इरशाद राही की ग़ज़ल हम साथ हैं

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माँ की ममता धर्म नहीं पूछती

इरशाद राही

हम अलग नामों से
एक ही मिट्टी में पले हैं
किसी के माथे पर तिलक
किसी के लबों पर दुआ है
पर जब प्यास लगती है
तो पानी सबके लिए एक जैसा है
दीप भी उजाला देता है
और अज़ान भी
अँधेरा दोनों से डरता है
माँ की ममता
धर्म नहीं पूछती
बच्चा रोए तो गोद
हर मज़हब की एक जैसी होती है
हिंदू-मुसलमान का दुश्मन नहीं
मुसलमान-हिंदू से अलग नहीं
हमारी भाषा में एक-दूसरे की रूह घुली है
जो नफऱत बोते हैं वे हममें से नहीं
वे शोर में जीते हैं हम रिश्तों में
असल भारत टीवी में नहीं
गली में है जहाँ नमस्ते और सलाम
एक ही साँस में निकलते हैं
जब हिंदू दुखी होता है
मुसलमान का दिल
भारी हो जाता है
जब मुसलमान गिरता है
हिंदू का कंधा आगे बढ़ता है
हम लडऩे के लिए नहीं
जुडऩे के लिए बने हैं
यह देश एक मज़हब से नहीं
एक-दूसरे से बना है
आओ एक-दूसरे को
थोड़ा और सुनें थोड़ा और समझें
क्योंकि मोहब्बत सबसे बड़ी देशभक्ति है
और इंसान होना सबसे बड़ा धर्म
हम साथ हैं और साथ रहेंगे
यही भारत है यही हमारी पहचान है।

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