भारत में महिलाओं का स्वास्थ्य : एक मौन संघर्ष

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महिलाएँ जीवन को जन्म देती हैं, पीढ़ियों का पालन-पोषण करती हैं

डॉ. इस्मत जहाँ रिजवी (स्वास्थ्य विशेषज्ञ)

भारत में महिलाएँ परिवार, समाज और राष्ट्र की नींव हैं। वे जीवन को जन्म देती हैं, पीढ़ियों का पालन-पोषण करती हैं और सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को सुदृढ़ बनाती हैं। इसके बावजूद, महिलाओं का स्वास्थ्य दशकों से सामाजिक वर्जनाओं, आर्थिक सीमाओं और प्रणालीगत उपेक्षा के कारण हाशिये पर रहा है। देश की लगभग आधी आबादी महिलाएँ हैं, लेकिन स्वास्थ्य के अधिकांश मानकों पर उनकी स्थिति पुरुषों की तुलना में कमजोर बनी हुई है। कुपोषण, एनीमिया, प्रजनन संबंधी रोगों और बढ़ती गैर-संचारी बीमारियों से जूझती भारतीय महिलाएँ एक ऐसी चुनौती का सामना कर रही हैं, जिसे अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।

आंकड़े इस स्थिति की गंभीरता को उजागर करते हैं। भारत में प्रजनन आयु की आधे से अधिक महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित हैं। यह केवल थकान या कमजोरी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गर्भावस्था में जटिलताओं, कम वजन वाले शिशुओं के जन्म और कार्यक्षमता में कमी का कारण बनता है। यह स्वास्थ्य संकट किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण और शहरी, दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं को प्रभावित करता है। दुर्भाग्यवश, इन समस्याओं को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है और समय रहते इलाज नहीं कराया जाता।

 

महिलाओं द्वारा अपने रोग छिपाने के पीछे गहरे सामाजिक कारण

महिलाओं द्वारा अपने रोग छिपाने के पीछे गहरे सामाजिक कारण हैं। भारतीय समाज में महिलाओं को परिवार को स्वयं से ऊपर रखने की शिक्षा दी जाती है। वे अपने बच्चों, पति और बुज़ुर्गों की जरूरतों को प्राथमिकता देती हैं, जबकि अपने दर्द, थकान और मानसिक तनाव को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। मासिक धर्म से जुड़ी समस्याएँ, लगातार दर्द, अवसाद या कमजोरी को “महिलाओं की सामान्य स्थिति” मान लिया जाता है। आर्थिक निर्भरता भी एक बड़ा कारण है—कई महिलाएँ अपने इलाज पर खर्च को अनावश्यक समझती हैं या परिवार पर बोझ नहीं डालना चाहतीं। इसके साथ ही, स्वास्थ्य संबंधी निर्णयों में स्वतंत्रता की कमी भी महिलाओं को समय पर डॉक्टर तक पहुँचने से रोकती है।

बीमारियों को छिपाने और इलाज में देरी के परिणाम गंभीर होते हैं। स्तन और गर्भाशय ग्रीवा जैसे कैंसर, जिनका शुरुआती चरण में इलाज संभव है, अक्सर देर से सामने आते हैं। गर्भावस्था के दौरान अनदेखी गई समस्याएँ मातृ मृत्यु और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। एनीमिया, मधुमेह, थायरॉयड और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ यदि लंबे समय तक बिना इलाज के रहें, तो वे महिला के पूरे जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर देती हैं और उसकी सामाजिक व आर्थिक भागीदारी को सीमित कर देती हैं।

अभियान का उद्देश्य महिलाओं को समय रहते बीमारी की पहचान और परामर्श उपलब्ध कराना

इन चुनौतियों को समझते हुए भारत सरकार ने महिलाओं के स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर कई योजनाएँ शुरू की हैं। हाल के वर्षों में शुरू किया गया स्वस्थ नारी सशक्त परिवार अभियान महिलाओं और किशोरियों के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य जांच को बढ़ावा देता है। इसके अंतर्गत एनीमिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा स्तन और सर्वाइकल कैंसर जैसी बीमारियों की जांच की जाती है। इस अभियान का उद्देश्य महिलाओं को समय रहते बीमारी की पहचान और परामर्श उपलब्ध कराना है, ताकि गंभीर स्थितियों से बचा जा सके।

मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत संचालित जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम का विशेष महत्व है। इन योजनाओं के माध्यम से सुरक्षित प्रसव को प्रोत्साहित किया जाता है और गर्भवती महिलाओं तथा नवजात शिशुओं को निःशुल्क दवाइयाँ, जांच और परिवहन सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान हर महीने निर्धारित दिन पर गर्भवती महिलाओं को मुफ्त और व्यापक प्रसवपूर्व जांच सुनिश्चित करता है, जिससे जोखिमों की पहचान समय पर हो सके।

महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान आर्थिक सहायता देने के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना लागू की गई है। इस योजना के तहत गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को प्रत्यक्ष नकद लाभ प्रदान किया जाता है, जिससे वे पोषण और देखभाल पर ध्यान दे सकें। वहीं, आयुष्मान भारत – हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को महिलाओं के लिए अधिक सुलभ बनाते हैं, जहाँ निःशुल्क परामर्श, दवाइयाँ और जांच सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

घरेलू स्तर पर महिलाओं की चुनौतियाँ बनी हुई हैं

इन प्रयासों के बावजूद, घरेलू स्तर पर महिलाओं की चुनौतियाँ बनी हुई हैं। घर और बाहर के काम का दोहरा बोझ, भावनात्मक जिम्मेदारियाँ, नींद की कमी और स्वयं के लिए समय का अभाव महिलाओं के स्वास्थ्य को धीरे-धीरे कमजोर करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों की दूरी और परिवहन की कमी समस्या को और गंभीर बना देती है। शहरी जीवन में भी कार्य-परिवार संतुलन के दबाव के कारण महिलाएँ नियमित जांच को टालती रहती हैं।

पोषण की उपेक्षा इस समस्या का एक और अहम पहलू है। भारतीय घरों में महिलाएँ अक्सर सबसे अंत में और सबसे कम भोजन करती हैं। जबकि जैविक रूप से महिलाओं को गर्भधारण, प्रसव और स्तनपान जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जिसके लिए पर्याप्त पोषण अनिवार्य है। उचित आहार न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य को मजबूत करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी स्वस्थ बनाता है।

बीमार महिला अस्वस्थ समाज को जन्म देती है

यदि महिलाओं के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा। एक बीमार महिला कमजोर परिवार और अस्वस्थ समाज को जन्म देती है। महिलाओं के बिना कोई राष्ट्र पूर्ण नहीं हो सकता, और उनके स्वास्थ्य के बिना कोई विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। अब समय आ गया है कि महिलाओं के स्वास्थ्य को संकट के समय की बजाय रोकथाम के दृष्टिकोण से देखा जाए। स्वास्थ्य जागरूकता, सुलभ जांच, सामाजिक समर्थन और महिलाओं को निर्णय लेने की स्वतंत्रता—ये सभी मिलकर एक स्वस्थ राष्ट्र की नींव रख सकते हैं। क्योंकि जब महिला स्वस्थ होती है, तब परिवार सशक्त होता है और राष्ट्र मजबूत बनता है।

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