पर यूपी में बसपा के लिए आसान नहीं होगी राह
कमल जयंत
बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा की एक सीट पर जीत ने पार्टी के लिए आक्सीजन का काम किया है। वैसे तो बसपा का उत्तर प्रदेश में मजबूत जनाधार रहा है, लेकिन यहां यह पार्टी सियासी तौर पर हाशिए पर है। बिहार विधानसभा चुनाव में एक सीट पर जीत से आकाश आनंद को पार्टी में स्थापित होने में जरूर मदद मिलेगी। पार्टी कार्यकर्ता आकाश आनंद को मायावती का उत्तराधिकारी मान रहा है। जिस तरह से मायावती ने आकाश आनंद की पार्टी में वापसी के बाद संगठन में मुख्य राष्ट्रीय संयोजक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है, इससे भी साफ है कि भविष्य में पार्टी की कमान आकाश आनंद ही संभालेंगे। वैसे समय-समय मायावती जी भी आकाश आनंद को उत्तराधिकारी बनाये जाने के संकेत देती रहीं हैं।

हाल ही में लखनऊ में बामसेफ के पदाधिकारियों की बैठक में भी आकाश आनंद को बतौर उत्तराधिकारी ही प्रोजेक्ट किया था और बामसेफ के नेताओं व पदाधिकारियों से आकाश के नेतृत्व में काम करने का निर्देश भी दिया था। फिलहाल बिहार का चुनाव आकाश आनंद की अगुवाई में ही लड़ा गया था। वहां ऐसे समय पर बसपा एक सीट जीती है, जब बिहार के सियासी धुरंधर और राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को तगड़ी शिकस्त मिली है। इस चुनाव में बसपा के लिए पहले से भी खोने के लिए कुछ नहीं था। हालांकि बिहार राज्य में भी लंबे समय तक बसपा का मजबूत जनाधार रहा है। इस चुनाव के जरिए एक बार फिर आकाश आनंद की अग्नि परीक्षा थी। बिहार में पार्टी ने सभी सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान किया था, लेकिन चालीस सीटों पर चुनाव लड़ा और रामगढ़ सीट पर तीस वोटों से जीत हासिल कर ली।
इस चुनाव में सबसे खास बात यह रही कि बसपा प्रमुख मायावती और आकाश आनंद ने एक भी रैली नहीं की। लगभग निष्क्रिय रहते हुए या यूं कहा जाए जमीनी स्तर पर काम करने का नतीजा यह रहा कि पार्टी को एक सीट पर सफलता मिलने के साथ ही बिहार राज्य में 1.59′ वोट भी हासिल हुआ। बिहार में पार्टी की मौजूदगी मात्र ने सीधे तौर पर महागठबंधन की 57 सीटों को प्रभावित किया। बिहार की रामगढ़ सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में बसपा उम्मीदवार सतीश कुमार सिंह यादव ने भाजपा और राजद दोनों के प्रत्याशियों को पीछे छोड़ जीत दर्ज की। उन्हें 72689 वोट मिले और जीत का अंतर 30 वोट का रहा। बिहार चुनाव में मिली आंशिक सफलता ने आकाश आनंद को बसपा में स्थापित करने में मदद की है।
उत्तर प्रदेश में मायावती के लिए 2007 दोहराने की चुनौती
बहुजन समाज पार्टी का यूपी में मजबूत जनाधार रहा है और यहां पार्टी ने एक बार सपा और तीन बार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनायी, वहीं 2007 में राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी। मायावती के नेतृत्व में पार्टी शिखर पर पहुंची तो साथ ही इस समय देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में हाशिए पर है और उसे यूपी में एक विधानसभा सीट पर चुनाव जीतकर संतोष करना पड़ रहा है। मौजूदा समय में बसपा का लोकसभा में एक भी सदस्य नहीं है,यूपी विधान परिषद में भी पार्टी की सदस्य संख्या शून्य है।

मायावती ने कांशीराम जी महानिर्वाण दिवस के मौके पर 9 अक्टूबर को लखनऊ में रैली की और रैली में जुटी भीड़ से ऐसा लग रहा था कि बसपा प्रमुख एक बार फिर सक्रिय होंगी, लेकिन रैली की सफलता के बाद वह किसी भी आंदोलन या दलित उत्पीडऩ के मुद्दे पर मुखर होकर सडक़ पर नहीं आयीं हैं। रैली की सफलता से जहां एक तरफ बसपा कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ था, वहीं दूसरी तरफ बहनजी के बहुजन सरोकार से जुड़े मुद्दे पर मुखर न होना उन्हें निराश कर रहा है। फिलहाल यूपी में विधानसभा चुनाव में अब बमुश्किल एक साल का समय बचा है। ऐसे में पार्टी यूपी में अकेले दम पर चुनाव लडक़र अपने पुराने जनाधार को वापस ला पाएगी, यह तो चुनावी नतीजे बताएंगे, लेकिन पार्टी के स्तर पर चुनाव को लेकर जमीन पर कोई तैयारी नहीं दिख रही है।
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद बसपा को लेकर जो समीक्षाएं की जा रहीं हैं, वह कार्यकर्ताओं में बहुत उत्साह बढ़ाने वाली नहीं हैं। हां बिहार के चुनावी नतीजों ने बार-बार आकाश आनंद के नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालिया निशान को मिटा दिया है। और बिना किसी बड़ी रैली के एक सीट पर जीत आकाश की चुनावी रणनीतिक सफलता माना जा रहा है। वैसे राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा के चुनाव मैदान में उतरने से सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे दलों को नुकसान हुआ है और इसका सीधा फायदा संविधान और आरक्षण का विरोध करने वाली भाजपा और उसके एनडीए गठबंधन को हुआ है।