सहाय भी यही कहते हैं
जन गण मन में भला कौन
वह भारत भाग्य विधाता है?
फटा सुथन्ना पहने जिसके
हरचरना गुन गाता
अंग्रेजों के समय भी भारत में भ्रष्टाचार था किंतु आजादी के 75 साल बाद भी भ्रष्टाचार घटा नहीं और बढ़ा है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भ्रष्टाचार पर प्रहार की बात से लोगों में उत्सुकता जगी है। भारत का आम आदमी भ्रष्टाचार मुक्त भारत देखना चाहता है।