रील बनाते बिना काम के सोये- सोये बिना जगे

डाॅ. जितेन्द्र राव ( केजीएमयू)
आजकल के दौर में
जिन्दगी दबी है शोर में
भागते है लोग कितने
सुबह शाम भोर मे
आजकल …………..
हाथ, मुह दोनों जुड़े हैं
चलते -चलते गिर पड़े हैं
उठकर फिर, चलते बने हैं
मंजिलों के ठौर में
आजकल के दौर में
रील बनाते बिना काम के
सोये- सोये बिना जगे,
खोये- खोये से रहते हैं
अगर मगर है डगर नहीं
आजकल के दौर में
जिंदगी दबी है शोर में