बीमारी में दुआ के साथ दवा लेने की ताकीद भी करता है मख्दूम शाहमीना शाह ट्रस्ट
कमल जयंत
मख्दूम शाहमीना फाउण्डेशन के उपाध्यक्ष सैयद अतीक अहमद उर्फ रूफी बाबा इन दिनों यूपी के कई जिलों में मेडिकल कैंप लगाकर गरीब मरीजों की मदद कर रहे हैं। शाहमीना फाउण्डेशन का गठन गरीबों और परेशान लोगों की सहायता करने के मकसद से ही किया गया है। उनका मानना है कि गरीबों को अगर अच्छी शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मिल जाएं तो वह आसानी से अपना गुजर-बसर कर सकते हैं। गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं हैं। साथ ही शिक्षा का अभाव और गरीबी है। जिसकी वजह से ये तबका चाहकर भी अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत नहीं रह पा रहा है। हमारी फाउण्डेशन ऐसी ही बस्तियों में हर हफ्ते स्वास्थ्य शिविर लगाकर आम लोगों की रूटीन जांच कराने के साथ ही इन्हें जरूरी दवाएं व स्वास्थ्य संबंधी परामर्श निशुुल्क मुहैया करा रही है। सैयद अतीक अहमद का मानना है कि अगर गरीब वर्ग के लोग अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए जागरूक हो जाएं तो इनकी आने वाले पीढ़ी शिक्षा की बदौलत अपना भरण-पोषण करने के साथ ही अपना अच्छा-बुरा भी बाखूबी जान सकेगी और तर्क के आधार जिससे सामाजिक उत्थान संभव हो वही निर्णय लेगी।

उनका कहना है कि लखनऊ में ही कम से कम हजारों सामाजिक संगठन और स्वयं सेवी संस्थाएं गरीबों के विकास के लिए काम कर रहीं हैं। इससे इन वर्ग के लोगों में जागरूकता भी आयी है, लेकिन इन्हें और जागरूक करने तथा अपने अधिकारों के प्रति सजग करने के लिए अभी इनके बीच और अभियान चलाने की जरूरत है। लावारिस बच्चों की देखरेख और गरीब लड़कियों की शादी कराने के अलावा हमारी संस्था समाज में व्याप्त अंधविश्वास के खिलाफ भी लोगों को जागरूक करने का काम कर रही है। धनाभाव के कारण गरीब लोग अपनी बीमारी का इलाज दरगाहों और मजारों में आकर दुआ-ताबीज में ढूंढते हैं। दुआ-ताबीज का अपना प्रभाव है और इसका अनुकूल प्रभाव भी पड़ता है। लेकिन बीमारी का इलाज दवा और डॉक्टर से परामर्श लेने और जांच रिपोर्ट की मदद से होता है। मजार पर आने वाले बीमार लोगों के लिए दुआ करने के साथ ही उन्हें दवा करने की भी हिदायत दी जाती है।
दुआ-ताबीज का अपना प्रभाव है और इसका अनुकूल प्रभाव भी पड़ता है
बताया जाता है कि स्वस्थ होने के लिए दुआ के साथ दवा भी जरूरी है। मजार पर आने वाली बीमारों की भीड़ को देखने के बाद ही हमारी संस्था ने यह फैसला लिया कि गरीब बस्तियों में मेडिकल कैंप आयोजित किये जाएं। इन कैंपों में लोग इलाज के लिए खुद से आ रहे हैं। कैंप में आने वाले लोगों को निशुल्क स्वास्थ्य परामर्श के साथ ही मुफ्त दवाएं भी मुहैया करायी जा रहीं हैं। मख्दूम शाहमीना फाउंडेशन के उपाध्यक्ष सैयद अतीक अहमद से इन्हीं मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई। अहमद ने बहुत ही बेबाकी के साथ सवालों के जवाब दिये।

सवाल- आपकीसंस्था स्वास्थ्य शिविर का आयोजन सिर्फ लखनऊ में करती है या अन्य जिलों में भी इस तरह के कैंप लगाये जाते हैं।
जवाब- शुरुआत में संस्था लखनऊ में ही गरीबों की बस्तियों में स्वास्थ्य शिविर आयोजित करती थी और इन कैंपों में दवाओं व परामर्श के लिए बहुत से डॉक्टरों ने आगे बढक़र मदद की। वे कैंपों में गरीब मरीजों को देखने के साथ ही उनकी निशुल्क जरूरी जांच करके उन्हें निशुल्क दवाएं भी मुहैया कराते हैं। स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन अब लखनऊ से लगे जिलों में भी किया जा रहा है। आगे राज्य के सभी जिलों में स्वास्थ्य शिविर आयोजित करने की योजना है। इस नेक काम में मदद करने के लिए हमारी संस्था से लोग जुड़ रहे हैं। उम्मीद है कि आगे हम लोग ज्यादा लोगों की मदद कर सकें।
सवाल- गरीबों को शिक्षित करने के लिए संस्था शैक्षिक संस्थाएं खोलेगी या केवल गरीबों को आर्थिक मदद करती रहेगी।
जवाब- शाहमीना शाह की दरगाह और फाउण्डेशन देश के प्रमुख-प्रमुख शहरों में हैं। बाबा की सौ से अधिक दरगाहें हैं। इन दरगाहों के जरिए बच्चों को दीनी के साथ ही आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है। ताकि बच्चा बड़ा होकर अच्छा इंसान होने के साथ ही अच्छी नौकरी या रोजगार से भी जुड़ सके। शिक्षा ही एक ऐसी चाबी है, जिससे इंसान की तरक्की के सारे रास्ते खुल जाते हैं। शिक्षित होने के बाद इंसान में अच्छा-बुरा समझने की समझ विकसित हो जाती है और फिर वह लोगों के बहकावे में आकर कोई गलत काम नहीं करता है। हमारी संस्था धर्म या जाति देखकर लोगों की मदद नहीं करती। बस्तियों में गरीब चाहे जिस मजहब का हो उसके बच्चों को शिक्षित करने व बीमार को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करायी जा रही हैं।
सवाल- गरीब लड़कियों की शादी कराने के लिए संस्था कोई सरकारी मदद भी लेती है।
जवाब- नहीं संस्था फिलहाल इन कामों के लिए किसी भी तरह की कोई सरकारी मदद नहीं ले रही है। अभी व्यक्तिगत तौर पर निजी खर्चे में साल में पांच गरीब लड़कियों की शादी करा रहे हैं। सामाजिक कार्यों में जुटे लोगों ने पहल की है कि वे इस नेक काम में उनकी मदद के लिए आगे आना चाहते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे आने वाले साल में सामूहिक विवाह कार्यक्रम आयोजित की योजना है, जिससे इन कार्यक्रमों के जरिए ज्यादा से ज्यादा गरीब लड़कियों की शादी करायी जा सके। पैसे के अभाव में गरीब लड़कियों की शादियां नहीं हो पाती है, अच्छे रिश्ते भी गरीबी के कारण इन्हें नहीं मिलते। संस्था इन लड़कियों के अभिभावक की भूमिका निभाएगी और इनकी शादी के खर्च की जिम्मेदारी भी उठाएगी।
हिन्दू-मुस्लिम दोनों अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए बारगाह में हाजिरी लगाने आते हैं
सवाल- बाबा की बारगाह में बीमार और परेशान लोग दुआ के लिए आते हैं। क्या दुआओं से बीमारियां भी ठीक होती हैं।
जवाब- परेशानी में तो दुआओं का असर होता है और लोगों की दिमागी परेशानी दूर भी होती है। यही वजह है कि हर बृहस्पतिवार और उर्स के दौरान भारी तादाद में हिन्दू-मुस्लिम दोनों अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए बारगाह में हाजिरी लगाने आते हैं। लेकिन बीमारी में दवा भी जरूरी है। इस बात के लिए लोगों को जागरूक भी किया जाता है और हमारी संस्था इसीलिए बस्तियों में स्वास्थ्य शिविर भी लगा रही है। कुरान में भी हिकमत की बात कही गई है। लिहाजा बीमारी को ठीक करने के लिए दुआ के साथ दवा और इलाज व डॉक्टर के परामर्श से जांच कराना भी जरूरी होता है।
बारगाह में आने वाले लोगों को बीमारी का इलाज कराने डॉक्टर को दिखाने व दवा कराने की हिदायत भी दी जाती है। संस्था लावारिस बच्चों की भी देखरेख करती है। लावारिस बच्चों की परेशानी कई गुना होती है। रहने और भोजन के साथ ही पुलिस की ज्यादितियों का भी ये बच्चे शिकार होते हैं। बाबा की बारगाह में इस तरह के लावारिस बच्चे सेवा में लगे रहते हैं। निजी तौर पर खुद व संस्था इन लावारिस बच्चों का खर्च वहन करती है। इनमें सामाजिक सम्मान व स्वाभिमान भी जगाना संस्था का मकसद है और हमारी संस्था इस काम में सफल है। ये बच्चे ईमानदारी के साथ बाबा की बारगाह में आने वाले जायरीनों के सेवाभाव में लगे रहते हैं।